5 अक्टूबर 2026 · डॉ. राजेश तकयार

अर्जुन का संकट

अर्जुन का संकट

जीवन में कुछ निर्णय ऐसे होते हैं जिनका उत्तर जानने के बाद भी कदम उठाना कठिन होता है। सामने केवल काम नहीं, अपने लोग, पुरानी स्मृतियाँ और संबंधों की आशंकाएँ खड़ी होती हैं। अर्जुन की व्याकुलता हमें इसी मानवीय स्थिति के पास ले आती है। युद्धभूमि का यह प्रसंग अपनी भावनाओं को पहचानने और निर्णय की तैयारी करने का अवसर भी है।

संबंधों के बीच खड़ा प्रश्न

इस श्लोक में भी संजय बहुत चतुराई से महाराज धृतराष्ट्र को बता रहे हैं कि अर्जुन, जो कि आप के बड़े भाई की पत्नी पृथा के पुत्र हैं, वह इस समय युद्ध भूमि में अपने सभी संबंधियों को युद्ध शुरू होने से पहले देख रहे हैं। ये सामने खड़े युद्ध के इच्छुक सभी संबंधी उनके अपने ही हैं, कोई अर्जुन के मामा हैं, कोई भाई समान हैं, कोई पुत्र समान हैं, कोई दादा-परदादा हैं, कोई गुरु हैं, कोई मित्र हैं तो कोई ससुर समान या सुहृदय हैं, कोई भी पराया नहीं है इस युद्ध भूमि में। इस युद्ध में आप के पुत्रों के सामने, आपके भाई की विधवा पत्नी पृथा का पुत्र अर्जुन खड़ा है, कोई शत्रु नहीं खड़ा है।

जैसा उन्होंने सोचा था वैसे ही हुआ। अर्जुन ने अपने सामने पिता समान बुजुर्गों, पितामह भीष्म और गुरु द्रोणाचार्य को युद्धभूमि में खड़ा देखा। यह उसके लिए एक गहरा मानसिक आघात था, उस लगा कि वे अपने ही मार्ग दर्शकों के विरुद्ध शस्त्र उठाने जा रहा है। उसे वहाँ पर मामा शल्य, भाई दुर्योधन, भाई दुःशासन आदि, अपने भतीजे, अपने पुत्र समान, और अपने पौत्र समान और भी कई इस युद्ध में खड़े दिखाई दिए। उसने अपने पक्ष में खड़े योद्धाओं को भी देखा। अरे! ये तो दोनों पक्षों में मेरे परिचित जन हैं। अब अर्जुन जैसे नींद से जागा कि ये युद्ध केवल एक बाहरी संघर्ष नहीं है, बल्कि पूरा परिवार एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा है। जबकि श्रीकृष्ण के हिसाब से उसे बहुत पहले ही जाग जाना चाहिए था, जब वह शक्तियाँ प्राप्त करने के लिए जंगल में साधना करने गया था।

कई बार मानव स्वयं के किए कर्मों से भी आँखें मूंद लेता है। अनजाने में हुआ होगा, किसी के कहने से हो गया होगा, किसी के लिए किया होगा, उस कारण से किया था या इस कारण से किया है वग़ैरा-वग़ैरा, बहुत कारण हैं। परंतु ध्यान से देखो कि ये कारण हैं या बहाने हैं। यह वही चाशनी है जिसे गुरु द्रोण और पितामह ने भी पिया हुआ है। भगवान श्रीकृष्ण कभी भी किसी के हाथ पकड़ कर कर्म नहीं कराते। कर्म हर कोई स्वयं ही करता है। हाँ, ये हो सकता है कि ज्ञान ना होने से कोई कर्म की परिभाषा ग़लत समझ लेता होगा। वही परिभाषा ही तो श्रीकृष्ण इस श्रीमद्भगवद्गीता के शब्दों के माध्यम से हम सबको बता रहे हैं। उसे जानें, समझें और फिर अपने जीवन में लागू भी करें। देखना ये है कि ये जन्म छोटा ना पड़ जाए। अगर हमने इस भावना से जीना सीख लिया तो हमको बार-बार मरना नहीं पड़ेगा।

