17 अक्टूबर 2026 · डॉ. राजेश तकयार
आप या पाँच

कर्म के बारे में हमारी सबसे सामान्य भूल यह है कि हम उसके पूरे परिणाम को केवल अपने नाम से बाँध देते हैं। अनुकूल परिणाम में हम कह देते हैं कि यह केवल मेरी शक्ति से हुआ; प्रतिकूल परिणाम में हम मान लेते हैं कि सब कुछ केवल मेरी कमी से बिगड़ा। श्रीमद्भगवद्गीता के भाग 18 में श्रीकृष्ण इस संकुचित दृष्टि को खोलते हैं। वे बताते हैं कि प्रत्येक कर्म की सिद्धि में पाँच कारण होते हैं।
पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे ।
साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम् ॥ १३ ॥
कर्म को एक व्यक्ति तक सीमित न मानें
जीवन में जब कोई कार्य पूरा होता है तो मन सहज ही कह देता है—यह मैंने किया। सफलता मिले तो इस वाक्य के साथ गर्व जुड़ जाता है और परिणाम अनुकूल न हो तो वही मन स्वयं को दोष देने लगता है। श्रीकृष्ण कर्म को देखने की इससे अधिक व्यापक दृष्टि दे रहे हैं। वे कहते हैं कि प्रत्येक कर्म की सिद्धि में पाँच कारण होते हैं। श्लोक 13 में शुरु करते हुए श्रीकृष्ण अर्जुन से इन कारणों को ध्यान से सुनने के लिए कहते हैं। इन पाँचों को साथ देखकर ही हम अपने काम, अपने परिणाम और अपने उत्तरदायित्व को ठीक तरह समझ सकते हैं।
मेरे लिए इस शिक्षा का पहला संदेश है कि कर्म करते समय सजग रहना चाहिए, लेकिन परिणाम को केवल अपनी निजी शक्ति का प्रमाण नहीं मानना चाहिए। जब मैं अपने को ही हर कार्य का पूर्ण कारण मान लेता हूँ, तब मैं शेष चार कारणों को अनदेखा कर देता हूँ। तब सफलता में अहंकार बढ़ सकता है और असफलता में मन अनावश्यक रूप से टूट सकता है। श्रीकृष्ण की दृष्टि इन दोनों स्थितियों से बचने का विवेक देती है।
पहला: अधिष्ठान, कर्म का आधार
पहला कारण अधिष्ठान कहा यानि यह शरीर के रूप में सामने आता है। कोई भी कर्म शून्य में नहीं होता; कर्म का एक आधार चाहिए। शरीर के द्वारा ही वाणी बोलती है, हाथ काम करते हैं और मन अपनी दिशा को कर्म में प्रकट करता है। इसीलिए शरीर को कर्म से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
इस बात को याद रखने से हम अपने कर्म की वास्तविक स्थिति को देख पाते हैं। शरीर की उपस्थिति, उसकी क्षमता और उसकी सीमा—ये सब कर्म के आधार में आते हैं। मैं जिस काम को आरम्भ करता हूँ, उसमें मेरा शरीर केवल एक दर्शक नहीं है। वह उस कर्म का पहला आधार है। इसलिए कर्म करते समय शरीर के प्रति उपेक्षा भी कर्म को देखने की अधूरी दृष्टि है।
दूसरा : कर्ता
दूसरा कारण कर्ता है। कर्ता वह है जो कर्म को आरम्भ करता है, निर्णय लेता है और उसमें लगने का संकल्प करता है यानि आप। कर्ता के बिना कर्म की चर्चा अधूरी है, क्योंकि कर्म किसी न किसी के द्वारा प्रारम्भ होता है। फिर भी श्रीकृष्ण कर्ता का नाम लेकर वहीं नहीं रुकते। वे कर्ता को पाँच कारणों में केवल एक कारण के रूप में रखते हैं। यही बात अहंकार को संयमित करती है।
