कभी जरूरी काम सामने होता है और मन कहता है कि अभी थोड़ा और रुक जाएँ। यदि ऐसा बार बार हो तो अपनी आदतों को देखना उपयोगी है। चौदहवें भाग की व्याख्या तमस क
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कभी जरूरी काम सामने होता है और मन कहता है कि अभी थोड़ा और रुक जाएँ। यदि ऐसा बार बार हो तो अपनी आदतों को देखना उपयोगी है। चौदहवें भाग की व्याख्या तमस क
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जीवन में बदलाव आवश्यक है, लेकिन बदलाव के बाद नए जीवन को सँभालना भी उतना ही आवश्यक है। माधवशिव के अग्नि और सोम अध्याय में यही संबंध आध्यात्मिक प्रतीकों
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ज्ञान की खोज में सही प्रश्न जितने आवश्यक हैं, सही मार्गदर्शन भी उतना ही आवश्यक है। किसी के शब्द हमें आकर्षित कर सकते हैं, लेकिन उसके आचरण को देखना भी
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कभी लगता है कि काम छोड़ देने पर सारी उलझनें समाप्त हो जाएँगी। लेकिन शरीर चलता रहता है, मन सोचता रहता है और हमारे निर्णय दूसरों पर असर डालते रहते हैं।
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श्रीकृष्ण से प्रश्न करते अर्जुन की यात्रा में विनय, तैयारी, श्रीराधा का स्वागत और अनुभव को सँभालने की मर्यादा एक साथ खुलती हैं।
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कॉकरोच के दोनों भागों में माया का प्रश्न और आर्यव का प्रशिक्षण शक्ति, संयम तथा दूसरे के जीवन की चिंता को जोड़ते हैं।
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श्रीमद्भगवद्गीता के भाग सोलह में आर्जव विचार, वाणी और कर्म की एकरूपता है। भय और दिखावे को पहचानकर सच्ची, संवेदनशील सरलता का अभ्यास कैसे करें?
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त्याग का अर्थ कर्तव्य से भागना नहीं है। भाग अठारह में कर्म, कामना और फल-आसक्ति का भेद बताता है कि मन को स्वतंत्र रखते हुए उत्तरदायित्व कैसे निभाया जाए।
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भोजन, विश्राम, कर्म और ईश्वर-स्मरण का संबंध साधना को पूरे जीवन से जोड़ता है। गीता के संवाद में अति से बचने और संयम को व्यवहार में उतारने की दिशा।
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दान की गरिमा उसके भाव, उचित उपयोग और प्राप्त करने वाले के सम्मान से खुलती है। गीता में सात्त्विक, राजसी और तामसी दान के भेद हमें अपेक्षा, विवेक और विनम्रता को साथ दे
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सत्य कहना, सम्मान बनाए रखना और कल्याण की दिशा में बोलना—वाणी की चार कसौटियाँ हमें अपने शब्दों, नीयत और भीतरी संवाद को देखने का अवसर देती हैं।
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कान्हा की निकटता, गोपाल की करुणा, मुरलीधर की मधुरता और वासुदेव की व्यापकता—कृष्ण के नाम उनके गुणों और संबंधों को स्मरण में खोलते हैं।
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गर्ग मुनि बालक कृष्ण से धन, सिद्धि और सुखों से आगे अटल भक्ति, सेवा तथा निरंतर स्मरण का वर माँगते हैं।
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श्रीमद्भगवद्गीता को जीवन के नियमों की किताब के रूप में समझने वाला लेख—कर्तव्य, कर्म, ज्ञान, मन, भक्ति और मोक्ष की दृष्टि से।
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संकट के समय उठी हुई प्रार्थना हमें याद रहती है। उसके बाद घर लौटने का दृश्य कभी-कभी हमारी दृष्टि से छूट जाता है। कृष्ण की वनाग्नि लीला में मैं इसी लौटन
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किसी मनुष्य को पहचानने के लिए हम प्रायः इतना देख लेते हैं कि वह कहाँ से आया है और किसके साथ रहता है। उसके बाद उसके मन के लिए हमारे पास कोई प्रश्न नहीं
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भक्ति का एक क्षण हमारे भीतर बहुत कुछ जगा सकता है, पर उस जागरण को सँभालना भी आवश्यक है। मन में प्रेम आया, आँखें भीगीं और भगवान् का स्मरण सहज हो गया; इत
