13 अक्टूबर 2026 · डॉ. राजेश तकयार
घंटियों के पार

कानों में बँधी घंटियाँ
कभी हम सोचते हैं कि हमारी भक्ति जितनी प्रबल होगी, उतना ही कठोर हमारा विरोध भी होना चाहिए। अपने आराध्य से प्रेम करते हुए हम किसी दूसरे नाम के प्रति घृणा पाल लेते हैं और उस घृणा को निष्ठा समझ बैठते हैं। घंटाकर्ण का प्रसंग इसी उलझन के सामने हमें खड़ा करता है। उसके कानों में बँधी घंटियाँ केवल एक विचित्र आभूषण नहीं थीं। वे उसके भीतर लिए हुए उस निर्णय का स्वर थीं कि मैं वह नाम सुनूँगा ही नहीं, जिसे मैंने अपना विरोधी मान लिया है। सुनने से पहले ही अस्वीकार कर देना उसके जीवन की दिशा बन गया था।
घंटाकर्ण भगवान् शिव का भक्त था। वह विष्णु का नाम तक सुनना नहीं चाहता था। उसने अपने कानों में घंटियाँ इसलिए बाँध रखी थीं कि उनकी ध्वनि के बीच विष्णु का नाम भीतर प्रवेश न कर सके। यहाँ विचार करने की बात यह है कि उसके पास श्रद्धा का अभाव नहीं था; वह तपस्या करता था, अपने आराध्य को पुकारता था और उनकी कृपा चाहता था। फिर भी उसी हृदय में द्वेष बना हुआ था। साधना के होते हुए भी मन की गाँठ शेष थी। यही गाँठ उसके सामने उस सत्य को आने नहीं देती थी, जिसकी ओर उसकी साधना को बढ़ना था।
मैं इस प्रसंग को पढ़ते हुए उन घंटियों को अपने भीतर भी देखता हूँ। जब हम किसी बात को समझने से पहले उसके विरुद्ध खड़े हो जाते हैं, तब क्या हमारे भीतर भी कोई शोर नहीं उठता? हम सुन तो रहे होते हैं, पर स्वीकार केवल उतना करते हैं, जितना हमारे पहले से बने विचारों के अनुकूल हो। घंटाकर्ण ने इस दूरी को बाहर दिखाई देने वाला रूप दे दिया था। हमारे भीतर वैसी घंटियाँ दिखाई न दें, तब भी यह प्रश्न बना रहता है कि हम सत्य को सुनना चाहते हैं या केवल अपने पुराने निष्कर्ष की प्रतिध्वनि।
भक्ति में अपने आराध्य के प्रति अपनापन स्वाभाविक है। कठिनाई तब आती है जब उसी अपनापन को बचाने के लिए हम घृणा का सहारा लेते हैं। घंटाकर्ण की भूल भगवान् शिव से प्रेम करना नहीं थी। भूल उस प्रेम के साथ विष्णु के प्रति द्वेष जोड़ देना थी। वह दोनों को अलग मानकर ऐसी सीमा खींच रहा था, जिसमें उसके अपने आराध्य का संकेत भी ठीक से समा नहीं सकता था। इसीलिए कथा का पहला परिवर्तन किसी बाहरी विजय में नहीं, उसकी सुनने की तैयारी में दिखाई देता है। जिस नाम से वह बचता था, उसी नाम की ओर उसे जाना पड़ा।
आराध्य ने दिशा बदल दी
घंटाकर्ण ने भगवान् शंकर की आराधना की और मुक्ति चाही। प्रसन्न होकर महादेव ने उसे विष्णु की ओर भेजा। उन्होंने उसे बद्रीनाथ में नरनारायण के आश्रम में जनार्दन की आराधना करने का निर्देश दिया। यह उत्तर उसकी पुरानी भावना के अनुकूल नहीं था। जिसे वह सुनना नहीं चाहता था, उसी की उपासना उसके सामने रखी गई। उसके लिए अब परीक्षा यह थी कि वह अपने आराध्य की बात मानेगा या अपने द्वेष की रक्षा करेगा। वह शिव को पुकार तो सकता था, पर क्या शिव द्वारा दिखाई गई दिशा को भी ग्रहण कर सकता था?