कोई भी समझ सकता है कि संजय के इन शब्दों में बताने का मनोभाव यही है कि हे राजन! अगर अभी भी आप युद्ध को रोक सकते हैं तो युद्ध रोक लें। संजय महाराज धृतराष्ट्र के केवल मंत्री, सेवक या सारथी ही नहीं हैं, वह उनके सबसे बड़े शुभ चिन्तक भी हैं। उनकी हर संभव कोशिश यही है कि किसी भी प्रकार से यह युद्ध ना हो। इसी लिए अगर संजय केवल अर्जुन कहते हैं तो उनका अभिप्राय राज्य की रक्षा करना है, अगर वह कुन्ती पुत्र कहते हैं तो भी उन का अभिप्राय राज्य की रक्षा करना ही है और अगर कहीं पर वे पृथा पुत्र कहते हैं, तो भी उनका अभिप्राय राज्य की रक्षा ही है। वे तो केवल यह चाहतें हैं कि किसी भी प्रकार से महाराज धृतराष्ट्र की भावनाएं जगा कर इस युद्ध को रोक लें। क्योंकि परिणाम उन्हें स्पष्ट दिखाई दे रहा है। इसमें कौरव कुल का केवल नाश ही होना है। उनके साथ खड़े सभी मित्र, सभी संबंधी, सभी रिश्तेदार मारें जाने हैं। वह केवल इसे बचाना चाह रहे हैं।

भावना को पहचानना

करुणा कभी-कभी तब उत्पन्न होती है जब आने वाला दुःख सम्मुख दिखाई देने लगता है।

युद्ध के लिए अपने सामने खड़े हुए अपनों को देख कर अर्जुन की मनोदशा ज़रूर बहक गई है। उसे समझ आ रहा है कि वह ये युद्ध किसी शत्रु से करने के लिए, इस युद्ध क्षेत्र में खड़ा नहीं है, बल्कि वह अपनों से युद्ध करने के लिए अपनों के आगे खड़े हुआ है।

सब मित्रों-संबंधियों को सम्मुख देखकर पहली बार अर्जुन को समझ में आया कि यह युद्ध सभी अपनों के बीच में होने वाला है, इसमें शत्रु कोई भी नहीं है, सभी अपने ही हैं। इस लिए अपने सम्पूर्ण बन्धुओं को देखकर धर्मावलंबी कुन्ती का पुत्र अर्जुन अत्यन्त करुणा से भर गया और शोकग्रस्त होकर श्रीकृष्ण से बोला।

जो सामने दिखाई दे रहा है क्या वही सत्य है? जो सूर्य आज दिखाई दे रहा है, वह जब रात आते-आते छिप जाएगा तो आप क्या कहेंगे? कि सूर्य नहीं रहा। या ये कहेंगे कि कल वह फिर आ जाएगा। ये सामने खड़े आप के पितामह कल अगर भेष बदली करके या शरीर बदली करके आपके सामने आ जाएंगे तो तब आप उन्हें पितामह नहीं कहेंगे। क्यों? क्योंकि आपके पास वे दृष्टि नहीं है जिससे आप उन्हें अब पहचान पाएं। यह श्रीमद्भगवद्गीता वही दृष्टि पाने का माध्यम है। जिसे आप पिता या माता कहते हैं वहीं केवल मानव नहीं है। जो कुछ क्षण पहले आप के पास खड़ा आपसे कुछ मांग रहा था, वह आप का पिछले जन्म का पिता था। परंतु आपने तो उसे कुछ दिया नहीं, दूर भगा दिया। यही रिश्ता है मानव का मानव से। पहचान लिया तो मेरी माता, मेरे पिता। और नहीं तो वह एक प्राणहीन व्यक्ति। तो कैसे पहचानें? नहीं पहचानना है आपको किसी को। सभी आपके हैं। और आप भी सभी के हो। यही भावना रखनी है। तभी आप सुखी रह सकते हैं। कोई करुणा, कोई दुःख आपको नहीं होगा।

