26 अक्टूबर 2026 · डॉ. राजेश तकयार
अग्नि और सोम

जीवन में बदलाव आवश्यक है, लेकिन बदलाव के बाद नए जीवन को सँभालना भी उतना ही आवश्यक है। माधवशिव के अग्नि और सोम अध्याय में यही संबंध आध्यात्मिक प्रतीकों से खुलता है। अग्नि परिवर्तन और शुद्धि की ओर संकेत करती है; सोम पोषण, शीतलता और संरक्षण की ओर। यह पौराणिक तथा दार्शनिक व्याख्या हमें कठोर प्रयास के साथ करुणा का स्थान समझने के लिए प्रेरित करती है।
परिवर्तन और पोषण के दो प्रतीक
ऋषियों ने वायु देव से पूछा - “भगवान् शिव ने माता पार्वती को समझाते समय कहा था कि यह सम्पूर्ण संसार अग्नि और सोम से बना हुआ है और इसी प्रकार यह संसार वाणी और अर्थ के समान शिव और शक्ति से संयुक्त है। उन्होंने यह भी कहा कि उनका ईश्वरत्व उनकी आज्ञा-शक्ति के द्वारा कार्य करता है। इन गहरे रहस्यों को हम क्रम से समझना चाहते हैं।”
वायु देव ने उत्तर देते हुए कहा कि यहाँ अग्नि और सोम को केवल साधारण आग और चन्द्रमा के रूप में नहीं समझना चाहिए। ये दोनों सम्पूर्ण सृष्टि में कार्य करने वाली दो मूल शक्तियों के प्रतीक हैं।
अग्नि भगवान् शिव की रौद्र, तेजस्वी और परिवर्तन करने वाली शक्ति का स्वरूप है। अग्नि का स्वभाव जलाना, बदलना, शुद्ध करना और एक अवस्था को दूसरी अवस्था में परिवर्तित करना है। इसलिए जहाँ तेज, ऊर्जा, ताप, परिवर्तन और क्रियाशीलता है, वहाँ अग्नि-तत्त्व का प्रभाव माना गया है।
दूसरी ओर सोम शक्ति का शांत, शीतल, अमृतमय और पोषण करने वाला स्वरूप है। सोम जीवन को बनाए रखता है, शांति देता है, रस प्रदान करता है और जो अग्नि द्वारा बदलता या जलता है, उसे पुनः पोषण देता है।
इस प्रकार अग्नि और सोम परस्पर विरोधी नहीं हैं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। जहाँ अग्नि है, वहाँ परिवर्तन है, जहाँ सोम है, वहाँ पोषण है, जहाँ तेज है, वहाँ रस भी है और जहाँ ऊर्जा है, वहाँ जीवन को टिकाए रखने वाली शीतल शक्ति भी आवश्यक है।
संसार के सभी सूक्ष्म और स्थूल पदार्थों में किसी न किसी रूप में तेज और रस दोनों विद्यमान रहते हैं।
शिव और शक्ति का परस्पर संबंध
तेज की भी दो प्रमुख अवस्थाएँ बताई गई हैं। एक सूर्य के समान प्रकाशमान और दूसरी अग्नि के समान दाहक। इसी प्रकार रस की भी दो अवस्थाएँ हैं; एक सोम के समान पोषण देने वाली और दूसरी जल के समान जीवन धारण कराने वाली।
बिजली, सूर्य, अग्नि और प्रकाश जैसी शक्तियाँ तेज की अभिव्यक्तियाँ हैं, जबकि जल, मधुरता, रस, शीतलता और पोषण सोम के स्वरूप हैं। सम्पूर्ण चराचर जगत इन्हीं दोनों के संतुलन से धारण किया गया है।
वायु देव आगे एक बहुत सुंदर उदाहरण देते हैं। अग्नि से अमृत उत्पन्न होता है और अमृत से अग्नि बढ़ती है। इसका अर्थ समझाने के लिए यज्ञ और वर्षा का उदाहरण देते हैं। वह कहते हैं कि भूमि पर अन्न उत्पन्न होता है। उसी अन्न से यज्ञ के लिए हविष्य (हवन योग्य सामग्री) तैयार होता है। यज्ञ में वह हविष्य अग्नि को अर्पित किया जाता है। यज्ञ से वर्षा की व्यवस्था जुड़ी होती है और वर्षा से फिर अन्न उत्पन्न होता है। अर्थात् अन्न से हवि, हवि से यज्ञ, यज्ञ से वर्षा, वर्षा से फिर अन्न; यह एक चक्र है।