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श्रीमद्भगवद्गीता के भाग 18 के आधार पर कर्म के पाँच कारण—अधिष्ठान, कर्ता, करण, चेष्टा और दैव—को समझने का लेख।
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द्रौपदी और श्रीकृष्ण का संबंध मेरे सामने भक्ति का एक आत्मीय रूप रखता है। द्रौपदी कृष्ण को भगवान् मानती हैं, उनकी पूजा करती हैं और उन्हीं में अपने सखा
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घंटाकर्ण के प्रसंग में सुनने की तैयारी, भक्ति में जुड़ी घृणा की पहचान और मन के परिवर्तन का अर्थ।
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मिलने से पहले का संकोच मित्रता का एक बहुत कोमल प्रश्न है: परिस्थितियाँ बदल जाने पर क्या हमारा अपनापन भी बदल जाता है? जिस व्यक्ति के साथ हमने कभी सहज होकर समय बिताया
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हम समय को बिताने की बात बहुत सहजता से कह देते हैं, पर यह नहीं देखते कि समय के साथ हमारा अपना जीवन बीत रहा है। जिस समय में कुछ सीख सकते थे, किसी का दुः
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ज्ञान और बुद्धि के अंतर को अनुभव, आत्मनिरीक्षण, अध्ययन और व्यवहार की कसौटी पर समझने वाला लेख। इसमें ऊँचे ज्ञान की साधना और उपाधि तथा वास्तविक समझ के बीच का अंतर भी स
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श्रीगर्गसंहिता के वृन्दावन खण्ड, अध्याय 24 पर आधारित यह लेख निधिवन-लीला के काव्यात्मक दृश्य—यमुना तट, कदंब वन, राग, नृत्य, खेल और मौन—से प्रकृति, विविध भक्ति-रूपों,
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अर्जुन श्रीकृष्ण से संन्यास और त्याग का वास्तविक अर्थ अलग-अलग समझाने का अनुरोध करते हैं। अब तक कर्म, ज्ञान, भक्ति और संयम के अनेक पक्ष सामने आ चुके हैं। वे जानना चाह
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अर्जुन श्रीकृष्ण से पूछते हैं कि जो लोग शास्त्रीय विधि का पालन नहीं करते, फिर भी श्रद्धापूर्वक उपासना करते हैं, उनकी निष्ठा किस प्रकार की होती है। क्या वह सात्त्विक
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श्रीकृष्ण अर्जुन को मनुष्य के भीतर की दो प्रकार की प्रवृत्तियाँ समझाते हैं—दैवी और आसुरी। इनकी पहचान उसके व्यवहार, संकल्प और जीवन की दिशा से होती है। मनुष्य क्या चाह
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श्रीकृष्ण अर्जुन के सामने संसार का एक गहरा रूपक रखते हैं। वे उसे ऐसे अश्वत्थ वृक्ष के समान बताते हैं जिसकी जड़ ऊपर है और शाखाएँ नीचे फैली हुई हैं। इस वृक्ष का विस्ता
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श्रीकृष्ण अर्जुन को ऐसा ज्ञान बताते हैं जिसके द्वारा साधक प्रकृति के बंधनों को समझकर उनसे आगे बढ़ सकता है। वे कहते हैं कि सत्त्व, रज और तम—ये तीन गुण प्रकृति से उत्प
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श्रीकृष्ण अर्जुन को शरीर और उसे जानने वाले के बीच का भेद समझाते हैं। वे शरीर को क्षेत्र कहते हैं और इस क्षेत्र को जानने वाले को क्षेत्रज्ञ। इस भेद को पहचानना आत्मज्ञ
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अर्जुन श्रीकृष्ण से पूछते हैं कि जो भक्त उनके सगुण स्वरूप की उपासना करते हैं और जो अव्यक्त, अविनाशी ब्रह्म का चिंतन करते हैं, उनमें श्रेष्ठ योगी कौन हैं। वे उपासना क
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श्रीकृष्ण की महिमा और सृष्टि के आधार का वर्णन सुनकर अर्जुन के भीतर एक नई जिज्ञासा उठती है। वे कहते हैं कि कृपा से उनका मोह दूर हुआ है। अब वे उस दिव्य स्वरूप को प्रत्
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श्रीकृष्ण अर्जुन का हित चाहते हुए अपने स्वरूप को और स्पष्ट करते हैं। वे बताते हैं कि वे अजन्मा, अनादि और समस्त लोकों के परम आधार हैं। जो इस सत्य को जानता है, उसकी दृ
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श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि अब वे उन्हें अत्यंत गूढ़ ज्ञान बताएँगे। यह ज्ञान अनुभव से जुड़ा है, मनुष्य को पवित्र करता है और उसे अशुभ बंधनों से मुक्त होने की दिशा
