भारतीय ज्ञान परंपरा को सरल और प्रामाणिक रूप में समझाने का एक प्रयास...

11 अक्टूबर 2026 · डॉ. राजेश तकयार

भाग 18 — मोक्ष

भाग 18 — मोक्ष

अर्जुन श्रीकृष्ण से संन्यास और त्याग का वास्तविक अर्थ अलग-अलग समझाने का अनुरोध करते हैं। अब तक कर्म, ज्ञान, भक्ति और संयम के अनेक पक्ष सामने आ चुके हैं। वे जानना चाहते हैं कि इन सबके बीच क्या छोड़ना आवश्यक है और किसे जीवन में बनाए रखना चाहिए। श्रीकृष्ण बताते हैं कि कामना से किए जाने वाले कर्मों को छोड़ना संन्यास कहा जाता है। समस्त कर्मों के फल का त्याग करना त्याग कहलाता है। यज्ञ, दान और तप जैसे पवित्र करने वाले कर्मों को छोड़ना उचित नहीं है। उन्हें आसक्ति और फल की इच्छा से मुक्त होकर करना चाहिए। त्याग भी तीन प्रकार का होता है। मोह के कारण कर्तव्य छोड़ देना तामसिक है। शरीर को कष्ट होने के भय से कर्म छोड़ देना राजसिक है। कर्तव्य समझकर, आसक्ति और फल का त्याग करते हुए कर्म करना सात्त्विक त्याग है। देहधारी मनुष्य के लिए सभी कर्मों को पूरी तरह छोड़ देना संभव नहीं है। इसलिए वास्तविक त्याग कर्म के भीतर साधना बनता है। त्यागी कठिन कार्य से द्वेष नहीं करता और अनुकूल कार्य में चिपकता नहीं। उसकी निष्ठा कर्तव्य पर रहती है। इसके बाद श्रीकृष्ण कर्म की सिद्धि के पाँच कारण बताते हैं—आधार, कर्ता, साधन, विभिन्न प्रयास और दैव। किसी भी परिणाम में अनेक कारण काम करते हैं। जो स्वयं को ही एकमात्र कर्ता मानता है, उसकी समझ अधूरी है। यह विवेक अहंकार को कम करता है। मनुष्य अपना प्रयत्न करता है, लेकिन पूरी व्यवस्था को अपनी निजी शक्ति का परिणाम नहीं मानता। इससे सफलता में उसका घमंड और असफलता में उसका अत्यधिक टूटना, दोनों कम हो सकते हैं। श्रीकृष्ण ज्ञान, कर्म और कर्ता पर तीन गुणों का प्रभाव बताते हैं। सात्त्विक ज्ञान अनेक प्राणियों में एक अविनाशी तत्त्व देखता है। राजसिक ज्ञान भिन्नताओं में अधिक उलझा रहता है। तामसिक ज्ञान संकुचित होकर किसी एक अधूरी बात को ही पूरा सत्य मान लेता है। आसक्ति और राग-द्वेष से मुक्त होकर किया गया कर्तव्य सात्त्विक कर्म है। फल और अहंकार से प्रेरित कर्म राजसिक है। परिणाम, हानि और अपनी क्षमता का विचार किए बिना किया गया कर्म तामसिक है। कर्ता की पहचान भी उसके भीतर के भाव से होती है। सात्त्विक कर्ता में धैर्य और उत्साह होता है, लेकिन अहंकार की पकड़ कम होती है। वह सफलता और असफलता में अपना संतुलन बनाए रखता है। फल की तीव्र लालसा या प्रमाद उसके कर्म की दिशा को बदल देते हैं। बुद्धि का काम कर्तव्य-अकर्तव्य, बंधन-मुक्ति और उचित-अनुचित को पहचानना है। धृति उस पहचान पर टिके रहने की शक्ति है। सही समझ के साथ सही निष्ठा भी चाहिए; केवल किसी बात पर अड़े रहना अपने आप में श्रेष्ठ नहीं