11 अक्टूबर 2026 · डॉ. राजेश तकयार
भाग 7 — मैं कौन हूँ

श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि मन को उनमें लगाकर और उनका आश्रय लेकर योग का अभ्यास करने से वे उनके वास्तविक स्वरूप को जान सकते हैं। अब वे ऐसा ज्ञान समझाने जा रहे हैं जो विचार के साथ अनुभव से भी जुड़ा हुआ है। किसी विषय के बारे में सुन लेना और उसे अपने अनुभव में पहचान लेना अलग अवस्थाएँ हैं। श्रीकृष्ण अर्जुन को उसी पहचान की ओर ले जाते हैं। परम सत्य को जानने की इच्छा बहुतों में होती है, पर उसके लिए जीवन को साधना में लगाने वाले विरले होते हैं। वे अपनी प्रकृति के दो रूप बताते हैं। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार उनकी आठ प्रकार की प्रकृति हैं। इनके अतिरिक्त जीवस्वरूप उनकी श्रेष्ठ प्रकृति है, जिसके द्वारा जगत धारण किया जाता है। इस प्रकार संसार में दिखाई देने वाले पदार्थ और जीवन की चेतना, दोनों का आधार परमात्मा है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि समस्त जगत का उद्गम और अंत उन्हीं में है। उनसे बढ़कर कोई दूसरा परम आधार नहीं है। वे मोतियों और धागे का उदाहरण देते हैं। मोती अलग-अलग दिखाई देते हैं, लेकिन उन्हें एक माला में रखने वाला धागा भीतर रहता है। उसी प्रकार संसार में अनेक रूप दिखाई देते हैं, पर उनका आधार एक ही है। श्रीकृष्ण अर्जुन की दृष्टि को जीवन की परिचित वस्तुओं की ओर ले जाते हैं। जल का रस, सूर्य और चन्द्रमा का प्रकाश, पृथ्वी की पवित्र सुगंध, अग्नि का तेज और प्राणियों का जीवन—इन सबमें वे अपनी उपस्थिति बताते हैं। बुद्धिमानों की बुद्धि और बलवानों का कामना तथा आसक्ति से रहित बल भी उन्हीं से है। ऐसी इच्छा, जो धर्म के विरुद्ध न हो, उसमें भी उनका ही आधार है। परमात्मा को पहचानने के लिए जीवन के मूल गुणों को ध्यान से देखना आवश्यक है। फिर भी मनुष्य इस सत्य को आसानी से नहीं पहचानता। सत्त्व, रज और तम से उत्पन्न भाव उसे अपने प्रभाव में ले लेते हैं। वह बदलती हुई अवस्थाओं में इतना उलझ जाता है कि उनके पीछे स्थित अविनाशी आधार उसकी दृष्टि से ओझल हो जाता है। श्रीकृष्ण इस त्रिगुणमयी माया को पार करना कठिन बताते हैं। जो उनका आश्रय लेते हैं, वे इसे पार कर सकते हैं। यह आश्रय मन और जीवन की दिशा को परमात्मा की ओर मोड़ने से जुड़ा है। वे चार प्रकार के भक्तों का उल्लेख करते हैं। कोई दुःख से राहत चाहता है, कोई किसी उपलब्धि की इच्छा से आता है, कोई सत्य जानने को उत्सुक होता है और कोई ज्ञान के साथ उनसे जुड़ा रहता है। ये सभी उनके समीप आने वाले हैं। इनमें ज्ञानी की भक्ति विशेष है। उसके लिए परमात्मा केवल किसी इच्छा की पूर्ति का साधन नहीं रह जाते। वह उन्हें ही अपना परम लक्ष्य मानता है। धीरे-धीरे उसकी समझ में यह सत्य उतरता है कि समस्त अस्तित्व का आधार वासुदेव ही हैं। कामनाओं से प्रेरित उपासना अपने अनुरूप फल देती है। पर जिन उपलब्धियों की अवधि सीमित है, उनसे मिलने वाली तृप्ति भी सीमित रहती है। श्रीकृष्ण अर्जुन का ध्यान उस प्राप्ति की ओर ले जाते हैं जो नश्वर फलों से आगे है। मनुष्य जब परमात्मा को केवल दिखाई देने वाले रूप की सीमा में समझता है, तब उनके अजन्मा और अविनाशी स्वरूप को नहीं जान पाता। इच्छा और द्वेष से उत्पन्न मोह उसकी दृष्टि को ढक देता है। अपने अनुकूल को पकड़ना और प्रतिकूल को हटाते रहना ही उसका जीवन बन जाता है। जब यह द्वन्द्व कम होता है, तब निष्ठा स्थिर होती है। मनुष्य जीवन, मृत्यु, कर्म और आत्मा के प्रश्नों को अधिक स्पष्टता से समझने लगता है। उसका चिंतन किसी एक क्षण की सुविधा से आगे बढ़ता है। श्रीकृष्ण का यह उपदेश अर्जुन को संसार के भीतर उपस्थित एकता पहचानने की ओर ले जाता है। अलग-अलग वस्तुओं में बिखरी हुई दृष्टि धीरे-धीरे उस एक आधार को देखने लगती है जिससे सब उत्पन्न होता है, जिसमें सब स्थित है और जिसकी ओर समर्पित मन अंततः लौटता है। लेखक ने इसका विस्तार अपनी निम्न पुस्तक में 66,800 शब्दों में किया है। श्रीमद्भगवद्गीता — भाग 7 — मैं कौन हूँ