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अर्जुन श्रीकृष्ण से ब्रह्म, अध्यात्म और कर्म का अर्थ पूछते हैं। वे अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ को भी समझना चाहते हैं। उनके प्रश्न का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि जीवन क
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श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि मन को उनमें लगाकर और उनका आश्रय लेकर योग का अभ्यास करने से वे उनके वास्तविक स्वरूप को जान सकते हैं। अब वे ऐसा ज्ञान समझाने जा रहे हैं
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श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि जो मनुष्य कर्मफल का आश्रय लिए बिना अपना कर्तव्य करता है, वही सच्चा योगी और संन्यासी है। केवल कर्म बंद कर देने से योग सिद्ध नहीं होत
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अर्जुन के मन में एक प्रश्न अभी भी बना हुआ है। श्रीकृष्ण कभी कर्मों का त्याग करने की बात कहते हैं और कभी कर्मयोग की प्रशंसा करते हैं। अर्जुन उनसे पूछते हैं कि इन दोनो
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श्रीकृष्ण से अर्जुन पूछते हैं कि उनका जन्म तो अभी का है, जबकि सूर्य बहुत प्राचीन हैं। फिर उन्होंने सूर्य को यह योग आरंभ में कैसे बताया था? यह प्रश्न तब उठता है जब श्
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श्रीकृष्ण से अर्जुन कहते हैं कि यदि ज्ञान कर्म से श्रेष्ठ है, तो फिर वे उन्हें ऐसे कठिन कर्म में क्यों लगा रहे हैं? उनकी बुद्धि अभी भी उलझी हुई है। एक ओर वे आत्मा के
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राधा के गोलोक-प्रकाट्य और पृथ्वी पर वृषभानु-कलावती के घर आगमन को पुस्तक अलग कथा-स्तरों में रखती है। यह लेख उन प्रसंगों, शाप और वियोग की भूमिका, तथा “प्रकाट्य” और जन्
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श्रीकृष्ण से अर्जुन कहते हैं कि वे समझ नहीं पा रहे कि उनके लिए क्या करना उचित है। एक ओर कर्तव्य है और दूसरी ओर वे संबंध हैं जिन्हें खोने की कल्पना भी उन्हें व्याकुल
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हम अक्सर “नरक” को किसी दूर के लोक या मृत्यु के बाद मिलने वाली स्थिति के रूप में सोचते हैं। गीता का यह अंश ध्यान को वर्तमान जीवन की ओर मोड़ता है। जब अत
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श्रीकृष्ण के सामने अर्जुन अपनी करुणा, मोह और कर्तव्य की दुविधा रखते हैं। अर्जुनविषादयोग में सामर्थ्य होते हुए भी सही दिशा खोजने की आवश्यकता सामने आती है।
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सत्त्व, रज और तम मनुष्य के अनुभवों और कर्मों को प्रभावित करते हैं। गीता के चौदहवें अध्याय के अंतिम प्रश्न–उत्तर बताते हैं कि गुणातीत होना भावनाओं को दबाना नहीं, बल्क
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माधवशिव के ‘अग्नि और सोम’ अध्याय में अग्नि परिवर्तन और तेज का, जबकि सोम शीतलता और पोषण का प्रतीक है। दोनों का संतुलन संसार को धारण करता है। यह लेख पूछता है: परिवर्तन
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अर्जुन की उलझन से शुरू होकर आत्मा, कर्म, मन, भक्ति, ईश्वर, स्वभाव और मोक्ष तक पहुँचने वाली गीता की यात्रा का सरल परिचय।
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किसी से पूछिए कि भक्ति की पहचान क्या है, तो उत्तर में पूजा, जप, व्रत या मंदिर का नाम आ सकता है। ये अनेक लोगों के जीवन में श्रद्धा के महत्वपूर्ण रूप है
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किसी जीव को देखकर हम उसके बीते हुए कर्मों का निर्णय कितनी जल्दी कर लेते हैं। एक बार जो हिंसक रहा, उसे सदा हिंसक मानने में हमें सुविधा होती है। उससे अप
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माँ की गोद में बैठा एक बालक और सारी सृष्टि के रहस्य को समेटे एक दिव्य व्यक्तित्व—डॉ. राजेश तकयार की पुस्तक कृष्ण एक सत्यज्ञान के ‘यशोदा प्रेम’ अध्याय
