भारतीय ज्ञान परंपरा को सरल और प्रामाणिक रूप में समझाने का एक प्रयास...

11 अक्टूबर 2026 · डॉ. राजेश तकयार

भाग 4 — ज्ञान की परिभाषा

भाग 4 — ज्ञान की परिभाषा

श्रीकृष्ण से अर्जुन पूछते हैं कि उनका जन्म तो अभी का है, जबकि सूर्य बहुत प्राचीन हैं। फिर उन्होंने सूर्य को यह योग आरंभ में कैसे बताया था? यह प्रश्न तब उठता है जब श्रीकृष्ण कहते हैं कि उन्होंने यह अविनाशी योग पहले सूर्य को बताया था। सूर्य से मनु ने और मनु से इक्ष्वाकु ने इसे जाना। इसी परंपरा से राजर्षियों को यह ज्ञान प्राप्त हुआ। लेकिन लंबे समय के प्रभाव से इसकी समझ लुप्त होती गई। अब वही प्राचीन योग श्रीकृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं, क्योंकि अर्जुन उनके भक्त और मित्र हैं। अर्जुन के प्रश्न का उत्तर देते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं कि उनके और अर्जुन के अनेक जन्म बीत चुके हैं। वे उन सभी को जानते हैं, लेकिन अर्जुन उन्हें नहीं जानते। वे अजन्मा और अविनाशी होते हुए भी अपनी प्रकृति को अधीन रखकर अपनी योगमाया से प्रकट होते हैं। जब धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ता है, तब वे प्रकट होते हैं। सज्जनों की रक्षा, दुष्टों के विनाश और धर्म की स्थापना के लिए उनका प्राकट्य होता है। उनके जन्म और कर्म की वास्तविक दिव्यता को जानने वाला मनुष्य शरीर छोड़ने के बाद पुनर्जन्म के बंधन से मुक्त होकर उन्हें प्राप्त होता है। श्रीकृष्ण बताते हैं कि राग, भय और क्रोध से मुक्त होकर, उनमें मन लगाकर और उनकी शरण में रहकर अनेक लोग ज्ञान और तप से शुद्ध हुए हैं। मनुष्य जिस भाव से उनकी ओर आता है, वे भी उसे उसी भाव से अपनाते हैं। इस प्रकार ज्ञान का संबंध मन की शुद्धि, समर्पण और ईश्वर के साथ उसके संबंध से जुड़ता है। फिर श्रीकृष्ण कर्म की ओर लौटते हैं। वे गुण और कर्म के आधार पर व्यवस्था की बात करते हुए अपनी निर्लिप्तता समझाते हैं। कर्म उन्हें बाँधते नहीं, क्योंकि उनमें कर्मफल की इच्छा नहीं है। इस सत्य को जानकर पहले भी मुक्ति चाहने वालों ने कर्म किए हैं। इसलिए अर्जुन को भी कर्म करना है, लेकिन उसके बंधन का कारण समझते हुए। श्रीकृष्ण कहते हैं कि क्या कर्म है और क्या अकर्म, इस विषय में बुद्धिमान लोग भी भ्रमित हो जाते हैं। उचित कर्म को समझना आवश्यक है, अनुचित कर्म को पहचानना आवश्यक है और अकर्म के तत्त्व को भी जानना आवश्यक है। कर्म की गति गहरी है। कोई बाहर से बहुत सक्रिय दिखाई दे सकता है, फिर भी उसके भीतर फल की आसक्ति और कर्तापन का अहंकार न हो। दूसरा व्यक्ति बाहर से शांत बैठा हो सकता है, लेकिन उसका मन इच्छाओं और कल्पनाओं में निरंतर लगा हो। इसलिए केवल बाहर की गतिविधि देखकर किसी की आंतरिक अवस्था नहीं समझी जा सकती। श्रीकृष्ण उस मनुष्य को बुद्धिमान कहते हैं जो कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म को देखता है। वह समझता है कि कौन-सी भावना कर्म को बंधन बनाती है और किस चेतना से किया गया कर्म मुक्त रखता है। जिसके कर्म स्वार्थपूर्ण कामना से मुक्त हैं, जिसकी बुद्धि ज्ञान में स्थित है और जिसने फल की आसक्ति छोड़ दी है, वह कर्म करते हुए भी उससे बँधता नहीं। उसके भीतर संतोष होता है। वह अपने कार्य को निजी स्वामित्व और संग्रह की भूख से नहीं जोड़ता। समर्पण के भाव से किए गए उसके कर्म बंधन पैदा नहीं करते। इसी समर्पण को समझाते हुए श्रीकृष्ण यज्ञ की व्यापक दृष्टि सामने रखते