यहीं भक्ति और हठ के बीच का अंतर स्पष्ट होता है। यदि हम अपने आराध्य से केवल वही उत्तर स्वीकार करें, जो हमने पहले ही तय कर रखा है, तो हमने उनके मार्गदर्शन के लिए स्थान कहाँ छोड़ा? घंटाकर्ण ने महादेव की बात मानी। उसके भीतर परिवर्तन का द्वार इसी आज्ञापालन से खुला। उसे अपनी साधना छोड़ने को नहीं कहा गया था; उसकी साधना में जुड़ी संकीर्णता का सामना कराया गया था। अपने प्रिय के निर्देश पर अपनी धारणा बदलना पराजय नहीं होता। वह प्रेम के भीतर जन्म लेने वाला विश्वास होता है, जिसमें हम स्वयं को भी जाँचने लगते हैं।
इस प्रसंग में एक सुंदर संगति और है। श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् शंकर के दर्शन के लिए कैलाश जा रहे थे। मार्ग में बद्रीनाथ के निकट घंटाकर्ण से उनका मिलन हुआ। एक ओर शिव का भक्त विष्णु की ओर भेजा गया है और दूसरी ओर कृष्ण शिव के दर्शन के लिए जा रहे हैं। जिसे घंटाकर्ण अपने भीतर विरोध बनाकर सँभाले हुए था, कथा उसी दूरी को मिटाती है। उसके द्वेष की दीवार देवताओं के व्यवहार से पुष्ट नहीं होती। वह दीवार उसकी अपनी भेद-बुद्धि की बनाई हुई थी, और उसे पहचानना भी उसी को था।
हम अक्सर अपने आग्रह को इतना महत्त्व दे देते हैं कि आराधना भी उसके चारों ओर घूमने लगती है। घंटाकर्ण का परिवर्तन हमें ठहरकर पूछने देता है कि क्या मेरी श्रद्धा मुझे सुनने योग्य बना रही है? यदि कोई संकेत मेरे भीतर की घृणा को चुनौती दे, तो क्या मैं उसे ग्रहण करूँगा? इस कथा में आगे बढ़ने के लिए उसे किसी और को गलत सिद्ध नहीं करना पड़ा। उसे अपने ही पुराने विरोध से बाहर आना पड़ा। महादेव के प्रति उसका विश्वास तब अधिक स्पष्ट हुआ, जब उसने उस दिशा में कदम रखा, जिससे वह पहले दूर भागता था।
मन की शुद्धि का प्रश्न
श्रीकृष्ण को देखकर घंटाकर्ण ने उनकी सेवा करने की इच्छा की। उसने उन्हें पहचानकर प्रणाम किया और अपने मन की शुद्धि की कामना व्यक्त की। उसकी प्रार्थना में अब केवल अपनी शक्ति या अपनी स्थिति का आग्रह नहीं था। वह यह समझने लगा था कि मन ही विषयों और भेद-बुद्धि में उलझाता है। जिस मन ने उसे एक नाम से घृणा करना सिखाया था, उसी मन की अशुद्धि उसके सामने प्रश्न बन गई। यह परिवर्तन बाहर से लगाए हुए किसी चिह्न का नहीं था। वह अपने भीतर चल रही उस प्रक्रिया को पहचान रहा था, जिसने उसे बाँध रखा था।
उसकी बात का आशय कितना सीधा है: जब तक मन की अपवित्रता पर ध्यान नहीं दिया, तब तक केवल शरीर को धो लेने से क्या लाभ? यह प्रश्न बाहरी स्वच्छता का विरोध नहीं करता। यह उस अधूरेपन को सामने लाता है जिसमें हम बाहर की तैयारी कर लेते हैं और भीतर की कठोरता को छूते ही नहीं। घंटाकर्ण अपनी दशा के लिए अब केवल दूसरों की ओर नहीं देख रहा था। उसने अपने चित्त की ओर देखना आरंभ किया। जो पहले किसी नाम को बाहर रोकना चाहता था, वही अब अपने भीतर की अशुद्धि को पहचानना चाहता है।