इसीलिए भगवान् शिव ने कहा है कि यह संसार अग्नि और सोम के परस्पर सहयोग से चल रहा है। अग्नि ऊपर की ओर उठती है। उसकी ज्वाला का स्वभाव है ऊपर जाना। सोम अथवा जल का स्वभाव है नीचे की ओर बहना। एक ऊपर उठता है, दूसरा नीचे उतरता है। लेकिन दोनों मिलकर जीवन का संतुलन बनाते हैं। इसी सिद्धांत को शिव भगवान् ने शिव और शक्ति से जोड़ कर बताया है।
शिव को कभी ऊपर स्थित अग्नि तत्त्व और शक्ति को नीचे की ओर प्रवाहित सोम कहा गया है, तो कभी शक्ति ऊपर और शिव नीचे बताए गए हैं। इसका उद्देश्य यह दिखाना है कि शिव और शक्ति को किसी एक दिशा या स्थान में बाँधा नहीं जा सकता। जहाँ शिव हैं, वहाँ शक्ति है, जहाँ शक्ति है, वहाँ शिव हैं। ऊपर भी दोनों, नीचे भी दोनों। बाहर भी दोनों, भीतर भी दोनों। इसलिए संसार में ऐसा कुछ नहीं जो शिव और शक्ति से पूर्णतः अलग हो।
यही कारण है कि महादेव माता पार्वती से कहते हैं कि हम दोनों से यह पूरा संसार व्याप्त है।
भस्म का आंतरिक संदेश
इसके बाद वायु देव अग्नि और भस्म के संबंध को समझाते हैं। वह कहते हैं कि जब अग्नि किसी वस्तु को पूरी तरह जला देती है, तो अंत में क्या बचता है? भस्म।
इसलिए भस्म को यहाँ अग्नि का वीर्य अर्थात् उसकी अंतिम शक्ति या सार कहा गया है। अग्नि ने वस्तु के बाहरी रूप को समाप्त कर दिया, लेकिन उसका अंतिम अवशेष भस्म के रूप में रह गया। इसीलिए शैव परंपरा में भस्म केवल राख नहीं है।
वह एक गहरा आध्यात्मिक प्रतीक है। भस्म मनुष्य को याद दिलाती है कि यह शरीर एक दिन भस्म होगा। धन भस्म हो सकता है, सौंदर्य समाप्त होगा, पद समाप्त होगा, और अहंकार समाप्त होगा। जिस संसार को हम स्थायी मानते हैं, उसका प्रत्येक रूप परिवर्तनशील है। जो साधक इस भाव को समझकर विधिपूर्वक भस्म धारण करता है, वह केवल शरीर पर राख नहीं लगा रहा होता, वह अपने भीतर यह स्मरण कर रहा होता है कि मैं केवल यह नश्वर शरीर नहीं हूँ।
भगवान् कहते हैं कि जो व्यक्ति भस्म के इस वास्तविक अर्थ को जानकर उसे मंत्रों के साथ धारण करता है, वह धीरे-धीरे बंधनों से मुक्त होने की दिशा में बढ़ सकता है।
अब यहाँ एक दूसरा गहरा विचार आता है। केवल अग्नि पर्याप्त नहीं है। अग्नि सब कुछ जला सकती है, लेकिन उसके बाद सोम की आवश्यकता होती है। इसलिए कहा गया है कि अग्नि से उत्पन्न भस्म को फिर सोम-रूपी अमृत से सिंचित किया जाता है।
इसका आध्यात्मिक अर्थ यह है कि साधक पहले अपने भीतर के अहंकार, आसक्ति, वासनाओं और अज्ञान को ज्ञान-रूपी शिवाग्नि में जलाता है। लेकिन केवल त्याग ही अंतिम अवस्था नहीं है। इसके बाद उसे देवी की कृपा, करुणा और अमृत-मयी शक्ति से भरना होता है। पहले दाह; फिर अमृत। पहले अहंकार का अंत; फिर चेतना का विस्तार। पहले पुरानी सीमाओं को जलाना; फिर शक्ति की कृपा से नया आध्यात्मिक जीवन पाना; यही अग्नि और सोम का योग है।
