भारतीय ज्ञान परंपरा को सरल और प्रामाणिक रूप में समझाने का एक प्रयास...

12 अक्टूबर 2026 · डॉ. राजेश तकयार

मृत्यु के बाद ईश्वर क्यों ज़रूरी हैं

मृत्यु के बाद ईश्वर क्यों ज़रूरी हैं

आत्मा और शरीर का भेद

आत्मा अनादि है; वह न जन्म लेता है, न मरता है। परंतु जब वह शरीर में प्रवेश करता है, तो वह अपने मूल स्वरूप यानि ईश्वर को भूल जाता है। यह विस्मृति ही जन्म-मृत्यु का कारण बनती है। ईश्वर आत्मा का घर हैं। मृत्यु के बाद जब आत्मा ईश्वर में विलीन होता है, तो वह लौटने की आवश्यकता से मुक्त हो जाता है। उसे न स्वर्ग चाहिए, न पुनर्जन्म; क्योंकि उसे लगता है कि उसे अपने घर का अनुभव मिल गया है, जो होता नहीं।

आत्मा न कभी जन्म लेता है, न कभी मरता है; वह नित्य है, शाश्वत है, सदा से है और सदा रहेगा। आत्मा का यह सत्य हर जीव के भीतर छिपा हुआ है। जब कोई मानव किसी दूसरे प्राणी को देखता है, तो केवल उसका शरीर देखता है, पर उस शरीर के भीतर जो चेतना, जो जीवन की झिलमिलाहट है; वह आत्मा है, समझ नहीं पाता। शरीर मिट्टी से बना है और एक दिन मिट्टी में मिल जाएगा, पर आत्मा का कोई अंत नहीं। जिस प्रकार आकाश में बादल आते और चले जाते हैं, पर आकाश वहीं का वहीं रहता है, उसी प्रकार आत्मा सदा रहता है, केवल शरीर बदलता है। मृत्यु केवल शरीर का त्याग है, आत्मा की यात्रा का अंत नहीं। वह अदृश्य है, परंतु सबसे वास्तविक सत्य वही है। वह उस ऊर्जा की तरह है जो हर जीव में समान रूप से प्रवाहित हो रहा है। जो इस आत्मा के स्वरूप को समझ लेता है, वह जान लेता है कि जीवन और मृत्यु केवल एक नाटक हैं, आत्मा सदा जीवित रहता है।

विस्मृति और जन्म-मृत्यु का चक्र

जब आत्मा शरीर में प्रवेश करता है, तब वह अपने मूल स्वरूप, ईश्वर को भूल जाता है। यह भूलना ही माया या विस्मृति है। इस विस्मृति के कारण आत्मा अपने असली घर को भूलकर शरीर, परिवार, धन, और संसार को अपना घर समझ लेता है। वह स्वयं को शरीर मानने लगता है कि मैं यह शरीर हूँ, मैं पुरुष हूँ, मैं स्त्री हूँ, मैं अमीर हूँ, मैं गरीब हूँ, मैं विद्वान हूँ; ये सभी पहचानें अस्थायी हैं। वास्तव में आत्मा न पुरुष है, न स्त्री, न अमीर, न गरीब; वह तो केवल चेतना का अंश है, जो ईश्वर से उत्पन्न हुआ है। जब आत्मा शरीर में आता है, तो उसे पाँचों इंद्रियाँ घेरे रहती हैं; देखना, सुनना, सूंघना, स्वाद लेना, और स्पर्श करना। ये इंद्रियाँ आत्मा को बाहर की दुनिया में खींच ले जाती हैं। वह शरीर के सुख-दुःख, आशा-निराशा में फँस जाता है और अपने वास्तविक अस्तित्व को भूल जाता है। यह विस्मृति ही जन्म और मृत्यु का कारण बनती है।

