23 अक्टूबर 2026 · डॉ. राजेश तकयार
साधना में संतुलन

साधना को पूरे दिन में देखना
हम साधना के लिए समय निकाल लेते हैं, लेकिन क्या साधना के लिए जीवन भी तैयार करते हैं? यह प्रश्न मुझे श्रीमद्भगवद्गीता के उस संवाद में बार-बार लौटाता है जहाँ श्रीकृष्ण अर्जुन से भोजन, नींद, जागरण और कर्म की बात करते हैं। परमात्मा की ओर बढ़ने के प्रसंग में ये बातें बहुत साधारण लग सकती हैं। फिर भी इन्हें छोड़कर भीतर की स्थिरता खोजने की हमारी जल्दी ही समझने योग्य है। हम ध्यान के क्षण को बदलना चाहते हैं, उस क्षण तक पहुँचने वाली दिनचर्या को नहीं देखते।
श्रीकृष्ण साधक के सामने जीवन का पूरा विस्तार रखते हैं। कितना लिया, कितना छोड़ा, कब विश्राम किया और किस भाव से काम किया; ये सब साधना से जुड़े प्रश्न हैं। मन को एक दिशा में लगाना है तो अपनी गतिविधियों की दिशा भी देखनी होगी। दिन भर इच्छाओं के पीछे भागने के बाद केवल आसन पर बैठ जाना भीतर के बिखराव का अपने-आप अंत नहीं कर देता। इसी तरह शरीर को लगातार कष्ट देते रहना भी आत्मिक प्रगति का प्रमाण नहीं बन जाता।
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः।
न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन॥ १६ ॥
इस श्लोक के सामने मैं अपने भीतर की उस धारणा को रखता हूँ जो हर उपलब्धि को अधिक करने से जोड़ देती है। अधिक भोजन सुख देगा, अधिक उपवास पवित्र करेगा, अधिक जागरण साधना बढ़ाएगा; मन कितनी जल्दी मात्रा को मूल्य समझ लेता है। श्रीकृष्ण हमें इसी जल्दी से बाहर लाते हैं। वे अति के दोनों सिरों की ओर संकेत करते हैं। कोई एक सिरा छोड़कर दूसरे पर पहुँच जाना संतुलन नहीं है। हमें अपने जीवन को संयम के योग्य बनाना है।
साधना की गंभीरता का अर्थ अपने प्रति कठोरता का प्रदर्शन नहीं हो सकता। यदि मेरा ध्यान इसी हिसाब में लगा है कि मैंने दूसरों से कितना अधिक सहा, तो मैं भीतर किसे बड़ा कर रहा हूँ? परमात्मा की ओर मेरी दृष्टि है या अपने साधक होने की छवि की ओर? संयम मुझे इस प्रश्न से बचाता नहीं। वह मेरे अभ्यास, उसकी नीयत और उसके दैनिक परिणाम को एक साथ देखने का आग्रह करता है।
इसलिए मैं योग को दिन में अलग रखे एक छोटे हिस्से में सीमित नहीं देखता। उसके लिए बैठना आवश्यक हो सकता है, लेकिन उसके अनुरूप जीना भी उतना ही गंभीर विषय है। उठने से लेकर अपने दायित्व पूरे करने तक, जीवन में जो क्रम बनता है, उसी में साधना की भूमि तैयार होती है। ईश्वर को स्मरण करने वाला मन अपने सामान्य व्यवहार से अलग कोई दूसरा मन नहीं है। जिसे दिन भर बिखेरूँ, उसे कुछ क्षणों में स्थिर करने की माँग भी मुझे स्वयं से ही करनी पड़ती है।
आहार में आवश्यकता और आसक्ति
भोजन के प्रसंग में श्रीकृष्ण दो विपरीत अतियों से सावधान करते हैं। एक ओर निरंतर लेने की इच्छा है, दूसरी ओर छोड़ने की ऐसी जिद है जिसमें अपनी सीमा की सुध नहीं रहती। इन दोनों में मन का आग्रह काम कर सकता है। एक स्वाद के पीछे खिंचता है, दूसरा अपने त्याग के विचार से बँध जाता है। संयम का प्रश्न केवल थाली का नहीं रह जाता; वह उस इच्छा का प्रश्न भी है जो थाली के सामने बैठी है।