तीसरा: करण
अलग-अलग साधन, सरल अर्थ में ये इन्द्रियाँ हैं। शरीर आधार है, पर कर्म के चलने में साधन भी काम करते हैं। देखना, सुनना, बोलना, चलना और विचार को व्यक्त करना—कर्म का रूप इन साधनों के बिना सामने नहीं आता। जब साधनों की भूमिका समझ में आती है, तब कर्ता अपने को अकेला शक्ति-केंद्र मानना छोड़ देता है। जो आपकी कर्म करने में सहायता कर रहे हैं वह भी साधन ही हैं। फिर चाहे वे आपके परिवार के सदस्य हों या मित्र।
चौथा: विभिन्न चेष्टाएँ
कर्म केवल इच्छा करने से पूरा नहीं होता। उसमें बार-बार किया जाने वाला प्रयास, लगन और उस प्रयास की दिशा भी जुड़ी रहती है। एक ही कर्ता और एक ही साधन होने पर भी चेष्टाओं में अंतर हो तो कर्म का स्वरूप बदल सकता है। इसीलिए केवल संकल्प कर लेना कर्म की सिद्धि नहीं है; प्रयत्न को कर्म में उतरना पड़ता है।
इन सब कारणों को एक साथ रखने पर बात बहुत सरल हो जाती है। कर्ता संकल्प करता है, साधन कर्म को सम्भव बनाते हैं और चेष्टाएँ उसे आगे बढ़ाती हैं। इनमें से किसी को कम या अधिक मानकर बाकी को भूल जाना उचित नहीं है। मैं अपने प्रयास के प्रति उत्तरदायी हूँ, पर मेरे प्रयत्न का परिणाम केवल मेरी इच्छा से नहीं बनता।
यह दृष्टि कर्म के प्रति ईमानदारी भी बढ़ाती है। यदि मैंने अपने कर्तव्य में आवश्यक चेष्टा नहीं की, अपने साधनों का सही उपयोग नहीं किया या कर्ता के रूप में सजग नहीं रहा, तो पाँच कारणों की शिक्षा का सहारा लेकर मैं अपनी कमी से बच नहीं सकता। कर्तव्य करते हुए यह भी देखा जा सकता है कि मेरा प्रयास केवल आरम्भ तक सीमित तो नहीं रह गया। अनेक चेष्टाएँ बताती हैं कि कर्म में निरन्तरता का स्थान है। यदि कोई दिशा उचित है, तो उसमें धैर्य से लगे रहना भी कर्म का भाग है। पर यह धैर्य फल पर अधिकार का दावा नहीं बनता। प्रयास मेरा है; परिणाम में पाँचों कारण साथ काम कर रहे हैं।
पाँचवाँ: दैव यानि ईश्वर
पाँचवाँ कारण दैव है। यह सबसे आवश्यक है। इसे दैव-परिस्थिति कहा गया है। यह पाँचवाँ कारण हमें उस व्यापक व्यवस्था की ओर देखने को कहता है जो केवल हमारी इच्छा के अनुसार नहीं चलती। कर्म में हमारा शरीर, हमारा निर्णय, हमारे साधन और हमारे प्रयत्न हैं; फिर भी परिणाम के साथ ऐसी परिस्थिति भी जुड़ी है जिसे हम अपने हाथ में पूरी तरह नहीं रख सकते।
दैव का स्मरण करके मानव अपने पुरुषार्थ को छोड़ नहीं देता। इसके विपरीत, वह अपना पुरुषार्थ अधिक शुद्ध भाव से कर सकता है। वह जानता है कि उसका अधिकार कर्म और उचित चेष्टा पर है। परिणाम में अनेक कारण काम कर रहे हैं। इसलिए सफलता में वह स्वयं को ही सबसे बड़ा नहीं मानता और बाधा आने पर अपने सम्पूर्ण अस्तित्व को असफल नहीं ठहराता।
मेरे लिए दैव की यह समझ विनम्रता देती है। विनम्रता का अर्थ अपनी क्षमता को नकारना नहीं है। इसका अर्थ है अपनी क्षमता को सही सीमा में देखना। मैं जो कर सकता हूँ, वह करूँ; जो साधन मेरे पास हैं, उनका ठीक उपयोग करूँ; जो प्रयास अपेक्षित है, वह करूँ; और फिर यह स्वीकार करूँ कि परिणाम के पीछे एक ऐसा कारण भी है जिसे मैं केवल अपने नाम से नहीं बाँध सकता।