जब आत्मा अपने ईश्वरीय स्वरूप को भूल कर संसार में भोग, वासना, क्रोध, ईर्ष्या और लोभ में फँस जाता है, तो वह कर्मों की बेड़ियों में जकड़ जाता है। एक जन्म में अधूरी इच्छाएँ अगला जन्म बनाती हैं। यही कारण है कि जीवन बार-बार दोहराया जाता है; कभी मानव, कभी पशु, कभी पक्षी, कभी देवता रूप में। जब तक आत्मा को अपनी सच्ची पहचान याद नहीं आती, तब तक वह इस चक्र से मुक्त नहीं हो पाता। ईश्वर ही आत्मा का मूल है, और वही उसका अंतिम गंतव्य है। जैसे नदी समुद्र से निकलकर अंत में उसी में मिल जाती है, वैसे ही आत्मा ईश्वर से निकलकर संसार में यात्रा करता है और अंततः उसी में विलीन हो जाता है। वह विलय ही मोक्ष या मुक्ति कहलाता है। ईश्वर सबके भीतर हैं; जब आत्मा अपने भीतर उस परमात्मा को पहचान लेता है, तो उसकी सारी पीड़ा मिट जाती है। तब उसे न स्वर्ग की आवश्यकता रहती है, न पुनर्जन्म की। क्योंकि उसे अपने घर, ईश्वर का अनुभव हो चुका होता है। वह केवल ईश्वर की कृपा और आत्मिक अनुभव से ही प्रकट होता है। यह अनुभव तब होता है जब मन शांत होता है, जब इच्छा, अहंकार और भय समाप्त होते हैं। जब आत्मा अपने स्रोत यानि ईश्वर में लौट जाता है, तो उसे फिर लौटने की आवश्यकता नहीं पड़ती। वह मुक्त हो जाता है, जैसे दीपक का प्रकाश सूरज में विलीन हो जाए।

ईश्वर ही आत्मा का घर हैं

यह तब होता है जब आत्मा अपने ईश्वरीय स्वरूप को पहचान लेता है। जब आत्मा यह समझ लेता है कि मैं अनादि, शाश्वत और ईश्वर का अंश हूँ, तब वह संसार के मोह और दुःख से मुक्त हो जाता है। ईश्वर आत्मा का घर हैं, क्योंकि वह ईश्वर का ही अंश है। जैसे किसी यात्री को अंततः अपने जन्म-स्थान पर लौटने पर शांति मिलती है, वैसे ही आत्मा को भी तब शांति मिलती है, जब वह संसार की थकान छोड़कर ईश्वर में विश्राम पाता है। वह स्थिति आनंद की है, जहाँ कोई इच्छा नहीं, कोई भय नहीं, केवल शांति और प्रेम है। यही उसका परम धाम जो है, जहाँ से लौटना नहीं पड़ता। जो आत्मा ईश्वर में लीन हो जाता है, वह पुनर्जन्म नहीं लेता क्योंकि उसकी सभी इच्छाएँ समाप्त हो चुकी हैं। वह अपने घर पहुँच गया है; वह घर कोई स्थान नहीं, बल्कि चेतना की वह अवस्था है जहाँ आत्मा और ईश्वर एक हो जाते हैं। यह मिलन शब्दों में नहीं समझाया जा सकता। जैसे जल की बूँद सागर में मिलकर सागर बन जाती है, वैसे ही आत्मा ईश्वर में मिलकर अनंत हो जाता है।

आत्मा सदा से है, न उसका कोई आरंभ है, न अंत। वह ईश्वर की ही ज्योति का अंश है। जब वह शरीर में आता है, तो यह भूल जाता है कि वह दिव्य है, और यही विस्मृति जन्म-मृत्यु का कारण बनती है। पर जब आत्मा अपने भीतर के ईश्वर को पहचान लेता है, तो उसे न भय रहता है, न मोह। फिर वह कह पाता है कि मैं वही हूँ जो सदा से था; अनंत, अमर और परमात्मा का अंश। ईश्वर ही आत्मा का घर है; वहीं से वह आया है और वहीं उसे लौटना है। जब आत्मा ईश्वर में विलीन होता है, तो उसे कोई स्वर्ग नहीं चाहिए, न कोई पुनर्जन्म। क्योंकि अब उसे अपने घर वापस मिल चुका है, जो अनंत शांति, सत्य और प्रेम का सागर; स्वयं ईश्वर हैं। इसे बहुत विस्तार से लेखक ने श्रीमद्भगवद्गीता के भाग 2 और भाग 9 में समझाया है।

संदर्भ: श्रीमद्भगवद्गीता — निर्णय लेना कौन सिखाएगा — भाग 2 · श्रीमद्भगवद्गीता — रहस्यमय ज्ञान — भाग 9
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