भारतीय ज्ञान परंपरा को सरल और प्रामाणिक रूप में समझाने का एक प्रयास...

11 अक्टूबर 2026 · डॉ. राजेश तकयार

भाग 9 — रहस्यमय ज्ञान

भाग 9 — रहस्यमय ज्ञान

श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि अब वे उन्हें अत्यंत गूढ़ ज्ञान बताएँगे। यह ज्ञान अनुभव से जुड़ा है, मनुष्य को पवित्र करता है और उसे अशुभ बंधनों से मुक्त होने की दिशा देता है। इसे ग्रहण करने के लिए श्रद्धा और दोष खोजने की प्रवृत्ति से मुक्त मन चाहिए। इस ज्ञान का आरंभ एक व्यापक सत्य से होता है। संपूर्ण जगत परमात्मा से व्याप्त है। सभी प्राणी उन्हीं पर आश्रित हैं, लेकिन परमात्मा किसी एक रूप या वस्तु की सीमा में बँधे हुए नहीं हैं। श्रीकृष्ण आकाश और वायु का उदाहरण देते हैं। वायु आकाश में चलती है, पर आकाश उसकी गति से बँध नहीं जाता। उसी प्रकार परमात्मा सबको धारण करते हुए भी उनसे स्वतंत्र हैं। वे आधार हैं, लेकिन आश्रित वस्तुओं की सीमाएँ उन पर लागू नहीं होतीं। सृष्टि बार-बार प्रकट होती है और फिर प्रकृति में लीन हो जाती है। यह व्यवस्था परमात्मा की अध्यक्षता में चलती है। फिर भी इन कर्मों की आसक्ति उन्हें बाँधती नहीं। यहाँ अर्जुन को कर्म और अनासक्ति का व्यापक स्वरूप दिखाई देता है। जो परमात्मा के वास्तविक स्वरूप को नहीं जानते, वे उन्हें केवल बाहरी रूप से पहचानने का प्रयास करते हैं। दैवी प्रकृति का आश्रय लेने वाले महात्मा उन्हें समस्त प्राणियों का अविनाशी कारण जानकर भक्ति करते हैं। उनकी भक्ति में निरंतरता होती है। वे स्मरण करते हैं, प्रयत्न करते हैं और अपने जीवन को उसी लक्ष्य से जोड़ते हैं। ज्ञान के माध्यम से भी कोई उनकी उपासना करता है और कोई अनेक रूपों में उसी एक व्यापक सत्ता को देखता है। श्रीकृष्ण बताते हैं कि यज्ञ, अर्पण, अग्नि और आहुति का मूल आधार भी वही हैं। वे जगत के पिता, माता, धारण करने वाले और आश्रय हैं। वे साक्षी, मित्र, उत्पत्ति और अंतिम आधार भी हैं। इस दृष्टि में उपासना जीवन के पूरे विस्तार से जुड़ जाती है। लेकिन उपासना की दिशा उसके फल को प्रभावित करती है। जो स्वर्ग और भोग की इच्छा से पुण्य करते हैं, वे उन फलों का अनुभव करते हैं। पुण्य क्षीण होने पर उनका लौटना होता है। सीमित इच्छाएँ साधना को सीमित प्राप्तियों तक ले जाती हैं। अनन्य भाव से जुड़े भक्तों के विषय में श्रीकृष्ण कहते हैं कि उनके योगक्षेम का भार वे वहन करते हैं। भक्त अपने परम आश्रय को पहचानता है। उसका संबंध केवल माँग और पूर्ति पर आधारित नहीं रहता। श्रीकृष्ण भक्ति की सरलता भी समझाते हैं। पत्ता, फूल, फल या जल—जो भी शुद्ध भाव से अर्पित किया जाए, वे उसे स्वीकार करते हैं। अर्पण की बाहरी भव्यता से अधिक महत्व उस प्रेम का है जिसके साथ वह दिया जाता है। फिर वे अर्जुन से कहते हैं कि जो भी कर्म करो, जो खाओ, जो दान दो और जो तप करो, उसे उन्हें अर्पित करो। इससे साधना किसी विशेष स्थान या समय तक सीमित नहीं रहती। जीवन का प्रत्येक कर्म समर्पण का अवसर बन जाता है। समर्पण के साथ कर्म करने से शुभ और अशुभ फलों की पकड़ ढीली होने लगती है। मनुष्य हर उपलब्धि को अपने अहंकार की संपत्ति और हर कठिनाई को अपने अस्तित्व की पराजय मानना छोड़ने लगता है। श्रीकृष्ण सभी प्राणियों के प्रति समभाव रखते हैं। उनके यहाँ जन्म और सामाजिक स्थिति के कारण भक्ति का मार्ग बंद नहीं होता। जो उनका आश्रय लेता है, उसके लिए परम गति का मार्ग खुला है। वे परिवर्तन की संभावना को भी स्पष्ट करते हैं। जिसका पूर्व आचरण बुरा रहा हो, वह भी अनन्य निष्ठा से सही दिशा ग्रहण करके धर्मात्मा बन सकता है। सच्चा समर्पण उसके संकल्प और आचरण को बदलता है। इसी परिवर्तन के साथ स्थायी शांति आती है। अंत में श्रीकृष्ण अर्जुन से मन को उनमें लगाने, उनकी भक्ति करने और उन्हें अपना परम लक्ष्य बनाने के लिए कहते हैं। इस रहस्यमय ज्ञान का हृदय एक सरल बात में खुलता है—जीवन का आधार पहचानो और अपने समस्त कर्म उस आधार के प्रति प्रेम तथा समर्पण से करो।

लेखक ने इसका विस्तार अपनी निम्न पुस्तक में 82,500 शब्दों में किया है। (श्रीमद्भगवद्गीता — भाग 9 — रहस्यमय ज्ञान)

बाकी लेख लोड हो रहे हैं…