यह स्वीकार जीवन में संतुलन रखता है। अनुकूल फल आने पर धन्यवाद और संयम बना रहता है। प्रतिकूल फल आने पर भी कर्म से विरक्ति नहीं होती, क्योंकि मानव समझता है कि परिणाम के भीतर उसका पूरा व्यक्तित्व अकेला कारण नहीं था। इस प्रकार दैव-परिस्थिति कर्मयोगी को निश्चेष्ट नहीं, बल्कि अधिक स्थिर बनाती है।
न्याय्य कर्म, विपरीत कर्म और केवल मैं का मोह
कर्म उचित हो अथवा अनुचित, कर्म की प्रक्रिया में पाँचों कारण उपस्थित रहते हैं। इसलिए कर्म को समझना केवल परिणाम देखकर समाप्त नहीं होता; उसके कारणों को भी देखना पड़ता है। शरीर, वाणी और मन—तीनों से कर्म होता है। शरीर का कर्म बाहर दिखाई देता है, वाणी का कर्म दूसरे तक पहुँचता है और मन का कर्म भीतर दिशा बनाता है। जब ये तीनों असावधान हों, तो कर्म की दिशा भी विकृत हो सकती है। जब ये कर्तव्य के साथ जुड़े हों, तो कर्म में स्पष्टता आती है। श्लोक 15 मुझे अपने कर्म को केवल किए हुए काम तक नहीं, उसके भीतर के भाव, वचन और मन की दिशा तक देखने के लिए कहता है।
अहंकार का अर्थ केवल ऊँची आवाज़ में अपनी प्रशंसा करना नहीं है। कभी-कभी यह भीतर की उस जिद के रूप में आता है जिसमें मैं मान लेता हूँ कि सब कुछ मेरे कारण ही हुआ, या सब कुछ बिगड़ा तो केवल मेरे कारण ही बिगड़ा। दोनों ही स्थितियों में कर्म की पाँच कारणों वाली व्यवस्था ओझल हो जाती है। यहाँ श्रीकृष्ण उस अधूरी दृष्टि को पहचानने का अवसर दे रहे हैं।
इसलिए इन श्लोकों का स्मरण करते समय मुझे केवल पाँच शब्द याद नहीं रखने हैं। मुझे अपनी दृष्टि बदलनी है। कर्ता होने का अर्थ है अपना दायित्व स्वीकार करना; एकमात्र कर्ता मान लेने का अर्थ है शेष सत्य को भूल जाना। जब मैं इस भेद को समझता हूँ, तब कर्म के प्रति मेरा प्रेम बना रहता है, पर उसके फल के साथ मेरा अहंकार कम हो सकता है। यही समझ कर्तव्य को बोझ नहीं, साधना की दिशा में रखती है।
सार यही है कि कर्म करते समय अपने शरीर को आधार, अपने को कर्ता, इन्द्रियों को साधन, अपने निरन्तर प्रयत्न को चेष्टा और दैव को पाँचवाँ कारण समझना है। इस समझ के साथ कर्म करने पर जिम्मेदारी बनी रहती है, पर अहंकार कम होता है। मैं अपने हिस्से का कर्म अधिक सजगता से कर सकता हूँ, क्योंकि मुझे पता है कि सजगता का अर्थ अपने को अकेला सर्वकर्ता मान लेना नहीं है।
श्रीकृष्ण की यह शिक्षा सफलता और असफलता, दोनों के समय उपयोगी है। सफलता मिले तो पाँचों कारणों को याद करके मन शांत रह सकता है। बाधा आए तो प्रयास को देखकर उससे सीख सकते हैं, साधनों को सुधार सकते हैं और फिर भी अपने को पूरी तरह दोष के बोझ में नहीं दबा सकते। कर्म का मार्ग तब अधिक ईमानदार, अधिक विनम्र और अधिक स्थिर बनता है।
स्रोत
स्रोत: डॉ. राजेश तकयार®, श्रीमद्भगवद्गीता — भाग 18 — मोक्ष