14 सितंबर 2024 · डॉ. राजेश तकयार

श्री कृष्ण के प्रिय वस्त्र और आभूषण

श्री कृष्ण के प्रिय वस्त्र और आभूषण

श्रीकृष्ण कैसे दिखते हैं इस बारें में पुराण क्या कहते हैं?


श्री कृष्ण के प्रिय वस्त्र उनके अद्वितीय और दिव्य स्वरूप को दर्शाते हैं। उनके वस्त्रों के रंग, धारण की विधि, और उपयोग की गई सामग्री पौराणिक कहानीओं और ग्रंथों में विस्तृत रूप से वर्णित हैं। यहाँ कुछ प्रमुख जानकारी दी जा रही है:

पीतांबर (पीला वस्त्र)

श्री कृष्ण के प्रिय वस्त्रों में सबसे प्रमुख है पीतांबर, जो पीले रंग का होता है। पीतांबर या पीला वस्त्र भगवान् विष्णु का प्रतीक है, जिनका श्री कृष्ण अवतार हैं। पीले रंग का वस्त्र शुद्धता, पवित्रता, और ज्ञान का प्रतीक है। बाल कृष्ण हो या युवा कृष्ण, उन्हें हमेशा पीतांबर पहने हुए दिखाया जाता है।

वनमाला और आभूषण

श्री कृष्ण के वनमाला पहनने के पीछे कई पौराणिक और सांस्कृतिक कारण हैं। यहाँ कुछ प्रमुख कारण दिए जा रहे हैं:

श्री कृष्ण की बाल लीलाएँ वृंदावन की हरियाली और प्राकृतिक वातावरण में घटी हैं। वृंदावन की गोपियों और गोपों के साथ खेलते हुए, श्री कृष्ण ने हमेशा प्रकृति से गहरा संयोग बनाए रखा। वनमाला उनकी इस प्रकृति प्रेम को दर्शाती है और उन्हें प्रकृति के साथ जोड़ती है। वनमाला श्री कृष्ण की दिव्यता और सौंदर्य को और बढ़ा देती है।

हिन्दू धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में फूलों का विशेष महत्व है। फूलों का उपयोग पूजा-अर्चना में होता है और उन्हें पवित्र माना जाता है। श्री कृष्ण की वनमाला उन्हें भक्तों के करीब लाती है और उनकी पूजा-अर्चना का महत्वपूर्ण हिस्सा बनती है। एक पौराणिक कहानी के अनुसार, जब श्री कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को उठाया था, तब वृंदावन के सभी वृक्षों ने अपनी फूलों की माला उन्हें अर्पित की थी।

कौस्तुभ मणि

श्री कृष्ण के गले में कौस्तुभ मणि का हार भी प्रमुख है, जो समुद्र मंथन के दौरान निकला था और भगवान् विष्णु ने इसे धारण किया था। यह मणि उनकी दिव्यता और प्रभावशाली स्वरूप को दर्शाती है।

रत्नजड़ित कंगन और अंगूठियाँ

श्री कृष्ण की सुंदरता और दिव्यता को बढ़ाने के लिए वे रत्नजड़ित कंगन और अंगूठियाँ पहनते थे। ये आभूषण उनकी राजसी गरिमा को प्रकट करते हैं।

बांसुरी

श्री कृष्ण के बांसुरी बजाने के पीछे कई पौराणिक और सांस्कृतिक कारण हैं, जो उनके व्यक्तित्व और लीलाओं को गहराई से दर्शाते हैं:

संगीत और मोहकता का प्रतीक

श्री कृष्ण की बांसुरी से निकलने वाला संगीत अत्यंत मधुर और मोहक था। उनके बांसुरी वादन से न केवल गोपियाँ बल्कि वन्य जीव-जंतु और प्रकृति भी मंत्रमुग्ध हो जाती थी। बांसुरी का संगीत सभी को आकर्षित करता था और यह उनकी दिव्यता और संगीत प्रेम को दर्शाता है। यह उनकी प्रकृति प्रेम और प्रकृति के साथ उनके सामंजस्य को प्रकट करता है।

श्री कृष्ण की रासलीला में बांसुरी का विशेष महत्व है। बांसुरी की धुन सुनकर गोपियाँ उनके पास खींची चली आती थीं और उनके साथ रासलीला में भाग लेती थीं। बांसुरी बजाना प्रेम, समर्पण और भक्ति में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

श्री कृष्ण के बांसुरी वादन से ब्रह्मांड के सभी देवता, यक्ष इत्यादि इकट्ठे हो जाते थे और उनकी बांसुरी धुन सुनने के लिए उनके पास आ जाते थे। यह उनकी दिव्यता और अनन्त प्रेम का प्रतीक है।

इन सभी कारणों से श्री कृष्ण का बांसुरी वादन उनकी लीलाओं का अभिन्न हिस्सा है और उनकी दिव्यता, मोहकता, और भक्ति को दर्शाता है।

यद्यपि यह वस्त्र नहीं है, लेकिन बांसुरी श्री कृष्ण के सबसे प्रिय वस्त्रों में शामिल है। बांसुरी उनकी पहचान का एक अभिन्न हिस्सा है और उनकी लीलाओं का महत्वपूर्ण प्रतीक है।

