भारतीय ज्ञान परंपरा को सरल और प्रामाणिक रूप में समझाने का एक प्रयास...

18 अक्टूबर 2026 · डॉ. राजेश तकयार

श्रीमद्भगवद्गीता: नियमों की किताब

श्रीमद्भगवद्गीता: नियमों की किताब

जीवन और प्रकृति के नियम

गीता क्या है, ये हर मानव के लिए संसार में रहने के नियमों की किताब भी है। आप सड़क पर चलते हैं। नियम के अनुसार दाएं या बाएं चलते हैं। अगर किसी वाहन में हैं तो किसी स्थान पर सामने लाल बत्ती दिखाई देने पर अपने वाहन को आपको रोकना होता है क्योंकि ऐसा न करने पर सरकार के बनाएं नियम के अनुसार आप को दंड का नुकसान उठाना होगा।

यह केवल एक छोटा सा उदाहरण है। ये सारी प्रकृति ईश्वर की बनाई एक व्यवस्था है। ये भी उनके बनाए हुए नियमों से ही चल रही है, तभी जीवित है। श्रीमद्भगवद्गीता प्रभु के बनाएं उन नियमों की एक किताब को श्रीकृष्णजी ने कुरुक्षेत्र युद्धभूमि में अर्जुन को बताया था। क्योंकि उस समय अर्जुन परमात्मा के बनाए नियम को तोड़ने जा रहा था।

मोह के सामने कर्तव्य का प्रश्न

वह जन्म से क्षत्रिय कुल में पैदा हुए। क्षत्रिय का कार्य है समाज-राज्य की रक्षा करना, अपने परिवार की रक्षा करना, अपने स्वयं की रक्षा करना। परन्तु जब ये सब करने का समय आया तो वह पीछे हटने लगा। क्योंकि उन्हें सामने अपने संबंधी दिखाई दे रहे थे, जिन्होंने कई बार अन्याय करते हुए उनके परिवार को और उन्हें दुःख दिया था। परन्तु अर्जुन अपने मोह के कारण उन्हें दंड ही नहीं देना चाह रहे थे। वह अपने कर्तव्य से ही पीछे हटने लगे। तब श्रीकृष्ण जी ने उसे अपना बनाया पहला नियम बताया कि हर मानव को अपना कर्तव्य करना नहीं छोड़ना चाहिए। क्योंकि इसी से संसार चल रहा है, सूर्य चल रहा है, धरती घूम रही है, आकाश में ग्रह चल रहे हैं, वायु बह रही है, जल बह रहा है, प्रकृति के हर जीव को वायु प्राण दे रही है। अगर इनमें से कोई भी नियम भूल कर रुक जाएगा तो सारी प्रकृति डांवांडोल हो सकती है, नष्ट हो जाएगी।

तब अर्जुन उत्सुकता से भगवान् कृष्ण से प्रश्न करते गए और ईश्वर उसके प्रत्येक प्रश्न का नियमानुसार उत्तर भी देते गए। तो फिर श्रीमद्भगवद्गीता की रचना हो गई। आप इस नियमावली ग्रंथ को पढ़ कर यही नियम जानते हैं कि कर्म क्या है ? शरीर क्यों नष्ट हो जाता है ? आत्मा क्यों नष्ट नहीं होती ? किसी से मोह कहाँ तक करना चाहिए ? अपने किए कर्म के फल की कितनी उपेक्षा रखनी चाहिए ? किसी को दुःख क्यों नहीं देना चाहिए ? किसी कार्य को करने के पश्चात उसका फल पाने की लालसा क्यों नहीं रखनी चाहिए ? ईश्वर कहाँ पर हैं ? क्यों घमंड नहीं करना चाहिए ? मानव जन्म क्यों लेता है ? मानव मरता क्यों है ? मानव सन्यास ले या कर्म करे ? मानव किस ईश्वर की पूजा करें ? कोई मानव बुरा क्यों होता है ? अच्छा मानव कौन है ? मेरा क्या है ? मेरा क्या नहीं है ?

कर्म का नियम और मुक्तिमार्ग

इन्हीं सबके नियम ही तो भगवान् कृष्ण अर्जुन को बताते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता के पहले अध्याय में तो अर्जुन यही कहते हैं कि मैं आपका बनाया नियम तोड़ रहा हूँ, मैं क्षत्रिय होकर भी अपने परिवार को विपदा में देखकर भी युद्ध नहीं करूँगा। यह मेरा धनुष और बाण रखा है। तब दूसरे अध्याय में श्रीकृष्ण अर्जुन को पहला नियम बताते हैं कि जिसने जन्म लिया है उसे कर्म तो करना ही पड़ेगी। जिसने जन्म लिया है उसे मरना भी पड़ेगा। आत्मा अविनाशी है; इसलिए शरीर के परिवर्तन और मृत्यु को समझकर मनुष्य शोक में डूबने के बजाय विवेक पूर्वक कर्तव्य निभाए। ये ईश्वर का बनाया नियम है जो उन्होंने दूसरे भाग में कहा है।