यहाँ साधना की कठिनाई भी समझ में आती है। बाहर की घंटियों को देख लेना सरल है; भीतर की भेद-बुद्धि को स्वीकार करना अधिक कठिन। हम अपने विरोध के लिए अनेक कारण खोज सकते हैं, पर घंटाकर्ण की प्रार्थना उन कारणों की ओट नहीं लेती। वह अपनी अवस्था को श्रीकृष्ण के सामने रख देता है। मैं इस स्वीकार में उसके परिवर्तन की सच्चाई देखता हूँ। जब तक मन अपनी गाँठ को गुण समझता रहेगा, वह उसे खोलने की आवश्यकता भी नहीं मानेगा। गाँठ दिखाई देना ही पर्याप्त नहीं, उसे गाँठ मानना भी आवश्यक है।
घंटाकर्ण ने उस दुःखद अवस्था से मुक्त होने की प्रार्थना की। उसने यह भी चाहा कि यदि जन्म हो, तो भगवान् उसके हृदय में रहें। पहले उसकी चिंता थी कि एक नाम कानों में न पड़े; अब उसकी आकांक्षा है कि वही प्रभु हृदय में बसें। इस परिवर्तन के दोनों सिरों को साथ रखकर देखिए। जिस उपस्थिति को रोकने के लिए घंटियाँ थीं, उसी उपस्थिति को वह अपने जीवन का आश्रय बनाना चाहता है। भक्ति का विस्तार यहाँ शब्द बढ़ने में नहीं, हृदय की दिशा बदलने में दिखाई देता है। वह विरोध से स्मरण की ओर लौट रहा था।
भावना और आचरण की पहचान
प्रसंग में घंटाकर्ण की भेंट सहज स्वीकार की जाने वाली वस्तु नहीं थी। अपनी पिशाच वृत्ति और भोजन की धारणा के अनुसार उसने एक मृत ब्राह्मण का शरीर श्रीकृष्ण के सामने भोजन के रूप में रखा। इस प्रसंग को केवल इतना कहकर नहीं छोड़ना चाहिए कि प्रेम हो तो कोई भी आचरण उचित हो जाता है। श्रीकृष्ण ने उस भेंट की अनुपयुक्तता स्पष्ट की। उन्होंने उसे अपने लिए ग्रहण करने योग्य नहीं बताया। साथ ही उन्होंने घंटाकर्ण के भीतर आए भक्ति-भाव को पहचाना। कथा दोनों बातों को एक साथ रखती है: वस्तु की अनुचितता और मन में जागा समर्पण।
यह भेद समझना आवश्यक है। करुणा का अर्थ अनुचित को उचित घोषित कर देना नहीं है। श्रीकृष्ण ने घंटाकर्ण को अपमानित करके दूर नहीं किया और उसकी भेंट को भोजन मानकर ग्रहण भी नहीं किया। उन्होंने उसके सत्कार की भावना को स्वीकार किया। इस प्रकार उसे ऐसा उत्तर मिला जिसमें मार्गदर्शन भी था और आश्रय भी। उसके अज्ञान को छिपाया नहीं गया, पर उसे केवल उसके अज्ञान तक सीमित भी नहीं कर दिया गया। उसके भीतर जो परिवर्तन आरंभ हुआ था, उसे पहचाना गया। यही करुणा व्यक्ति को अपनी पुरानी अवस्था से आगे बढ़ने का अवसर देती है।
हम इस प्रसंग से भाव की महत्ता समझ सकते हैं, लेकिन भाव के नाम पर कर्म की जाँच छोड़ देने का निष्कर्ष नहीं निकाल सकते। यदि ऐसा होता, तो श्रीकृष्ण भेंट की अनुपयुक्तता कहते ही क्यों? उनका उत्तर भक्त के हृदय और उसकी समझ के बीच अंतर को सामने लाता है। हृदय में श्रद्धा हो सकती है और आचरण में अभी अज्ञान शेष हो सकता है। इसलिए सच्चा मार्गदर्शन केवल प्रशंसा नहीं करता; जहाँ सुधार आवश्यक हो, उसे बताता भी है। घंटाकर्ण के लिए कृपा का अर्थ यही था कि उसके प्रेम को स्थान मिला और उसके अज्ञान को दिशा मिली।
