14 अक्टूबर 2026 · डॉ. राजेश तकयार
पचास के बाद का जीवन

पचास के बाद का जीवन कुछ भाग्यशाली युवाओं को ही मिलता है
पचास के बाद का जीवन कुछ भाग्यशाली युवाओं को ही मिलता है। युवा इस लिए क्योंकि जो बूढ़े हो गए थे, वह तो पहले ही चले गए। परिवार की जिम्मेदारियाँ निभाते हुए समाज में अपनी छवि को बनाना कोई बहुत अधिक कठिन कार्य नहीं है परन्तु ये तभी सम्भव होता है जब आपने पहले हुई ग़लतियों को बार-बार नहीं दोहराया है। अब समय मिलेगा कुछ नया करने के लिए। अब आपके संग बहुत सारे अनुभव भी हैं, उनकी सहायता से, बहुत कुछ कर सकते हैं। अनुभव आए कैसे, मत सोचो इस बारे में। इन्हीं अनुभवों के कारण से सभी परिस्थितियों का सटीक विश्लेषण अब शीघ्र होने लगा है, जीवन के मूल्यों की गहराई बहुत क़रीब से समझ आने लगी है। अब ये अनुभव अपने हैं, कोई इन्हें नहीं छीन सकता। बस करना ये है कि निकल पड़ो एक नए और अंतिम सफ़र की तरफ। रास्ता नया जरूर है परन्तु अब वह आप के मन की तरह से बहुत साफ है, परिवार, दोस्तों और समाज के एक बहुत बड़े हिस्से की छाया से वह रास्ता, आगे छायादार ही रहने वाला है।
अब कोई माया, नहीं रोक रही। इसलिए क्योंकि जिनके लिए संचित करना था, वह हो चुका, परीक्षण का समय समाप्त हो गया है। और अगर नहीं भी हुआ तो क्या? जब शरीर में शक्ति थी तो नहीं कर पाए तो अब प्रयत्न व्यर्थ जाने के अधिक कारण हैं। लेकिन महसूस करें, आपकी उमंग में बहुत ऊर्जा आ गई है, कारण है, संग में कदम-से-कदम मिला कर चलता हुआ आपका परिवार। आपके संग आपके पौत्र, आपकी लाठी बने साथ दे रहे हैं। शरीर वृद्ध हो रहा है तो क्या हुआ बहुत उदाहरण भी तो सामने है जिन्होंने पचास के बाद, जीवन का सबसे महत्वपूर्ण पाया है। धन संचय करना, सफलता-असफलता का डर और इन्द्रिय भोग बहुत पीछे छूट गए हैं, वे सब जंजीरें थीं जिन्हें काट कर आप यहाँ तक आ गए हैं। अब तो सामने आपकी आत्मा दिख रही है। जो प्रसन्न होने के साथ-साथ उजली भी है। और हो भी क्यों न। आपने यहाँ तक आते हुए अपने सभी कर्तव्यों का निर्वाह अच्छे से किया है तभी तो ईश्वर ने यह समय दिया है। अब आप ने उसे पाना है जिस का जिक्र हमारे सभी पुराणों, वेदों और उपनिषदों में कहा गया है। अब आपने सौ वर्ष जीना है।
ईशावास्य उपनिषद् का दूसरा श्लोक है:
ईशावास्य उपनिषद् का दूसरा श्लोक है: कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेत् शतं समाः। एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥ अर्थात्, मानव को अपना कर्तव्य करते हुए, सौ वर्ष जीने की इच्छा करनी चाहिए, क्योंकि इसी से कर्म के बंधन से मुक्ति मिलती है। और जब आधा पड़ाव पार कर ही लिया है तो फिर क्यों न उत्सव मनाएँ? पचास के बाद भी कभी, निष्क्रियता के बारे में सोचना नहीं चाहिए। पचास की आयु के बाद का समय ये दर्शाता है कि दौड़ समाप्त हो गई हैं, परन्तु इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि चलना बंद कर दिया जाए। अब तो समय आ गया है जब सब कुछ समझा और जाना जा सकता है। मन किसी झील की तरह से एकदम शान्त है, उसकी सारी चंचलता अब ठहर गई है। कर्तव्यों का हस्तांतरण कर दिया है, भक्ति-ध्यान के लिए बहुत समय मिलेगा और अगर समर्थ रहा तो दान-पुण्य भी करने हैं। जब भोग का आकर्षण ही नहीं रहा तो मोह कैसा। अब जीवन परिपक्व लगने लगा है। समय होने के कारण से अच्छे विचार रखने वाले और प्रेरणा देने वालों का सत्संग मिल रहा है। ये तो अब आत्मा को मुक्त करने की तैयारी का काल है, जिह्वा को विराम देने का काल है, सपनों को समेटने का काल है। एक उदाहरण बन कर कुछ नया कर दिखाने का काल है।