है। सुख के भी भेद हैं। कुछ सुख आरंभ में कठिन लगते हैं, लेकिन अंत में निर्मल प्रसन्नता देते हैं। कुछ तत्काल मधुर लगते हैं, पर बाद में दुःख का कारण बनते हैं। कुछ सुख के नाम पर मनुष्य को आलस्य और मोह में डुबो देते हैं। इसलिए सुख का मूल्य उसके आरंभ के साथ उसके परिणाम से भी समझना चाहिए। श्रीकृष्ण स्वभाव के अनुसार कर्तव्य निभाने का महत्व बताते हैं। मनुष्य अपने कर्म द्वारा उस परमात्मा की पूजा कर सकता है जिससे संपूर्ण जगत व्याप्त है। अपने कर्तव्य में कुछ कमी हो, फिर भी उसे समझकर निभाना दूसरे के मार्ग का बाहरी अनुकरण करने से श्रेष्ठ है। हर कर्म में कोई-न-कोई अपूर्णता हो सकती है, जैसे अग्नि के साथ धुआँ रहता है। इस कारण कर्तव्य से पीछे हटना समाधान नहीं है। आसक्ति छोड़कर और बुद्धि को शुद्ध करके उसी कर्म को साधना बनाया जा सकता है। श्रीकृष्ण आगे शुद्ध बुद्धि, आत्मसंयम, मिताहार, ध्यान और वैराग्य की बात कहते हैं। अहंकार, शक्ति का घमंड, कामना, क्रोध और संग्रह की पकड़ कम होने पर मनुष्य भीतर से शांत होता है। तब सभी प्राणियों के प्रति समभाव और परम भक्ति का मार्ग खुलता है। वे अर्जुन से कहते हैं कि अपने सभी कर्म उन्हें अर्पित करें और चित्त उनमें लगाए रखें। परमात्मा सभी प्राणियों के हृदय में स्थित हैं। उनका आश्रय लेकर मनुष्य कठिनाइयों के बीच भी दिशा और शांति प्राप्त कर सकता है। फिर श्रीकृष्ण अर्जुन को विचार की स्वतंत्रता देते हैं। वे कहते हैं कि यह ज्ञान समझा दिया गया है; अब उस पर पूरी तरह विचार करके जैसा उचित समझो, वैसा करो। अर्जुन को स्पष्ट समझ के साथ निर्णय तक पहुँचना है। अंतिम उपदेश में श्रीकृष्ण पूर्ण समर्पण का आह्वान करते हैं। मन को उनमें लगाना, उनकी भक्ति करना और उनका आश्रय लेना ही इस समर्पण का केंद्र है। वे अर्जुन को आश्वस्त करते हैं कि वे उन्हें पाप और बंधन से मुक्त करेंगे; उन्हें शोक नहीं करना चाहिए। इसके बाद श्रीकृष्ण पूछते हैं कि क्या अर्जुन ने एकाग्र होकर सुना और क्या अज्ञान से उत्पन्न मोह दूर हुआ। अर्जुन उत्तर देते हैं कि उनकी कृपा से मोह नष्ट हो गया है, सही समझ लौट आई है और संदेह मिट गए हैं। अब वे स्थिर होकर उनके वचन के अनुसार कर्म करेंगे। मोक्ष की शिक्षा इसी परिवर्तन में पूरी होती है। संवाद के आरंभ में अर्जुन संशय और शोक से घिरे हुए थे। अंत में उनके सामने कर्तव्य स्पष्ट है और मन में स्थिरता है। ज्ञान ने उनकी दृष्टि बदली, भक्ति ने उन्हें आश्रय दिया और त्याग ने कर्म की दिशा निर्मल की। अब वे समर्पण और विवेक के साथ आगे बढ़ने के लिए तैयार हैं। लेखक ने इसका विस्तार अपनी निम्न पुस्तक में 95,707 शब्दों में किया है। श्रीमद्भगवद्गीता — भाग 18 — मोक्ष

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