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कभी किसी प्रिय की तस्वीर देखकर मन प्रसन्न भी होता है और उसके सामने न होने की कमी भी अधिक स्पष्ट हो जाती है। तस्वीर आँखों को रूप देती है, पर सामने उपस्
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कभी जीवन के सबसे सुंदर दृश्य भी मन को सांत्वना नहीं दे पाते। नदी अपने प्रवाह में बहती रहती है, वृक्षों पर फूल खिलते रहते हैं, चाँद अपनी रोशनी बिखेरता
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मेहनत करने के बाद भी कभी लगता है कि हम वहीं खड़े हैं। दिन व्यस्त बीतता है, थकान भी होती है, लेकिन इच्छित काम आगे नहीं बढ़ता। ऐसे समय केवल प्रयास बढ़ान
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माला को देखते समय पहले मोती दिखाई देते हैं। उन्हें जोड़े रखने वाला धागा अक्सर नजर नहीं आता। सातवें भाग में कृष्ण इसी सरल उपमा से जगत और उसके आध्यात्मि
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हम काम शुरू करते ही उसके परिणाम की कल्पना करने लगते हैं। प्रशंसा मिलेगी या आलोचना, सफलता मिलेगी या असफलता, यह चिंता कई बार काम से अधिक जगह घेर लेती है
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जीवन में कुछ निर्णय ऐसे होते हैं जिनका उत्तर जानने के बाद भी कदम उठाना कठिन होता है। सामने केवल काम नहीं, अपने लोग, पुरानी स्मृतियाँ और संबंधों की आशं
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हम गुरु से अक्सर अपनी किसी तत्काल उलझन का उत्तर चाहते हैं। लेकिन गुरु का कार्य हमारी दृष्टि को भी खोलना है, ताकि आगे आने वाले प्रश्नों को अधिक समझ से
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पुस्तक-संदर्भ: यह लेख मेरी पुस्तक “कृष्ण की राधा” के “व्रजभूमि और श्रीराधा नाम महत्व” अध्याय पर आधारित है। किसी पवित्र स्थान से प्रेम करना केवल वहाँ प
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श्रीमद्भगवद्गीता पढ़ने से जुड़े 20 सरल प्रश्न: कर्म, निर्णय, चिंता, संबंध, जीवन का उद्देश्य और रोज़मर्रा में उसकी सीख का उपयोग।
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अर्जुन के प्रश्न पर श्रीकृष्ण का उत्तर: क्या अधूरी साधना, भक्ति और अच्छे कर्म अगले जन्म में भी साथ रहते हैं?
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धर्मात्मा कौन है, वह क्या करता है, क्यों वह धर्मात्मा है ? धर्मात्मा वह होता है जिसका आत्मा धर्म से जुड़ा हो, जिसका हर कार्य सत्य, करुणा, न्याय और पवि
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भगवान् केवल परम सत्ता नहीं, बल्कि प्रेम के सभी रूपों में अनुभव किए जा सकते हैं। मानव अक्सर भगवान् को केवल एक महान शक्ति या परम सत्ता के रूप में सोचता
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क्या आपने कभी किसी ऐसे निर्णय के सामने स्वयं को खड़ा पाया है, जहाँ दोनों ओर अपने ही लोग हों और कोई भी रास्ता सरल न लगे? मन जानता है कि कुछ करना होगा,
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अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे।प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः॥ २९ ॥ यह श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय चार का संख्या 29 श्लोक है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण अ
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बहुत से मानव कहते हैं कि आत्मा करता है कहना सही नहीं है, करती है कहना सही है। जोकि उचित नहीं है। वेदों, शास्त्रों, उपनिषदों में आत्मा को पुल्लिंग ही बताया गया है। सं
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मैं एक लेखक हूँमुझे आध्यात्मिकता पर लिखना बहुत अच्छा लगता है। ऐसा नहीं है कि मैं कोई इस का विश्लेषक हूँ, बल्कि ये इस लिए है कि जब भी आप आध्यात्मिकता पर सोचते हैं, पढ