मैं अपनी आवश्यकता और अपनी चाह को एक ही बात मान लूँ तो सीमा पहचानना कठिन होगा। जो सामने है उसे लेने की स्वतंत्रता के साथ, पर्याप्त होने पर रुकने की सजगता भी चाहिए। यहीं आत्म-संयम का सरल अभ्यास दिखाई देता है। हर इच्छा को आदेश मानकर पूरा करना आवश्यक नहीं। उसका उठना और उसके पीछे चल देना दो अलग स्थितियाँ हैं। अपने व्यवहार को देखने की यह जगह बची रहे, तभी चुनाव में विवेक आ सकता है।
दूसरी ओर त्याग का भी उद्देश्य समझना होगा। यदि छोड़ना ही अपने-आप में लक्ष्य बन जाए तो साधना का मूल आशय पीछे छूट सकता है। श्रीकृष्ण का संकेत शरीर और मन को परमात्मा की ओर लगाने का है। उन्हें ऐसे संघर्ष में उलझाना, जिसमें ध्यान सदा अपनी ही कठिनाई पर रहे, उस दिशा को उलझा देता है। मैं अपने नियम की कठोरता गिनता रहूँ और उसका प्रयोजन भूल जाऊँ तो नियम का पालन करते हुए भी उसके अर्थ से दूर हो सकता हूँ।
इससे अनुशासन का मूल्य कम नहीं होता। अनुशासन को समझ मिलती है। संयमित आहार का भाव आवश्यकता के अनुरूप ग्रहण करना है; अति भोग और अति त्याग की खींचतान में पड़ जाना नहीं। अपनी चाह को सीमित करना और अपनी आवश्यकताओं का सम्मान करना साथ-साथ संभव हैं। साधक को दोनों में अंतर पहचानना है। अपने भीतर की आसक्ति को देखे बिना केवल बाहरी मात्रा घटा देना उस पहचान का पूरा विकल्प नहीं बनता।
मुझे यहाँ एक छोटी-सी सावधानी उपयोगी लगती है। मैं अपने किए को श्रेष्ठ घोषित करने से पहले यह देखूँ कि उससे मन की दिशा क्या बन रही है। क्या मैं अधिक सजग हुआ हूँ? क्या मेरा ध्यान अपने लक्ष्य पर है? क्या अपने संयम के कारण भीतर विनम्रता आई है, या दूसरों के जीवन पर निर्णय देने का उत्साह बढ़ा है? अभ्यास का मूल्य मेरे भीतर दिखाई देना चाहिए; केवल उसके वर्णन में नहीं।
भोजन जीवन के साधारण कामों में है, फिर भी उसके सामने हमारा स्वभाव खुल सकता है। हमें हमेशा किसी बड़े अवसर की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती। आवश्यकता, इच्छा और संयम का अंतर प्रतिदिन सामने आता है। उसी को समझते हुए आगे बढ़ना साधना को व्यवहार से जोड़ता है। मैं जितना इस संबंध को पहचानता हूँ, उतना ही स्पष्ट होता है कि आध्यात्मिक जीवन की शुरुआत सामान्य जीवन को तुच्छ समझने से नहीं की जा सकती।
विश्राम और जागरण की मर्यादा
नींद और जागरण पर श्रीकृष्ण का संकेत भी उतना ही स्पष्ट है। वे अत्यधिक सोने और निरंतर जागते रहने, दोनों को साधना के अनुकूल नहीं बताते। यहाँ हमें विश्राम का स्थान समझना है। कभी हम काम या अभ्यास में लगे रहने को ही निष्ठा मान लेते हैं। रुकना हमें कमजोरी लगता है। लेकिन साधना के लिए सजगता चाहिए; अपनी आवश्यकता से लगातार संघर्ष करने की हठ को ही सजगता नहीं कहा जा सकता।
विश्राम स्वीकार करने में एक प्रकार की ईमानदारी है। मैं अपने शरीर और मन की सीमा को पहचानता हूँ। उसे स्वीकार करना अपने लक्ष्य से पीछे हटना नहीं है। लक्ष्य तक पहुँचने वाले साधनों का ध्यान रखना भी उसी निष्ठा का भाग है। दूसरी ओर विश्राम के नाम पर दायित्व टालते रहना अलग बात है। आराम और आलस्य का भेद उनके बाद की दिशा में दिखाई देता है: क्या मैं अपने कर्म की ओर लौटता हूँ, या उससे लगातार बचता जाता हूँ?
