भारतीय ज्ञान परंपरा को सरल और प्रामाणिक रूप में समझाने का एक प्रयास...

12 अक्टूबर 2026 · डॉ. राजेश तकयार

समय का मूल्य

समय का मूल्य

समय का सम्मान जीवन का सम्मान है

हम समय को बिताने की बात बहुत सहजता से कह देते हैं, पर यह नहीं देखते कि समय के साथ हमारा अपना जीवन बीत रहा है। जिस समय में कुछ सीख सकते थे, किसी का दुःख सुन सकते थे, अपना कोई कर्तव्य पूरा कर सकते थे, उसी को बिना किसी उद्देश्य के खो देना छोटी बात नहीं है। जीवन का मूल्य केवल इस बात से नहीं बनता कि हम कितने वर्ष रहे। यह भी देखना होगा कि जो समय मिला, उसमें हमने अपने भीतर क्या सुधारा और हमारे होने से किसी दूसरे का क्या भला हुआ।

श्रीमद्भगवद्गीता के भाग 10 में, श्लोक 10.30 की व्याख्या में लेखक ने लिखा है, “समय का सम्मान करने का अर्थ है ईश्वर का सम्मान करना।” समय को केवल घड़ी की सुइयों में देखने से उसका पूरा अर्थ नहीं खुलता। उसी समय में परिवर्तन होता है, अवसर सामने आते हैं और कर्म का परिणाम प्रकट होता है। इसलिए समय का आदर करने वाला मानव अपने जीवन के अवसरों का भी आदर करता है। वह अपने आज को इतना सस्ता नहीं मानता कि उसे किसी भी व्यर्थ आकर्षण के हाथ सौंप दे।

अपने दिन को देखकर स्वयं से पूछना चाहिए कि आज मैंने किस काम को अपना समय दिया। क्या उस काम से समझ बढ़ी, कोई उत्तरदायित्व पूरा हुआ, मन में संयम आया या किसी प्राणी को सहारा मिला? यदि घंटों के बाद भी केवल असंतोष, द्वेष और नई इच्छाएँ हाथ आईं, तो अपने चुनाव पर विचार करना होगा। व्यस्त रहना अपने आप में जीवन की सार्थकता का प्रमाण नहीं है। काम की दिशा और उसके पीछे का भाव भी देखना आवश्यक है।

कुछ हासिल होने का अर्थ केवल धन मिलना नहीं है। पुस्तक पढ़कर कोई भ्रम दूर होना भी प्राप्ति है। बुज़ुर्ग के पास बैठकर उसकी बात सुनना भी सार्थक है। किसी असहाय जीव की सेवा में लगा समय भी जीवन को अर्थ देता है। जिस काम का मूल्य रुपये में न गिना जा सके, उसे निष्फल कह देना हमारी समझ की कमी होगी। गीता में सब प्राणियों के हित में लगे रहने की बात इसी व्यापक दृष्टि को सामने रखी गई है।

इसका अर्थ यह भी नहीं कि मानव हर क्षण अपने शरीर को काम में लगाए रखे। भाग 6 में कर्म और विश्राम, दोनों में ईश्वर-भाव की चर्चा है। आवश्यक विश्राम को व्यर्थ समय नहीं कहा जा सकता। बात उस असावधानी की है जिसमें हम स्वयं नहीं जानते कि अपना समय किसे और क्यों दे रहे हैं। जीवन में कर्तव्य, अध्ययन, सेवा और विश्राम को स्थान मिले; केवल इच्छाओं के पीछे भागते रहने को जीवन की उपलब्धि न मान लिया जाए।

फल अपने समय पर आता है

समय का मूल्य समझने के साथ उसके विधान को समझना भी आवश्यक है। पुस्तक कृष्ण की राधा के “श्रीराधाकृष्ण दर्शन” प्रसंग में श्रीकृष्ण देवताओं से कहते हैं, “जैसे वृक्ष अपने-अपने समय पर फूलते और फलते हैं, वैसे ही कर्मों के फल भी अपने समय पर प्रकट होते हैं। कोई फल समय से पहले नहीं आता और कोई कर्म बिना परिणाम के नहीं रहता।” यह बात हमारे उतावले मन को ठहरकर समझनी चाहिए।