यदि साधक केवल बाहरी विधि से भस्म धारण करता है, तो वह अभी भी प्रकृति के क्षेत्र में रहता है। लेकिन यदि वही प्रक्रिया योगयुक्त होकर भीतर घटित हो अर्थात् साधक अपने अहंकार, वासनाओं और बंधनों को शिवज्ञान की अग्नि में जलाए और फिर शक्ति के अमृत से अपनी चेतना को भर दे, तो वह प्रकृति के बंधन से ऊपर उठ सकता है।
भीतर के रूपांतरण की दिशा
यही कारण है कि भगवान् शिव को मृत्युंजय कहा गया है। जो शिव और शक्ति के अमृत का वास्तविक स्पर्श प्राप्त कर लेता है, उसके लिए मृत्यु का अर्थ बदल जाता है। अमरत्व का अर्थ केवल शरीर का कभी न मरना नहीं है। शरीर तो प्रकृति का भाग है और परिवर्तनशील है। वास्तविक अमरत्व है, अपने उस आत्मस्वरूप को जान लेना जो शरीर के जन्म और मृत्यु से परे है।
यदि मनुष्य अपने भीतर के सीमित अहंकार को शिवाग्नि में जला दे और अपनी चेतना को शक्ति के अमृत से भर दे, तो वह अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने लगता है। फिर मृत्यु केवल शरीर का परिवर्तन रह जाती है, आत्मा का अंत नहीं। जो इस रहस्य को जानता है, अग्नि के दाह को भी और सोम के अमृत को भी; वह अग्नि और सोम की बाहरी द्वैत-अवस्था से ऊपर उठ सकता है। वह पुनर्जन्म के बंधन से मुक्त होने की दिशा में जाता है।
योग की भाषा में यही कहा गया है कि पहले अपने सीमित शरीर और अहंकार की पहचान को शिवाग्नि में जलाओ। फिर उसे शक्ति के शांत अमृत से स्नान कराओ। तब साधक धीरे-धीरे उस अमृतस्वरूप चेतना को प्राप्त करता है जो मृत्यु से परे है।
यही पूरा रहस्य भगवान् शिव ने माता पार्वती से कहा था कि यह सम्पूर्ण संसार अग्नि और सोम से बना है। अर्थात् सम्पूर्ण विश्व में दो शक्तियाँ निरंतर कार्य कर रही हैं; परिवर्तन और पोषण, तेज और रस, दाह और शीतलता, शिव और शक्ति।
ये दोनों अलग नहीं हैं। इनके संतुलन से ही संसार चल रहा है। और जब भक्त बाहरी संसार में इन दोनों को पहचानते-पहचानते अंततः अपने भीतर इनके वास्तविक स्वरूप को जान लेता है, तब उसे अनुभव होता है कि शिव बिना शक्ति अधूरे नहीं, शक्ति बिना शिव स्वतंत्र नहीं; दोनों मिलकर ही सम्पूर्ण अस्तित्व की एक अद्वैत सत्ता हैं।
यही अग्नि-सोम का वास्तविक दार्शनिक रहस्य है।
अपने जीवन में दोनों को स्थान दें
किसी आदत को बदलते समय केवल कठोर संकल्प पर्याप्त नहीं होता। नई दिनचर्या को टिकाने के लिए सहयोग, धैर्य और अनुकूल वातावरण भी चाहिए। किसी की भूल सुधारते समय स्पष्टता जरूरी है, लेकिन उसके सम्मान की रक्षा भी जरूरी है। अग्नि और सोम की उपमा इस संतुलन पर सोचने में सहायता करती है।
यहाँ अमृत और मृत्युंजय की भाषा आत्मिक बोध के संदर्भ में है। शरीर की मृत्यु समाप्त होने का दावा इसका व्यावहारिक अर्थ नहीं है। अध्याय हमें सीमित अहंकार से आगे देखने और परिवर्तन के बीच करुणा बनाए रखने का आमंत्रण देता है। इस संतुलन का अभ्यास रोज करें।