जागना भी केवल आँखों के खुले रहने का नाम नहीं हो सकता। जागे हुए समय का उपयोग कैसा है, यह प्रश्न साथ चलता है। यदि समय मिलता रहे और काम बिना कारण टलते रहें, तो केवल देर तक जागते रहने से अनुशासन नहीं आ जाता। साधना की दृष्टि समय को भरने से आगे जाती है। वह उसके उपयोग में निष्ठा, क्रम और विवेक चाहती है। अपने जागरण को उद्देश्य से जोड़ना, उसकी अवधि पर गर्व करने से अधिक गंभीर काम है।
मैं इस शिक्षा में कोई प्रतियोगिता नहीं देखता कि कौन कम सोकर या अधिक जागकर बड़ा साधक कहलाएगा। तुलना साधना की दृष्टि को फिर बाहर ले जाती है। मुझे अपने जीवन में वह क्रम पहचानना है जो दायित्व और अभ्यास दोनों के प्रति ईमानदार रखे। दूसरों के सामने अपना कठोर नियम बताना सरल है; अकेले में उस नियम के पीछे की चाह को पहचानना अधिक कठिन हो सकता है। इसलिए संयम में भीतर की सच्चाई भी आवश्यक है।
दिनचर्या का क्रम हमें बार-बार उसी मूल प्रश्न तक लाता है: मैं किसके लिए यह सब कर रहा हूँ? यदि लक्ष्य आत्मिक स्थिरता है, तो अपने जीवन में अनावश्यक बिखराव बढ़ाकर उसी स्थिरता की अपेक्षा करना विरोध पैदा करता है। उचित विश्राम, सजग जागरण और नियमित अभ्यास को एक-दूसरे का विरोधी मानने की आवश्यकता नहीं। वे एक ही जीवन के अंग हैं। साधना का अर्थ उनके बीच संबंध पहचानना और उस संबंध के प्रति सावधान रहना भी है।
कर्म और भीतर के स्मरण का मेल
श्रीकृष्ण आगे कर्म की चेष्टाओं को भी संयम से जोड़ते हैं। मेरे लिए यह संकेत बहुत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि हम कभी आध्यात्मिक जीवन और सामान्य जिम्मेदारियों के बीच दीवार खड़ी कर देते हैं। लगता है कि परिवार के काम, समाज के दायित्व और अपनी आजीविका साधना से अलग विषय हैं। फिर भीतर की शांति के लिए बाहर के कामों से असंतोष होने लगता है। गीता का यह प्रसंग उस विभाजन पर दोबारा विचार करने को कहता है।
कर्म में संयम का अर्थ दायित्व को पहचानकर निभाना है। काम समय पर करना, आलस्य और अति प्रयास से सावधान रहना तथा समर्पण के साथ कर्म करना; ये बातें अभ्यास की भूमि बनाती हैं। मैं किसी काम को बार-बार टालूँ और फिर एक ही समय में सब पूरा करने की बेचैनी में घिर जाऊँ तो अपने बिखराव में मेरा अपना हिस्सा भी है। उसे देखना आवश्यक है। केवल परिस्थितियों को दोष देकर अपने चुनावों से मुक्त नहीं हुआ जा सकता।
इसी प्रकार केवल काम में डूबे रहने से भीतर की साधना अपने-आप पूरी नहीं हो जाती। जीवन का बाहर और भीतर, दोनों पक्ष हैं। एक को निभाते हुए दूसरे को भुला देना अधूरापन छोड़ता है। परिवार की जिम्मेदारियाँ भूलकर भजन में लगे रहना और सारी चेतना सांसारिक कामों में लगाकर ईश्वर-स्मरण को भुला देना, दोनों पर विचार करना होगा। बाहर कर्म करते हुए भीतर ईश्वर को याद रखना इसी संतुलन की दिशा है।