हमें प्रायः अपना इच्छित परिणाम तुरंत चाहिए। प्रयास किया और उसी क्षण सफलता मिल जाए; इच्छा उठी और परिस्थिति उसी के अनुसार बदल जाए। जब ऐसा नहीं होता, तो भीतर बेचैनी बढ़ने लगती है। उस बेचैनी में हम उचित-अनुचित का अंतर भूल सकते हैं। जल्दी पाने की इच्छा यदि छल, क्रोध या दूसरे का अहित करने की ओर ले जाए, तो हमने केवल धैर्य नहीं खोया, अपने कर्म की दिशा भी बिगाड़ ली।

भाग 5 में श्लोक 5.23 की व्याख्या में काम और क्रोध के वेग पर संयम की बात कही गई है। वहाँ लिखा है, “क्रोध में आकर मानव ऐसे कार्य कर बैठता है जिनका पछतावा उसे जीवन भर करना पड़ता है।” इसलिए किसी परिणाम में देर हो तो पहले अपने मन को सँभालना चाहिए। उतावले होकर गलत कर्म कर लेना समय बचाना नहीं है। ऐसा कर्म अपने साथ वह बोझ भी जोड़ देता है जिसे बाद में उठाना पड़ता है।

फल अपने समय पर आएगा, इसका अर्थ हाथ पर हाथ रखकर बैठना नहीं है। वृक्ष के फल का उदाहरण हमें फल के लिए धैर्य सिखाता है; अपने कर्तव्य से छुट्टी नहीं देता। भाग 6 की व्याख्या में खेत जोतने, भोजन बनाने, सेवा और लेखन-पठन तक को कर्मयोग की दृष्टि से देखा गया है। हमारे सामने जो उचित काम है, उसे पूरा करना है। परिणाम की जल्दी में उस काम की शुद्धता और अपने व्यवहार की मर्यादा नहीं खोनी है।

इसलिए दो बातें साथ रखनी होंगी। अच्छे कर्म की शुरुआत टालनी नहीं है और उसके फल के लिए अधीर नहीं होना है। अध्ययन आज किया जा सकता है, समझ को गहरा होने का समय देना होगा। सेवा आज की जा सकती है, उसके बदले सम्मान की माँग नहीं रखनी चाहिए। अपने दोष को पहचानने का काम आज हो सकता है, उसे सुधारने में निरंतर अभ्यास करना होगा। यही धैर्य है जिसमें कर्म भी है और अपने मन पर निगरानी भी।

जो समय मिले, उसे ज्ञान में लगाएँ

भाग 5 में श्लोक 5.22 की व्याख्या करते हुए भगवान् के बताने को समझाने के लिए लेखक ने कहा कि, “मोबाइल पर गेम खेलना या सोशल मीडिया में घंटों समय बिताना; समय बरबाद करना है।” यह चेतावनी उस मन के लिए है जो क्षणिक आकर्षण का दास बन जाता है। एक बात के बाद दूसरी बात, एक दृश्य के बाद दूसरा दृश्य सामने आता रहता है और मानव अपने समय का हिसाब खो देता है। उसे ठहरकर देखना चाहिए कि इस सबके बाद उसके भीतर क्या बचा है।

सोशल मीडिया पर सामने आई हर बात को केवल इसलिए सत्य नहीं मान लेना चाहिए कि उसे बार-बार दिखाया जा रहा है। झूठी और तथ्यहीन बातों में उलझकर, उन्हें दूसरों तक पहुँचाकर या उनके आधार पर क्रोध करते रहकर हम अपने विवेक का उपयोग नहीं करते। ऐसी सामग्री पर अपना समय खर्च करना किस उपलब्धि की ओर ले जा रहा है? यदि उससे केवल मन का भटकाव और कटुता बढ़ रही है, तो उस संग से हटना आवश्यक है।

अपने आवश्यक कामों के बाद जो समय मिले, उसका कुछ भाग पुस्तकों, शास्त्रों और ग्रंथों को समझने में लगाया जाए। भाग 5 में श्लोक 5.23 की व्याख्या में स्पष्ट लिखा है, “सत्संग और शास्त्र-पठन से भी इन पर विजय पाई जा सकती है।” यहाँ काम और क्रोध पर विजय की बात है। पढ़ना केवल जानकारी बढ़ाने का साधन नहीं; वह अपनी इच्छाओं, प्रतिक्रियाओं और जीवन की दिशा को देखने का अवसर भी बन सकता है।

