30 सितंबर 2026 · डॉ. राजेश तकयार

धर्मात्मा का अर्थ

धर्मात्मा का अर्थ

धर्मात्मा कौन है, वह क्या करता है, क्यों वह धर्मात्मा है ? धर्मात्मा वह होता है जिसका आत्मा धर्म से जुड़ा हो, जिसका हर कार्य सत्य, करुणा, न्याय और पवित्रता के आधार पर चलता हो। धर्मात्मा होना किसी विशेष वस्त्र, जाति, पद, जन्म या बाहरी चिन्ह से निर्धारित नहीं होता; धर्मात्मा होना मानव के आंतरिक चरित्र, उसकी आत्मा की दिशा और उसके कर्मों की पवित्रता से तय होता है। धर्मात्मा वह है जिसके भीतर की आवाज़ और विवेक; हमेशा जागृत हो, जो ग़लत को ग़लत कह सके, सही के लिए खड़ा हो सके, और अपने जीवन का लक्ष्य केवल अपना स्वार्थ या अहंकार नहीं रखे, बल्कि समग्र कल्याण और आत्मिक उन्नति को मानता हो। धर्मात्मा वह है जो अपने मन, बुद्धि और विचारों को शुद्ध रखता हो, परिस्थिति की कठोरता या दूसरों के व्यवहार से प्रभावित होकर अपनी धारणा नहीं बदलता। वह ईमानदार रहता है, परंतु कठोर नहीं होता; विनम्र होता है, परंतु कमजोर नहीं होता; करुणा-शील होता है, परंतु भावुकता के आधीन नहीं होता। उसका जीवन किसी बाहरी दिखावे का परिणाम नहीं होता, बल्कि उसकी आंतरिक साधना का प्रतिबिंब होता है। वह सत्य बोलता है, क्योंकि सत्य उसकी पूजा है। वह न्याय करता है, क्योंकि न्याय उसका धर्म है। वह किसी के साथ छल, धोखा, कपट, हिंसा, ईर्ष्या, द्वेष या बुराई नहीं करता, क्योंकि उसका मन पवित्र और शांत रहता है। वह क्रोध को अपने ऊपर हावी नहीं होने देता, क्योंकि वह जानता है कि क्रोध विवेक को नष्ट कर देता है। धर्मात्मा का मन शांत, स्थिर और सुदृढ़ होता है, इसलिए उसे कोई भय नहीं सताता, कोई लालच नहीं बहलाता, और कोई मोह उसके हृदय को बांध नहीं पाता।

उसके कर्म स्वयं उसके उद्घोषक होते हैं। वह जो करता है, उसमें किसी तरह का स्वार्थ या अहंकार नहीं होता। वह दूसरों की सहायता करता है, पर एहसान नहीं जताता। वह सेवा करता है, पर बदले में कुछ नहीं चाहता। उसका भला मानवों के लिए ही नहीं, बल्कि पशुओं, प्रकृति, जल, वायु, पर्यावरण आदि सबके लिए होता है। वह वृक्ष काटने से पहले सौ बार सोचता है, पर्यावरण की हानि नहीं करता, किसी घायल जीव को देखकर आंखें नहीं फेरता, किसी भूखे मानव को देखकर मन नहीं मोड़ता। वह अपने कर्मों को ईश्वर का आदेश मानकर करता है, और परिणाम को ईश्वर पर छोड़ देता है। धर्मात्मा वह है जो अपने विचारों में पवित्र रहे। केवल बाहर से अच्छा होना धर्म नहीं; धर्म तो भीतर की बुराइयों को जीतना है। वह लोभ, मोह, क्रोध, घृणा, ईर्ष्या, दूसरों की निंदा और अपने भीतर के पशु-स्वभाव को जीतता है। वह अपने मन को राग-द्वेष से मुक्त रखता है, किसी से घृणा नहीं करता, किसी के लिए बुरा नहीं सोचता। यदि कोई उसे अपमानित कर दे, तब भी वह क्षमा और करुणा से काम लेता है, क्योंकि वह जानता है कि क्षमा धर्म का सर्वोच्च रूप है और क्रोध आत्मा का सबसे बड़ा विष। उसके जीवन की सबसे बड़ी विशेषता उसका निश्चय है; सही करने का, और सही बने रहने का। वह कठिन परिस्थितियों में भी सत्य का साथ नहीं छोड़ता। चाहे संसार उसका विरोध करे, वह धर्म से नहीं हटता। धर्मात्मा वह है जो भीड़ की दिशा में नहीं चलता, बल्कि सत्य की दिशा में चलता है। उसके लिए सुविधा महत्वपूर्ण नहीं, बल्कि सिद्धांत महत्वपूर्ण होते हैं। वह लोभ और भय; दोनों से मुक्त रहता है, क्योंकि लोभ मानव को पाप की ओर ले जाता है और भय मानव को कायर बना देता है; ये वह भली प्रकार से जानता है। वह इन सबसे ऊपर उठा रहता है।

