भारतीय ज्ञान परंपरा को सरल और प्रामाणिक रूप में समझाने का एक प्रयास...

11 अक्टूबर 2026 · डॉ. राजेश तकयार

भाग 12 — पूजन किस का करें

भाग 12 — पूजन किस का करें

अर्जुन श्रीकृष्ण से पूछते हैं कि जो भक्त उनके सगुण स्वरूप की उपासना करते हैं और जो अव्यक्त, अविनाशी ब्रह्म का चिंतन करते हैं, उनमें श्रेष्ठ योगी कौन हैं। वे उपासना की दिशा को स्पष्ट समझना चाहते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो मन को उनमें स्थिर करके, निरंतर और पूर्ण श्रद्धा से उनकी उपासना करते हैं, वे उनके मत में श्रेष्ठ योगी हैं। भक्ति में मन का जुड़ाव और निष्ठा की निरंतरता विशेष महत्व रखती है। अव्यक्त ब्रह्म की उपासना करने वाले भी उन्हें प्राप्त होते हैं। इसके लिए इन्द्रियों का संयम, समदृष्टि और सभी प्राणियों के कल्याण में प्रवृत्ति आवश्यक है। किंतु देहधारी मनुष्य के लिए अव्यक्त का चिंतन कठिन होता है। श्रीकृष्ण अर्जुन के सामने ऐसा मार्ग रखते हैं जिसमें मन, बुद्धि और कर्म धीरे-धीरे एक ही लक्ष्य से जुड़ सकें। वे कहते हैं कि अपने सभी कर्म उन्हें अर्पित करके और उन्हें परम लक्ष्य मानकर उनका ध्यान करो। जिसका चित्त उनमें लगा है, उसके उद्धार का आश्वासन वे देते हैं। भक्त अपने को अकेले संघर्ष करते हुए नहीं देखता। उसका आश्रय स्पष्ट होता है और उसकी साधना में विश्वास बना रहता है। सबसे पहले श्रीकृष्ण मन और बुद्धि को उनमें स्थिर करने के लिए कहते हैं। यदि यह स्थिरता तुरंत संभव न हो, तो अभ्यास का मार्ग है। मन भटके तो उसे फिर लौटाया जाए। निरंतर प्रयत्न धीरे-धीरे उसे तैयार करता है। यदि अभ्यास भी कठिन लगे, तो उनके लिए कर्म किया जाए। जीवन में जो कार्य सामने हैं, उन्हें समर्पण का अवसर बनाया जाए। इस प्रकार हाथ कर्म में लगे रहते हैं और भीतर उसकी दिशा बदलने लगती है। यदि इतना भी सहज न हो, तो आत्मसंयम के साथ कर्मफल का त्याग किया जाए। फल की पकड़ ढीली होने पर मन को शांति मिलती है। श्रीकृष्ण साधक की क्षमता के अनुसार आगे बढ़ने का उपाय बताते हैं। इसके बाद भक्ति की पहचान मनुष्य के व्यवहार में सामने आती है। प्रिय भक्त वह है जो किसी प्राणी से द्वेष नहीं रखता, सबके प्रति मैत्री और करुणा रखता है तथा अहंकार और ममता के दबाव से मुक्त होता है। वह सुख-दुःख में समता रखने का प्रयास करता है और क्षमाशील होता है। उसकी संतुष्टि हर इच्छा पूरी हो जाने की प्रतीक्षा नहीं करती। वह संयमित और दृढ़ निश्चय वाला होता है। जिससे संसार को उद्वेग न हो और जो स्वयं भी हर बाहरी बात से विचलित न हो, वह श्रीकृष्ण को प्रिय है। उसका जीवन भय और कठोरता फैलाने वाला नहीं होता। उसकी उपस्थिति दूसरों के लिए सहजता का कारण बनती है। भक्त शुद्ध, दक्ष और अपेक्षाओं की बेचैनी से मुक्त होता है। उसकी निष्ठा कर्म में कुशलता के साथ रहती है। वह ऐसे उपक्रमों से दूर होता है जो केवल अहंकार और स्वार्थ को बढ़ाने के लिए किए जाते हैं। निंदा और प्रशंसा, सम्मान और अपमान, मित्र और विरोधी—इन सबके बीच वह अपना विवेक सँभालता है। किसी की प्रशंसा उसे अपने से बड़ा नहीं बना देती और किसी की निंदा उसके भीतर के आधार को समाप्त नहीं कर देती। उसकी वाणी में संयम और मन में संतोष होता है। वह परिस्थितियों में रहता है, पर किसी एक व्यवस्था को पकड़कर अपनी संपूर्ण शांति उसी पर निर्भर नहीं कर देता। उसकी बुद्धि परम लक्ष्य में स्थिर होती जाती है। श्रीकृष्ण अंत में कहते हैं कि जो श्रद्धा से इस धर्ममय उपदेश का आचरण करते हैं और उन्हें परम लक्ष्य मानते हैं, वे अत्यंत प्रिय हैं। इस प्रकार पूजन का प्रश्न चरित्र तक पहुँचता है। भक्ति का प्रकाश करुणा, क्षमा, संतोष, संयम और समर्पित कर्म में दिखाई देता है। लेखक ने इसका विस्तार अपनी निम्न पुस्तक में 43,975 शब्दों में किया है। श्रीमद्भगवद्गीता — भाग 12 — पूजन किस का करें

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