श्रीकृष्ण ने उसे स्पर्श करके सुंदर और कान्तिमय रूप प्रदान किया। कथा में उसके भाई पर भी कृपा हुई और मृत ब्राह्मण को जीवन देकर सम्मानपूर्वक विदा किया गया। इस अंत को पढ़ते हुए हमें आरंभ का घृणा से भरा मन याद रखना चाहिए। परिवर्तन केवल रूप का नहीं था; उससे पहले दृष्टि बदल चुकी थी। घंटाकर्ण अब प्रभु से बचने का उपाय नहीं खोज रहा था। वह उनकी करुणा को पहचानकर उनका स्मरण चाहता था। बाहरी रूपांतरण से पहले कथा हमें उस भीतरी परिवर्तन तक ले जाती है, जिसके बिना इस मिलन का आशय अधूरा रह जाता।
अब भीतर क्या सुनाई देता है
इसी प्रसंग के साथ शबरी की भक्ति का उल्लेख भी आता है। उनके बेरों में भगवान् राम के लिए प्रेम था। दोनों कथाओं की भेंट एक जैसी नहीं है और उन्हें एक जैसा बताने की आवश्यकता भी नहीं। उनके भीतर समझने योग्य बात वह हृदय है जो अपने आराध्य का स्वागत करना चाहता है। घंटाकर्ण के प्रसंग में मार्गदर्शन और सुधार स्पष्ट हैं; शबरी के प्रसंग में सेवा और प्रतीक्षा का अपनापन है। भाव की पहचान दोनों में है, पर प्रत्येक घटना का अपना स्वरूप सुरक्षित रखना चाहिए। तभी हम कथा से वही ग्रहण करते हैं जो उसमें वास्तव में सामने आया है।
घंटाकर्ण की यात्रा हमें केवल किसी दूसरे की भूल दिखाने के लिए नहीं मिली है। वह अपने भीतर झाँकने का अवसर देती है। क्या हम किसी नाम या रूप से घृणा करते हुए स्वयं को भक्त कहते हैं? क्या हम अपने आराध्य का निर्देश सुनने के लिए तैयार हैं, यदि वह हमारे पुराने आग्रह को बदलने की माँग करे? क्या हम बाहर की तैयारी के साथ अपने मन की दिशा भी देखते हैं? ये प्रश्न हमें दोषों की सूची बनाकर निराश करने के लिए नहीं हैं। ये उस परिवर्तन को संभव मानने के लिए हैं जो इस कथा में घटित हुआ है।
जिसने अपने कान बंद कर रखे थे, वही सुनने लगा; जिसने विरोध सँभाल रखा था, वही प्रणाम करने लगा। उसकी पुरानी अवस्था उसके सामने आई, पर उसका भविष्य उसी अवस्था में बंद नहीं कर दिया गया। मुझे इस कथा का यह आश्वासन बहुत गहरा लगता है। मन की कठोरता स्वीकार कर लेना अंत नहीं है। वहीं से उसके बदलने का मार्ग खुल सकता है। घंटाकर्ण ने अपनी घृणा को भक्ति की अंतिम पहचान बनाकर नहीं बचाया। अपने आराध्य की दिशा स्वीकार करके वह वहाँ पहुँचा जहाँ उसके विरोध का स्थान स्मरण ने लिया और उसके भय का स्थान आश्रय ने।
इसलिए मैं घंटाकर्ण की घंटियों को केवल उसके कानों में नहीं देखना चाहता। मैं पूछना चाहता हूँ कि मेरे भीतर कौन-सा आग्रह मुझे सुनने नहीं देता। जिस भक्ति से हृदय खुलना चाहिए, क्या उसी के नाम पर मैंने कोई द्वार बंद कर रखा है? श्रीकृष्ण के सामने घंटाकर्ण का प्रणाम इसी बंद द्वार के खुलने का संकेत है। वह अपने अज्ञान सहित उपस्थित हुआ और परिवर्तन के लिए स्थान बना सका। हमारे लिए भी कथा का आग्रह यही है कि प्रेम के साथ घृणा को न पालें, अपनी भूल को पहचानने से न भागें और अपने आराध्य के मार्गदर्शन को अपने हठ से बड़ा स्थान दें।