पुस्तक के शब्दों से परिचय हो जाना और उन्हें जीवन में स्थान देना अलग बातें हैं। संयम पढ़कर भी यदि हमारी प्रतिक्रिया पहले जैसी उतावली रहे, करुणा पढ़कर भी यदि सामने वाले का दुःख हमें न छुए, तो पढ़े हुए पर फिर विचार करना होगा। भाग 5 में आत्मज्ञान को हृदय और आचरण के परिवर्तन से जोड़ा गया है। इसलिए जो पढ़ें, उसे अपने व्यवहार की कसौटी पर भी रखें। केवल दूसरे को सुनाने के लिए ज्ञान इकट्ठा न करें।

इस अध्ययन के लिए सारे संसार से मुक्त हो जाने की प्रतीक्षा क्यों करनी है? जितना समय व्यर्थ की उलझनों में चला जाता है, उसी में से कुछ समय बचाकर शुरुआत हो सकती है। किसी प्रसंग को ध्यान से पढ़ें, उसका अर्थ समझें और देखें कि वह अपने जीवन में कहाँ लागू होता है। जो समझ में न आए, उसे समझा हुआ घोषित न करें। अध्ययन में भी धैर्य चाहिए; ज्ञान को तुरंत पाने की उतावली उसी सीख के विरुद्ध होगी जिसे हम पढ़ रहे हैं।

सेवा में लगा समय व्यर्थ नहीं जाता

जीवन का खाली समय केवल अपने मनोरंजन के लिए नहीं है। हमारे आसपास बुज़ुर्ग हैं, सहायता की आवश्यकता रखने वाले लोग हैं, गायें हैं और दूसरे पशु-पक्षी हैं। उनके प्रति करुणा को अपने व्यवहार में स्थान देना भी समय का सदुपयोग है। भाग 5, श्लोक 5.25 की व्याख्या में “सर्व-भूत-हिते रताः” का अर्थ समझाते हुए कहा है कि ऐसे ज्ञानी “सब जीवों के कल्याण में आनंद पाते हैं।” यह भावना अपनी सुविधा की सीमा से आगे देखने को कहती है।

बुज़ुर्गों की सेवा को केवल परिवार की औपचारिक जिम्मेदारी समझकर नहीं करना चाहिए। भाग 6, श्लोक 6.31 की व्याख्या में लिखा है, “जब वह बुजुर्गों की सेवा करता है, तो अनुभव करता है कि वह भगवान की सेवा कर रहा है।” इस दृष्टि से सेवा का अर्थ बदल जाता है। सामने वाला हमारे समय में बाधा नहीं रहता; उसकी आवश्यकता हमारे अपने कर्म का अवसर बन जाती है। उसके पास बैठना, उसकी बात सुनना और अपने सामर्थ्य के अनुसार सहायता करना जीवन से बाहर का काम नहीं है।

गायों और दूसरे पशु-पक्षियों के प्रति भी यही करुणा होनी चाहिए। “सब प्राणियों” के हित की बात करते हुए हम उन्हें अपनी चिंता से बाहर कैसे रख सकते हैं? उनकी आवश्यकता को देखकर अपने सामर्थ्य और उचित समझ के अनुसार सेवा करें। अपने जीवन को केवल अपनी भूख, सुविधा और इच्छा तक सीमित रखने से वह व्यापकता नहीं आती जिसकी चर्चा गीता में है। जो अपने लिए बोल नहीं सकते, उनके प्रति संवेदनशील होना भी हमारे आचरण की परीक्षा है।

सेवा को निष्फल इसलिए न मानें कि उससे धन, प्रसिद्धि या प्रशंसा नहीं मिली। यदि हमारी हर सहायता के पीछे अपना लाभ खड़ा रहेगा, तो निष्काम भाव कहाँ रहेगा? सच्चा ज्ञानी केवल अपने कल्याण के लिए नहीं जीता। वह दूसरों के हित में भी आनंद पाता है। इसलिए बचा हुआ समय यदि किसी का दुःख हल्का करने में लगा, तो उसे खाली गया हुआ समय कहना उचित नहीं होगा।