समर्पण का भाव मेरे काम को लापरवाह नहीं बनाता। वह उसमें निष्ठा चाहता है। जिस दायित्व को अपना मानकर लिया है, उसे पूरा करना भी मेरे व्यवहार की परीक्षा है। यदि साधना के नाम पर दूसरों पर अपना भार रख दूँ, तो अपने जीवन का संतुलन केवल अपनी सुविधा से माप रहा हूँ। परिवार और समाज के साथ रहने में अपनी आवश्यकताओं के साथ दूसरों के प्रति उत्तरदायित्व भी जुड़ा है। अध्यात्म और व्यवहार का मेल यहीं दिखाई देता है।
मुझे अपनी दिनचर्या को देखकर पूछना चाहिए कि उसमें किस बात को सदा जगह मिलती है और कौन-सी बात सदा टलती है। केवल इच्छा के लिए समय निकलता रहे और आवश्यक कर्म तथा आत्मचिंतन पीछे रहें तो इसे पहचानना पहला ईमानदार कदम है। संतुलन किसी एक काम को थोड़ा कम करने तक सीमित नहीं। वह जीवन की दिशा में आवश्यक चीजों को उनका उचित स्थान देने की समझ है।
संतुलन को जीवन का अभ्यास बनाना
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥ १७ ॥
इस श्लोक में आहार, विहार, कर्म, नींद और जागरण एक साथ आते हैं। किसी एक आदत को सँभालकर शेष जीवन से आँख नहीं मूँदी जा सकती। ध्यान के समय की गंभीरता और सामान्य व्यवहार की असावधानी साथ बनी रहें तो साधना भीतर प्रश्न उठाएगी। योग को जीवन का मार्ग मानना इसी प्रश्न को स्वीकार करना है। मैं केवल अपने अभ्यास का समय नहीं देखता; उसके बाहर अपने मन की दिशा भी देखता हूँ।
यहाँ दुःख से मुक्ति का आशय भी भीतर की अशांति, इच्छाओं से उत्पन्न पीड़ा और बंधन के संदर्भ में खुलता है। साधना का लक्ष्य केवल दिन को सुविधाजनक बना लेना नहीं है। उसे आत्मा और परमात्मा के संबंध की ओर जाना है। संयम उस यात्रा को दैनिक व्यवहार में आधार देता है। जो जीवन हर इच्छा के साथ दिशा बदल देता है, उसमें स्थिरता की चाह को अपने ही आचरण के सामने खड़ा होना पड़ेगा।
सुख और दुःख के प्रति दृष्टि भी इसी अभ्यास में आती है। सुख आए तो उसमें डूबकर अपना विवेक न छोड़ दूँ; कठिनाई आए तो उसे ही जीवन का अंतिम सत्य न मान बैठूँ। दोनों स्थितियों में अपने कर्म और ईश्वर-स्मरण की दिशा बचाए रखना संयम की गहरी परीक्षा है। बाहर का क्रम भीतर की दृष्टि से जुड़ता है। केवल नियमों की सूची बना लेने से यह काम समाप्त नहीं होता।
मैं इस अभ्यास को किसी बड़े प्रदर्शन से शुरू करने की आवश्यकता नहीं देखता। अपनी सामान्य दिनचर्या में जहाँ अति है, जहाँ टालना है और जहाँ लक्ष्य से विस्मृति है, वहाँ सचमुच ध्यान देना पर्याप्त आरंभ है। फिर उस समझ को व्यवहार में बनाए रखना है। आज पहचानी हुई बात कल भी मेरे कर्म में दिखाई दे, तभी विचार अभ्यास बनता है। संयम का मूल्य उसके निरंतर स्मरण और पालन में खुलता है।
अंततः साधना में संतुलन का अर्थ अपने जीवन को परमात्मा की ओर एक साथ ले जाना है। भोजन, विश्राम, काम और स्मरण अलग दिशाओं में न खींचें; उनमें समझ का संबंध बने। मुझे अपने साधक होने का प्रमाण किसी असाधारण कठोरता में खोजने की जल्दी नहीं रहती। मैं पहले यह देखता हूँ कि साधारण जीवन में कितना सजग, कितना उत्तरदायी और कितना संयमित होकर जी रहा हूँ। यही प्रश्न प्रतिदिन साधना को मेरे पास वापस ले आता है।