भारतीय ज्ञान परंपरा को सरल और प्रामाणिक रूप में समझाने का एक प्रयास...

11 अक्टूबर 2026 · डॉ. राजेश तकयार

भाग 3 — कर्म और फल

भाग 3 — कर्म और फल

श्रीकृष्ण से अर्जुन कहते हैं कि यदि ज्ञान कर्म से श्रेष्ठ है, तो फिर वे उन्हें ऐसे कठिन कर्म में क्यों लगा रहे हैं? उनकी बुद्धि अभी भी उलझी हुई है। एक ओर वे आत्मा के ज्ञान और स्थिर बुद्धि की बात सुन रहे हैं, दूसरी ओर उन्हें अपने कर्तव्य में प्रवृत्त होने के लिए कहा जा रहा है। अर्जुन चाहते हैं कि श्रीकृष्ण उन्हें एक स्पष्ट मार्ग बताएँ, जिससे उनका कल्याण हो सके। श्रीकृष्ण समझाते हैं कि ज्ञानयोग और कर्मयोग, दोनों निष्ठाएँ हैं। लेकिन केवल कर्म आरंभ न करने से कोई कर्म के बंधन से मुक्त नहीं हो जाता। काम छोड़कर बैठ जाना अपने आप में सिद्धि नहीं है। कोई भी मनुष्य एक क्षण के लिए पूरी तरह कर्म किए बिना नहीं रह सकता। प्रकृति के गुण उसे किसी न किसी क्रिया में लगाए रखते हैं। इसलिए प्रश्न केवल यह नहीं है कि कर्म करना है या नहीं। प्रश्न यह है कि कर्म किस भाव से किया जा रहा है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो अपनी कर्मेन्द्रियों को रोककर बैठा है, लेकिन मन में विषयों का चिंतन कर रहा है, उसका बाहरी संयम भीतर की स्थिति से मेल नहीं खाता। इसके विपरीत, जो मन से इन्द्रियों को संयमित करके आसक्ति के बिना अपना कर्म करता है, वह श्रेष्ठ मार्ग पर चलता है। वे अर्जुन से कहते हैं कि अपना निर्धारित कर्म करो। कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है। शरीर का निर्वाह भी कर्म के बिना संभव नहीं है। जीवन में मिली जिम्मेदारियों को समझना और उन्हें पूरा करना आवश्यक है। इसके बाद श्रीकृष्ण कर्म को यज्ञ की भावना से जोड़ते हैं। यज्ञ के लिए किया गया कर्म समर्पण से जुड़ा होता है। उसमें मनुष्य अपने किए को केवल निजी भोग और स्वार्थ तक सीमित नहीं रखता। वे अर्जुन को आसक्ति छोड़कर इसी भावना से कर्म करने के लिए कहते हैं। श्रीकृष्ण परस्पर पोषण की व्यवस्था समझाते हैं। यज्ञ से देवताओं को संतुष्ट किया जाता है और उनसे जीवन के लिए आवश्यक साधन प्राप्त होते हैं। इस प्रकार एक-दूसरे का पोषण करते हुए कल्याण का मार्ग बनता है। जो प्राप्त साधनों को अर्पित किए बिना केवल अपने लिए भोगता है, वह इस व्यवस्था में अपना योगदान नहीं दे रहा होता। वे बताते हैं कि प्राणी अन्न पर निर्भर हैं, अन्न वर्षा से उत्पन्न होता है, वर्षा का संबंध यज्ञ से और यज्ञ का संबंध कर्म से है। इस चक्र के माध्यम से अर्जुन के सामने जीवन की परस्पर निर्भरता रखी जाती है। मनुष्य का जीवन केवल उसके अपने प्रयत्न से नहीं चलता। उसे जो मिलता है, उसके साथ देने और अपना कर्तव्य निभाने की जिम्मेदारी भी जुड़ी है। फिर श्रीकृष्ण उस मनुष्य की अवस्था बताते हैं जो आत्मा में ही संतुष्ट है। उसे अपनी पूर्णता के लिए बाहर से कुछ प्राप्त करना शेष नहीं रहता। लेकिन अर्जुन के लिए निर्देश स्पष्ट है—आसक्ति के बिना अपने कर्तव्य का पालन करते रहो। इसी प्रकार कर्म करते हुए मनुष्य परम अवस्था तक पहुँच सकता है। श्रीकृष्ण जनक जैसे राजर्षियों का उदाहरण देते हैं, जिन्होंने कर्म करते हुए सिद्धि प्राप्त की। वे अर्जुन को लोकसंग्रह, अर्थात् लोक की व्यवस्था और कल्याण, का ध्यान रखने