पढ़ने और सेवा करने को अलग-अलग खानों में रखकर भी नहीं देखना चाहिए। शास्त्र से करुणा की समझ मिले और सेवा में वह करुणा व्यवहार बने। किसी पुस्तक में सबमें ईश्वर होने की बात पढ़ी और बाहर आकर किसी जीव को तुच्छ समझ लिया, तो पढ़ने का उद्देश्य अधूरा रह गया। भाग 6 की यही शिक्षा है कि भक्ति केवल पूजा के समय तक सीमित न रहे। हमारे काम, संबंध और व्यवहार में भी उसका प्रभाव दिखाई दे।

अच्छे काम बुढ़ापे के लिए क्यों टालें?

यह कहकर इन बातों को मत ठुकराइए कि पुस्तकें पढ़ना, भक्ति करना और सेवा करना बुढ़ापे के काम हैं। कोई यह निश्चित करके नहीं बता सकता कि उसके लिए बुढ़ापा आएगा ही और तब वह अपनी इच्छा के सभी अच्छे काम कर सकेगा। जिस वर्तमान में अवसर मिला है, उसे अनिश्चित भविष्य के भरोसे क्यों छोड़ा जाए? भाग 5 की व्याख्या के शब्द हैं, “यह जीवन ही साधना का क्षेत्र है।” यह बात अपने आज पर लागू करनी है।

महानता के लिए वृद्धावस्था की प्रतीक्षा आवश्यक नहीं है। प्रह्लाद का उदाहरण सामने है। भाग 10, श्लोक 10.30 की व्याख्या में उनका बालक होते हुए भी निडर भक्ति, अटल विश्वास, करुणा और क्षमा का आदर्श वर्णित है। विपरीत परिस्थितियों में भी उन्होंने अपने विश्वास को नहीं छोड़ा। यह धार्मिक आख्यान हमें बताता है कि सत्य और भक्ति में दृढ़ रहने के लिए पहले वृद्ध हो जाना कोई शर्त नहीं है।

माधवशिव के अध्याय “20: इंद्र बने शिव” में उपमन्यु का प्रसंग भी यही दिशा दिखाता है। बाल्यावस्था में आरंभ हुई उनकी भक्ति का केंद्र धीरे-धीरे अपनी इच्छा से हटकर भगवान् शिव पर हो जाता है। सामने प्रलोभन आने पर भी वे अपने आराध्य को नहीं बदलते। पुस्तक में वे आगे शिव-तत्त्व के महान आचार्य के रूप में प्रतिष्ठित होते हैं। उनके जीवन की उस दिशा का आरंभ बुढ़ापे की प्रतीक्षा में नहीं, बचपन में ही हो चुका था।

इन प्रसंगों का अर्थ यह नहीं कि हर महान जीवन एक ही आयु में अपना कार्य पूरा करता है। यहाँ समझने की बात इतनी है कि ऊँचे जीवन की नींव रखने के लिए उम्र बढ़ने की प्रतीक्षा आवश्यक नहीं। प्रह्लाद की दृढ़ता और उपमन्यु की निष्ठा हमें अपने आज को पहचानने की प्रेरणा देती हैं। हमें भी अपने सामर्थ्य के अनुसार सत्य, अध्ययन, संयम और सेवा की शुरुआत करनी है। दूसरों के जीवन की चर्चा तभी उपयोगी होगी जब उससे अपने जीवन में कोई अच्छा परिवर्तन आए।

समय को लेकर हमारा संकल्प स्पष्ट हो। जिन उलझनों से विवेक नहीं बढ़ता और किसी का हित नहीं होता, उनमें अपना जीवन न गँवाएँ। फल की जल्दी में गलत कर्म न करें। जो समय उपलब्ध है, उसमें अपने कर्तव्य पूरे करें, पुस्तकें पढ़ें, बुज़ुर्गों की सेवा करें और गायों सहित पशु-पक्षियों के प्रति करुणा रखें। अच्छे काम के लिए बुढ़ापे को बुलाने की आवश्यकता नहीं है। समय अभी हमारे सामने है; उसका सम्मान भी अभी अपने कर्मों से करना है।

संदर्भ: कृष्ण की राधा
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