निर्णय से पहले भीतर देखना

वीर और निडर अर्जुन इस समय अपने सामने डटे खड़े युद्ध में आये युद्ध के अभिलाषी, अपनों को देख कर एकदम भीरु बन गये हैं। वह भगवान श्रीकृष्ण से कह रहें हैं कि हे कृष्ण! मेरे शरीर में कंपन हो रहा है यह सोच कर कि मुझे इन मेरे अपनों से ही युद्ध करना है, मेरे शरीर के रोएँ ये सोच कर ही खड़े हो रहे हैं कि मुझे इन अपने स्वजनो को मारना होगा। मेरा मुख सूख रहा है, मेरे शरीर के सारे अंग शिथिल हुए जा रहे हैं।

अर्जुन पहले आत्मविश्वास से भरे हुए थे, लेकिन अब जब उन्होंने अपने ही प्रियजनों को युद्धभूमि में देखा, तो उनका हृदय करुणा से भर गया। वे मानसिक रूप से कमजोरी महसूस करने लगे और इस के कारण यह दुर्बलता उनके शरीर में भी दिखने लगी है। अर्जुन को यह देखकर गहरा आघात लगा है कि वे अपने ही गुरु, पितामह, भाई, भतीजे, ससुराल के लोग और मित्रों के विरुद्ध युद्ध करने जा रहा है। उनके भीतर करुणा, मोह और मानसिक द्वंद्व उत्पन्न होने लगा है। जब मानसिक पीड़ा होती है तो ऐसा ही होता है, ये कुछ नया नहीं है। शरीर के अंग इसी कारण से ढीले पड़ रहे हैं कि उसके भीतर एक बहुत बड़ा द्वंद्व शुरू हो गया है। जिस से उसके शरीर की शक्ति कम होने लगी है। जब कोई अपना आत्मविश्वास खोने लगता है तो शरीर भी उसका साथ छोड़ने लगता है। उसके शरीर के रोम खड़े हो जाते हैं। रोमांच उत्पन्न हो जाना मानसिक अस्थिरता का संकेत है। यह दिखाता है कि जब कोई मानव गहरे मानसिक संघर्ष से गुजरता है, तो उसका शरीर भी प्रतिक्रिया देने लगता है।

उन्हें मालूम था कि आने वाला समय मानव जाति के लिए बहुत दुविधा वाला रहने वाला है। उसे रोजाना किन्हीं से कई बार युद्ध जैसे हालातों से गुजरना पड़ेगा। तब उसे कदम-कदम पर उन जैसे किसी पथ प्रदर्शक की आवश्यकता पड़ेगी। तब ये श्रीमद्भगवद्गीता उसे मार्ग दिखाएगी। तो उसे कहीं भटकना नहीं पड़ेगा अगर उसने इसे पढ़ कर, इसे जान कर सीख ले ली। ये इसी लिए वह यहाँ बताने जा रहे हैं।

श्रीमद्भगवद्गीता एक धार्मिक पुस्तक भर नहीं है बल्कि मानव की जीवन यात्रा मार्ग का वे पत्थर है जिस पर उसके जीवन की मंजिल लिखी है, जिसे पढ़-जान कर वे अपने लक्ष्य तक बिना रुकावट के पहुँच सकता है।

निर्णय के समय स्वयं से संवाद

इस प्रसंग को अपने जीवन में उतारने के लिए उलझे निर्णय को याद करें। पहले लिखें कि उसमें वास्तविक जिम्मेदारी क्या है। फिर देखें कि कौन सा भय, लगाव या अपराधबोध निर्णय पर प्रभाव डाल रहा है। भावना को पहचानना उसे दबाना नहीं है। अपने मन की बात किसी विश्वसनीय और विवेकशील व्यक्ति के सामने रखना भी तैयारी का हिस्सा हो सकता है।

अर्जुन की स्थिति हमें सिखाती है कि सक्षम व्यक्ति भी दुविधा में पड़ सकता है। अपनी उलझन स्वीकार करना कमजोरी नहीं है। उसके बाद ईमानदार प्रश्न, धैर्य और सही मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है। जब भावनाएँ स्पष्ट होती हैं, तब हम संबंधों की गरिमा बचाते हुए अपने कर्तव्य पर विचार कर सकते हैं। यही इस प्रसंग से आरंभ होने वाली सीख है।

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डॉ. राजेश तकयार

डॉ. राजेश तकयार

लेखक · स्वतंत्र शोधकर्ता

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