लगता होगा कि स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता, यह स्वाभाविक है। इस पड़ाव पर आते-आते हमने अपनी इन्द्रियों से इतना काम लिया है कि ये भी क्षीण हो गईं हैं। सबकी हो जाती हैं, कोई ऐसा नहीं है जिसने शुरू से अंत देखा हो। ढलते हुए सूर्य की छाया की तपिश भी तो संध्याकाल में कम ही हो जाती है। जिस सूर्य का अभिमान प्रातःकाल में उच्चतर स्तर पर था; जब वह अपने उस तेज को नीचे गिरा कर उदास नहीं हैं, सुबह से ज्यादा सुंदर लगता है, तो हम मानव क्यों हों? और जिनके स्वास्थ्य ठीक थे तो क्या वे आज कहीं दिखाई देते हैं? ये सोचते हुए अपनी उदासी को अपनी मानसिक परिपक्वता और धैर्य से समाप्त करते हैं, कहीं सत्संग करते हैं। कुछ सपने थे जिन्हें पहले आँखों के आँसुओं में ही छोड़ दिया था, कुछ शौक़ थे जिन के बारे में किसी से कभी ज़िक्र ही नहीं किया था, आओ उन पर बात करते हैं। फल तो पेड़ के पकने पर ही लगते हैं, शिशु पेड़ पर कभी फल नहीं आते।
हाँ, वे सामने एक उदास, ग़मगीन बैठा हुआ है। लगता है उसने आज के दिन के लिए ठीक से तैयारी नहीं की थी, सोचा ही नहीं था। क्यों उड़ता रहा उसे पाने के लिए जो था ही नहीं। रिश्तों को अपने अहम में ही खो दिया। जो मिला, उसे सदा के लिए अपना मान कर, दूसरों को दिखाता रहा। उस दिखावट में ही कब वे चला गया, समझ ही नहीं आया। अभी भी आत्ममंथन का समय, सबको बनाने वाले ने दिया है, उसी में लगाना चाहिए, यूँ खाली नहीं बैठना चाहिए। चलो आओ, उसे समझाते हैं।
एक समय था जब बहुत खेलें लेकिन एक दिन अचानक लगा, समय ही नहीं बचा
एक समय था जब बहुत खेलें लेकिन एक दिन अचानक लगा, समय ही नहीं बचा। काम इतने अधिक आ गए। शादी हो गई, बच्चे हो गए, माता-पिता बूढ़े हो गए, जिम्मेदारियाँ बढ़ गईं। खेल-खेल में ही महसूस हुआ कि अब समय नहीं मिलता, दोस्तों ने भी घर पर आते-आते एक दिन घर का दरवाजा बंद समझ लिया। लेकिन तो क्या हुआ? अभी मुझे तो उन सबका पता मालूम है, मैं उन्हें बुला सकता हूँ, खेल सकता हूँ, उन्हीं पुरानी जगहों पर घूमने जा सकता हूँ, वही ज़ोर-ज़ोर से ठहाके लगा सकता हूँ। पचास का समयकाल तो आया ही इस लिए है। बहुत से चेहरे याद तो हैं परन्तु केवल मन में ही उनकी छवि छुपा रखी थी, अब समय आ गया है कि एक बार फिर से उन्हें सामने बैठे किसी अपने दोस्त की आँखों में देख पाऊँगा, यही सोच कर उठ जाओ।
कभी असफल हुए थे तभी तो फिर से उठ कर चले और यहाँ तक पहुँचें, कहीं हमारे बच्चे वे भूल न कर दें जो हमने की थी। आओ उन्हें वे सब समझाते हैं। उनके लिए फिर आगे की राह आसान हो जाएगी, विपदाएँ आयेंगी उन पर आर्शीवाद देकर चली जाएँगी। आप, मैं और वे श्रीकृष्ण हैं, जो अपनों को ज्ञान, युद्ध से पहले ही दे सकते हैं। ताकि जीत हमारे अपनों की हो, उन्हें खुशियाँ मिले, उदासी कोसों दूर रहे। वह सब हमारे हिस्से की थीं, हमने उनके साथ जिया और उन्हें पराजित भी किया; आओ बताएँ उन्हें कि कैसे किया था। हम रोये थे पर तुम्हें नहीं रोना, तुम को तो सदा ख़ुश रहना है। ये समय यूँहीं नहीं आ गया, हम खींच कर लाएँ हैं, पकड़ कर लाए हैं; केवल तुम्हारे लिए। ताकि तुम जी सको अपनी इच्छा से, अपने तरीके से और अपने अभिमान से। वह एक समय था जब मैंने अपना सब कुछ खो दिया था, ये कहानी सुनानी हैं उन्हें, बहुत समय हैं हमारे पास।