धर्मात्मा कर्मयोगी समाज में परिवर्तन का कारण बनता है। उसका हर व्यवहार दूसरों के लिए प्रेरणा बनता है। वह माता-पिता को सम्मान देता है, गुरु की सेवा करता है, बच्चों को संस्कार देता है, और समाज में शांति, सद्भाव, प्रेम और नैतिकता का प्रसार करता है। वह घर में भगवान् का जैसा आदर करता है, वैसा ही बाहर भी करता है। धर्मात्मा का घर मंदिर की तरह होता है, जिसमें सत्य, प्रेम और दिव्यता निवास करते हैं, वह वही करता है जो सत्य और कर्तव्य उसे बताते हैं। वह धर्म का पालन करता है, अपने व्यवहार से, अपने विचारों से, अपने कर्मों से, और अपने समर्पण से। वह नियमों से नहीं, मानसिक पवित्रता से चलता है। वह अपने जीवन को ईश्वर को समर्पित मानता है और हर कार्य ईश्वर को अर्पण करता है। वह श्रम करता है, लेकिन फल की चिंता नहीं करता। वह सफलता को अहंकार नहीं बनाता और असफलता को निराशा नहीं बनने देता। वह हर परिस्थिति में संतुलित रहता है, जैसा भगवान् कृष्ण ने यहाँ ‘स्थितप्रज्ञ ज्ञान’ स्थिति में बतलाया है। वह इन सब कारणों से ईश्वर को प्रिय है, इस कारण वह धर्मात्मा के भीतर अपने स्वरूप में निवास करते हैं। वह सत्य में चलता है और सत्य ही ईश्वर है। वह करुणा करता है और करुणा ईश्वर का गुण है। वह न्याय करता है और न्याय धारणा ईश्वर की इच्छा है। वह लोभ और मोह से मुक्त रहता है और यह मुक्ति ही ईश्वर की प्राप्ति का मार्ग है। भगवान् को धर्मात्मा इसलिए प्रिय है क्योंकि धर्मात्मा के मन में स्वार्थ नहीं होता, द्वेष नहीं होता, घृणा नहीं होती। उसका हृदय स्वच्छ और प्रेम से भरा होता है और ऐसा हृदय भगवान् का निवास स्थान बन जाता है। श्रीकृष्ण यही अर्जुन को बता रहे हैं ‘क्षिप्रम् भवति धर्मात्मा। न मे भक्तः प्रणश्यति’ अर्थात् धर्मात्मा बहुत जल्दी शांति प्राप्त करता है और मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।

ऐसा धर्मात्मा कर्मयोगी वह है जिसके जीवन को देखकर भगवान् मुस्कुराते हैं, क्योंकि धर्मात्मा वही करता है जो स्वयं ईश्वर करते हैं यानि सदैव सत्य का साथ, सबसे प्रेम करना, सब पर करुणा रखना, सबके साथ न्याय करना, सब के प्रति समभाव रखना, निःस्वार्थ सेवा करना और पवित्रता बनाए रखने। धर्मात्मा की सबसे बड़ी विशेष पहचान यह है कि वह भगवान् को पाने की कोशिश नहीं करता, बल्कि भगवान् स्वयं उसके पीछे खिंच जाते हैं। धर्मात्मा का मन इतना निर्मल होता है कि उसकी आत्मा पर ईश्वर का प्रकाश स्वाभाविक रूप से प्रकट होने लगता है। धर्मात्मा वह है जो स्वयं को जीत चुका है; जिसकी आत्मा धर्म से प्रकाशित है; जिसके मन में सत्य, करुणा, प्रेम, विनम्रता और समभाव है; जिसका हर कर्म निःस्वार्थ, ईमानदार और लोक हितकारी है; जिसे अपने जीवन में ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव रहता है; और जो संसार में रहते हुए भी लोक-संग्रह करते हुए हर पल श्रीकृष्ण जी का भक्त बना रहता है। वही सच्चा धर्मात्मा है, और वही परमात्मा का प्रिय है।

जो धर्मात्मा है उसे भगवान् को पाने के लिए कुछ नहीं करना होता, ईश्वर स्वयं उसके हृदय में निवास करने लगते हैं।

डॉ. राजेश तकयार

डॉ. राजेश तकयार

लेखक · स्वतंत्र शोधकर्ता

पूरी जीवनी पढ़ें →