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आम मानस के मन में एक बहुत बड़ी दुविधा रहती है कि महाभारत पढ़नी नहीं चाहिए या घर पर नहीं रखनी चाहिए। महाभारत के पहले अध्याय में एक श्लोक है:ब्रह्मन् वेदरहस्यं च यच्चा
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धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय॥ १॥महाभारत के तृतीय खण्ड के भीष्मपर्व के पञ्चविंशोऽध्यायः से श्रीमद्भगवद्गीता का आरम्भ
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स्कन्दपुराण के माहेशवरखण्ड-कुमारिकाखण्ड [2] के अध्याय ६० और ६६ में घटोत्कच विवाह और उनके पुत्र बर्बरीक के बारे में बहुत विस्तार से बताया गया है। बर्बरीक के बारे में
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बहुत से मानवों को एक संशय रहता है कि भगवान आखिर है कहाँ? विज्ञान इसे सिद्ध क्यों नहीं करता? ब्रह्मपुराणम् के प्रथमोऽध्यायः (१) के शुरू में ही एक श्लोक है:आधारभूतं वि
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स्कन्दपुराण के कार्तिकमास माहात्म्य में बताया गया है कि महर्षि कर्दम की दृष्टि मात्र से तृणविन्दु की कन्या देवहूति के गर्भ से ‘जय’ और ‘विजय’ नाम के दो पुत्रों का जन्
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भगवान् श्रीकृष्ण को सुदर्शन चक्र की प्राप्ति की कहानी हिन्दू पौराणिक कहानीओं में एक महत्वपूर्ण और रोचक प्रसंग है। इसकी प्राप्ति के बारे में विभिन्न पुराणों और ग्रंथो
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ब्रह्मपुराणम् के दो भाग हैं, एक का नाम पूर्वभागः और दूसरे का नाम उत्तरभागः है। पूर्वभागः के अध्याय संख्या ७२ ‘शिवविवाह’ के अंर्तगत कथा में गंगा की उत्पत्ति के बारे म
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श्रीकृष्ण के जीवन में श्रीराधा का क्या स्थान है ये वही जानते हैं जो श्रीराधा को जानते हैं, भजते हैं। शास्त्रों में श्रीराधा का नाम लेने के पश्चात ही कृष्ण कहने को कह
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तिरुपति मंदिर में दर्शन के बाद जो प्रसाद दिया जाता है उसमें पशुओं की चर्बी इत्यादी का मिलना इतना बढ़ा अपराध है कि उसका पश्चाताप पुराणें में है ही नहीं। क्योंकि वराह
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पुराणों में वर्णित ५० करोड़ योजन में फैले हुए ज्योतिपुंज अपने धाम गोलोक से चल कर जब पृथ्वी का दुःख दूर करने के लिए साँवला रूप बनाकर, सिर पर मोरपंख लगाकर श्रीकृष्ण मा
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ये प्रश्न कई बार कई लोगों के हृदय में उठता होगा। शास्त्रों में इस का उत्तर कई बार कई जगह पर दिया हुआ है। सर्वप्रथम सर्वमान्य भगवद् गीता के अध्याय ९ की श्लोक संख्या ४
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अब वापिस हम अपने श्रीकृष्ण पर आते हैं। सर्वप्रथम हमें ये जानना चाहिए कि कृष्ण का स्वरूप क्या है? वे दिखते कैसे हैं? हमारे शास्त्रों में श्रीकृष्ण के रूप का बहुत ही स
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साल के अंत के साथ ही मैनें अब पुराण, वेद इत्यादि सारे धार्मिक ग्रंथ पढ़ने का मन बना लिया था। मेरे पास अब क्षितिज ने कोई काम करने को छोड़ा ही नहीं, जो मैं कहता हूँ वह
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विद्वान् पुरुष को चाहिये कि अपने शरीर के पैर से ले कर सिर तक चौबीस स्थानों में पहले गायत्री के अक्षरों का न्यास करे। इसके इस प्रयास से उसे परम शान्ति का अनुभव होगा।
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कृष्ण कौन हैं? इसका उत्तर शब्दों में देना बहुत कठिन है। वे अनन्त हैं, कृष्ण को केवल भगवान नहीं कहा जा सकता। अगर ऐसा होता तो उन अजन्मे और अखिलात्मा को बार-बार इस पृथ्
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जब नन्दराज जी ने बालक श्रीकृष्ण को राधाजी को सौंप दिया तो वह उन्हें लेकर वन में प्रवेश कर गईं। आसमान में मेघ का दारुण गर्जन गूँज ही रहा था, वज्र जैसा निनाद हो रहा था
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