के लिए भी कहते हैं। किसी व्यक्ति का आचरण केवल उसी तक सीमित नहीं रहता। जिसे लोग श्रेष्ठ मानते हैं, उसके व्यवहार का अनुसरण भी करते हैं। इसीलिए श्रीकृष्ण अपने विषय में कहते हैं कि उन्हें तीनों लोकों में कुछ प्राप्त करना शेष नहीं है, फिर भी वे कर्म में लगे रहते हैं। यदि वे कर्म से विमुख हो जाएँ, तो दूसरे भी उसी मार्ग पर चलेंगे और व्यवस्था बिगड़ जाएगी। ज्ञानी मनुष्य का आचरण दूसरों को कर्म से हटाने वाला नहीं होना चाहिए। उसे स्वयं संयम और समर्पण के साथ कर्म करते हुए दूसरों को भी उचित कर्म में प्रवृत्त करना चाहिए। ज्ञान का प्रभाव उसके व्यवहार में दिखाई देना चाहिए। श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्म के साथ जुड़ जाने वाले अहंकार से भी सावधान करते हैं। प्रकृति के गुणों से कर्म होते हैं, लेकिन अहंकार से मोहित मनुष्य मान बैठता है कि सब कुछ वही कर रहा है। तत्त्व को समझने वाला इन प्रक्रियाओं को पहचानता है और उनमें आसक्त नहीं होता। वे अर्जुन से कहते हैं कि अपने सभी कर्म उन्हें अर्पित करके, फल की आशा और ममता छोड़कर, शोक-संताप से मुक्त होकर अपना कर्तव्य निभाएँ। कर्म में पूरी तरह उपस्थित रहना और उसके फल पर अपना स्वामित्व मानकर न बैठना, यही साधना उनके सामने रखी जाती है। इसी क्रम में श्रीकृष्ण राग और द्वेष की बात करते हैं। इन्द्रियों के विषयों के प्रति आकर्षण और विरोध मनुष्य को अपनी ओर खींचते हैं। उसे इनके वश में नहीं होना चाहिए। केवल जो अच्छा लग रहा है उसी के पीछे चलना, और जो अप्रिय लग रहा है उससे भाग जाना, कर्तव्य पहचानने का पर्याप्त आधार नहीं है। वे कहते हैं कि अपना धर्म अपूर्ण ढंग से निभाया जाए, तब भी दूसरे के धर्म को अच्छी तरह निभाने से श्रेष्ठ है। अपने कर्तव्य को पहचानकर उसमें स्थिर रहना आवश्यक है। यह सुनकर अर्जुन एक गहरा प्रश्न करते हैं। मनुष्य इच्छा न होते हुए भी गलत कर्म क्यों कर बैठता है? ऐसा कौन है जो उसे मानो बलपूर्वक उस ओर ले जाता है? श्रीकृष्ण उत्तर देते हैं कि यह काम और क्रोध है। अतृप्त कामना मनुष्य के ज्ञान को ढक देती है। जैसे धुआँ अग्नि को और मैल दर्पण को ढक देता है, वैसे ही इच्छा का आवरण विवेक को अस्पष्ट कर देता है। उसे तुष्ट करते रहने से उसकी भूख समाप्त नहीं होती। इस कामना के आश्रय इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि हैं। इसलिए श्रीकृष्ण सबसे पहले इन्द्रियों को संयमित करने के लिए कहते हैं। फिर वे भीतर की श्रेष्ठता का क्रम समझाते हैं—इन्द्रियों से श्रेष्ठ मन है, मन से श्रेष्ठ बुद्धि है और बुद्धि से भी परे आत्मा है। आत्मा के इस स्वरूप को जानकर मन को स्थिर करना और कामरूपी शत्रु पर विजय पाना आवश्यक है। तीसरे अध्याय में कर्म की दिशा स्पष्ट होती है। अपना कर्तव्य पहचानना, उसे समर्पण से करना, लोक के कल्याण का ध्यान रखना और फल की आसक्ति तथा अहंकार से बचना—यही कर्मयोग का मार्ग है। इस मार्ग में बाहर का कर्म और भीतर का संयम साथ चलते हैं। अर्जुन को अपने कर्म से भागने के स्थान पर उस चेतना को बदलना है, जिससे वे कर्म करते हैं। लेखक ने इसका विस्तार अपनी निम्न पुस्तक में 46,000 शब्दों में किया है। श्रीमद्भगवद्गीता — भाग 3 — कर्म और फल

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