पुराने ग्रंथ बताते हैं कि उनके वस्त्र और आभूषण न केवल उनकी सुंदरता और दिव्यता को बढ़ाते हैं बल्कि उनके विभिन्न रूपों और लीलाओं के प्रतीक भी हैं, जो श्री कृष्ण की दिव्यता, सुंदरता, और नटखट स्वभाव को दर्शाते हैं।

मोर पंख क्यों लगाया

श्री कृष्ण के मोरपंख धारण करने के पीछे कई पौराणिक और प्रतीकात्मक कारण हैं:

मोरपंख अपनी प्राकृतिक सुंदरता और आकर्षक रंगों के लिए प्रसिद्ध है। श्री कृष्ण का व्यक्तित्व भी सुंदरता और आकर्षण से भरा हुआ था, और मोरपंख उनके इस रूप का प्रतीक है।

तुंडाद्विनिर्गतः सर्पस्तत्पक्षान्विचकर्षह ॥

तत्पादौवेष्टयंस्तुद्यन्फूत्कारंव्यदधन्मुहुः ॥

तदातत्पक्षसम्भूतौनीलकण्ठमयूरकौ॥१२॥

तेषांतुदर्शनं पुण्यं सर्वकामफलप्रदम् ॥

शुक्लपक्षेमैथिलेंद्रशम्या माश्विनस्यतत् ॥१३॥

(गर्ग सं० १२-१३)

कालिय नाग, जिस का दमन भगवान श्रीकृष्ण ने किया था, वह भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ से डर कर यमुना में रहता था। उससे पहले कालिय नाग रमणकद्वीप में अन्य सर्पों के संग रहता था। गरुड़ देव प्रतिदिन वहाँ जाकर नागों को खा जाते थे। ऐसा देखकर सभी नाग भयवंश एक दिन इकट्ठा होकर गरुड़ के पास आये और करुणा से बोले कि हे गरुत्मन् ! आपको नमस्कार है, आज हम आपसे विनती करने आयें हैं। आप भगवान विष्णु के वाहन हैं, हमें आपसे बहुत भय लगता है। अगर आप इस प्रकार से हमें खाते रहोगे तो हमारा जीवन कैसे चलेगा। इसलिए हमारी आपसे प्रार्थना है कि प्रत्येक मास में हमारे में से कोई पृथक्-पृथक् आपके पास आ जायेगा आप उसका भोजन कर लिया करें।

परन्तु गरुड़ देव ने प्रति मास की जगह पर प्रतिदिन आने को कहा जिसे सभी नागों ने आत्मरक्षा के कारण से मान लिया। एक दिन कालिय नाग की बारी आई तो उन्होंने गरुड़ देव का भक्षण होने से इन्कार कर दिया और गरुड़ देव से युद्ध करने लगा। उसी लड़ाई में गरुड़ देव के पंखों में से दो पंख टूट कर नीचे गिर गये। उन पंखों से उसी समय एक मोर और एक नीलकण्ठ उत्पन्न हुए। इसीलिए इन दोनों पक्षियों की बहुत महत्ता है। इनका आश्विन माह शुक्ला दसवीं को दर्शन करना बहुत ही शुभ माना जाता है।

बाद में लड़ाई बहुत बड़ जाने के कारण कालिय नाग की रक्षा किसी ने नहीं की तो ऋषि फणिश्र्वरदेव ने कालिय नाग को भयरहित होकर यमुना नदी के एक हिस्से में रहने का फैसला सुनाया, जिस कारण से कालिय नाग यमुना नदी के उस हिस्से में रहता था। उस हिस्से का नाम ही कालिन्दी था, जोकि वृन्दावन में पड़ता है। उस हिस्से में सौभरि ऋषि के श्राप के डर से भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ देव कभी नहीं जाते थे।

मोरपंख को धारण करना श्री कृष्ण की सादगी और विनम्रता का भी प्रतीक है। वे भगवान् होते हुए भी सामान्य बालक की तरह जीवन जीते थे और मोरपंख का उपयोग इस गुण को दर्शाता है।श्री कृष्ण का जीवन और उनकी लीलाएँ प्रकृति के साथ गहरे संबंध में रही हैं। मोरपंख का उपयोग उनके प्रकृति प्रेम और पर्यावरण के साथ सामंजस्य को दर्शाता है।

मोरपंख धर्म और कर्म का भी प्रतीक माना जाता है। श्री कृष्ण ने गीता में कर्म और धर्म का महत्व बताया है और मोरपंख को उनके मुकुट में धारण करना इसे प्रतीकात्मक रूप से दर्शाता है।

एक कहानी के अनुसार, जब श्री कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी अंगुली पर उठाया था, तब मोर ने अपनी खुशी और समर्पण व्यक्त करने के लिए अपने पंख श्री कृष्ण को अर्पित किए थे। इस घटना के बाद, श्री कृष्ण ने मोरपंख को अपने मुकुट में स्थान दिया।

मोर भी श्री कृष्ण की विभिन्न लीलाओं में शामिल रहा है। ब्रजभूमि में श्री कृष्ण की लीलाओं के दौरान मोरों का नृत्य भी देखा गया है।

इन विभिन्न कारणों से श्री कृष्ण ने अपने मुकुट में मोरपंख धारण किया, जो उनकी दिव्यता, सरलता और प्रकृति प्रेम को दर्शाता है।

डॉ. राजेश तकयार

डॉ. राजेश तकयार

लेखक · स्वतंत्र शोधकर्ता

पूरी जीवनी पढ़ें →