हैं। अर्पण ब्रह्म है, अर्पित की जाने वाली सामग्री ब्रह्म है, अग्नि ब्रह्म है और अर्पण करने वाला भी ब्रह्म है। इस भाव में स्थित मनुष्य अपने कर्म में परम सत्य की ही उपस्थिति देखता है। इसके बाद वे यज्ञ के अनेक रूप बताते हैं। कोई देवताओं की उपासना करता है, कोई इन्द्रियों को संयमित करता है, कोई विषयों के प्रति अपने व्यवहार को साधता है। कोई द्रव्य से, कोई तप से, कोई योगाभ्यास से और कोई स्वाध्याय तथा ज्ञान से यज्ञ करता है। प्राणों का संयम और नियमित आहार भी इसी साधना के रूपों में आते हैं। इन सभी में मनुष्य अपने जीवन की किसी शक्ति को अनुशासित और समर्पित करता है। उसकी इन्द्रियाँ, मन, प्राण, साधन और कर्म एक उच्च उद्देश्य की ओर प्रवृत्त होते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि द्रव्य से किए गए यज्ञ की अपेक्षा ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है, क्योंकि सभी कर्मों की पूर्णता ज्ञान में होती है। कर्म का वास्तविक उद्देश्य समझ में आने पर उसे करने की दृष्टि भी बदल जाती है। लेकिन यह ज्ञान प्राप्त कैसे हो? श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि तत्त्व को जानने वालों के पास विनम्रता से जाएँ, उनसे प्रश्न करें और सेवा-भाव रखें। तत्त्वदर्शी ज्ञानी उन्हें उस सत्य का उपदेश देंगे। यहाँ ज्ञान प्राप्त करने के लिए जिज्ञासा भी आवश्यक है और सीखने की विनम्रता भी। अर्जुन स्वयं प्रश्न करते हुए ही अपनी उलझनों को स्पष्ट कर रहे हैं। इस ज्ञान से दृष्टि का विस्तार होता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि इसे पाकर अर्जुन फिर उसी मोह में नहीं पड़ेंगे। वे सभी प्राणियों को अपने में और फिर श्रीकृष्ण में देखेंगे। जीवन के भीतर विद्यमान एकत्व की यह पहचान अलगाव और भ्रम की पकड़ को कम करती है। श्रीकृष्ण ज्ञान को नाव और अग्नि के रूप में भी समझाते हैं। मनुष्य कितना ही पापग्रस्त क्यों न रहा हो, ज्ञान की नाव से वह उस संकट को पार कर सकता है। जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधन को भस्म कर देती है, वैसे ही ज्ञान की अग्नि कर्मों के बंधन को जला देती है। इसलिए ज्ञान परिवर्तन की संभावना भी है। अज्ञान में किए गए कर्म मनुष्य को बाँधते हैं; सत्य की पहचान उसे अपनी चेतना और कर्म की दिशा बदलने का आधार देती है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला कुछ नहीं है। योग में परिपक्व होता हुआ मनुष्य समय के साथ इसे अपने भीतर प्राप्त करता है। श्रद्धा, साधना के प्रति तत्परता और इन्द्रियों का संयम उसे ज्ञान तक ले जाते हैं। ज्ञान प्राप्त होने पर परम शांति मिलती है। इसके विपरीत, जो मन अज्ञान और संशय में फँसा रहता है, वह किसी दिशा में स्थिर नहीं हो पाता। इसलिए श्रीकृष्ण अर्जुन को अपने हृदय में स्थित अज्ञानजनित संशय को ज्ञान की तलवार से काटने के लिए कहते हैं। उन्हें योग में स्थित होकर उठना है। चौथे अध्याय में ज्ञान की पहचान उसके प्रभाव से होती है। वह मोह को स्पष्टता में, आसक्ति को समर्पण में और संशय को विवेकपूर्ण कर्म में बदलता है। अर्जुन को ऐसा ज्ञान प्राप्त करना है जिसके प्रकाश में वे अपने कर्म को पहचान सकें और उसे करते हुए भी उसके बंधन से मुक्त रहें। लेखक ने इसका विस्तार अपनी निम्न पुस्तक में 58,000 शब्दों में किया है। श्रीमद्भगवद्गीता — भाग 4 — ज्ञान की परिभाषा

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