श्रीकृष्ण स्पष्ट कहते हैं कि सफलता-विफलता, लाभ-हानि और सुख-दुःख में समभाव रखकर फलासक्ति छोड़ना ही स्थिरबुद्धि कर्मयोगी की साधना है। भाग तीन में माधव नियम बताते हैं कि मनुष्य को नियत कर्म से भागना नहीं चाहिए; स्वार्थ छोड़कर किया कर्म स्वयं की उन्नति और लोककल्याण दोनों साधता है। यज्ञ भाव से कर्म करके प्रकृति और समाज के परस्पर सहयोग का चक्र बनाए रखें; केवल अपने लिए भोगना मानव के लिए धर्म विरुद्ध है। भाग चार में वह नियम बताते हैं कि ज्ञान परंपरा से मिलता है; उसे जीवन में उतारना चाहिए, क्योंकि निष्क्रियता नहीं, ज्ञान युक्त कर्म मुक्ति का मार्ग बनता है। हर कर्म समर्पण भाव से यज्ञ बन सकता है; इंद्रिय संयम, तप, दान और ज्ञान भी साधना के अलग-अलग श्रेष्ठ मार्ग हैं।

गृहस्थ और ध्यान

भाग पाँच में वह नियम बताते हैं कि संन्यास का अर्थ कर्तव्य छोड़ना नहीं; गृहस्थ जीवन में आसक्तिरहित कर्म करते हुए भी मनुष्य आंतरिक शांति पा सकता है। मनुष्य स्वयं शरीर और आत्मा को अलग समझे; आत्मा अजर है, इसलिए हानि-मृत्यु में समत्व और विवेक सदा बनाए रखे। भाग छः में वह नियम बताते हैं कि मन अभ्यास और वैराग्य से संयमित होता है; वही अनुशासित मन मित्र बनता है, जबकि अनियंत्रित मन दुःख बढ़ाता है। ध्यान में दृष्टि और चित्त स्थिर रखकर आत्मा पर मन लगता है; कोई भी किसी का असफल प्रयास भी आध्यात्मिक यात्रा में व्यर्थ नहीं जाता।

ईश्वर का वास

आगे भाग सात में श्रीकृष्ण नियम बताते हैं कि संसार की दृश्य वस्तुएँ प्रकृति में ईश्वर बसते हैं; समस्त अस्तित्व का मूल जानकर मनुष्य उनमें परम सत्ता की उपस्थिति पहचान सकता है। ईश्वर भक्ति लाभ का व्यापार नहीं; इसे प्रेम और तत्त्वज्ञान से करना चाहिए, भक्त श्रेष्ठ है क्योंकि वह सबमें ईश्वर देखता है। भाग आठ में वह नियम बताते हैं कि अंतिम समय का स्मरण जीवन भर के अभ्यास से बनता है; इसलिए कर्म करते हुए मन को निरंतर परमात्मा में लगाना चाहिए। ब्रह्म, कर्म और जीवन की गति समझकर विवेक पूर्वक साधना करनी चाहिए; पुण्यकर्म परम लक्ष्य से ऊपर नहीं हैं, यह याद रखना चाहिए।

भाग नौ में वह नियम बताते हैं कि ईश्वर सबमें स्थित होकर भी कर्मबंधन से परे हैं; इसलिए समस्त प्राणियों में दिव्यता देखकर अहंकार और भेदभाव सदा घटाना चाहिए। अपने ईश्वर को पत्र, पुष्प, फल या जल प्रेम से अर्पित करना चाहिए; भोजन, कर्म और तप भी समर्पण भाव से स्वयं पवित्र बनते हैं। जन्म, जाति, परंपरा या योग्यता ईश्वर भक्ति में बाधा नहीं होती; श्रद्धा और मन की पवित्रता ही सच्ची पात्रता हैं, ये नियम है।

ईश्वर की शक्तियाँ और विश्वरूप

भाग दस में कृष्ण नियम बताते हैं कि प्रकृति की शक्तियों और श्रेष्ठ गुणों में ईश्वर की विभूतियाँ पहचानना चाहिए; सीमित बुद्धि उनकी अनंतता मापने में असमर्थ रहती है, यह मेरा बनाया नियम है। प्रत्येक परिस्थिति में ईश्वर का स्मरण करके श्रेष्ठता, साहस और विवेक अपनाना चाहिए; विभूतियों का ज्ञान विनय जगाएगा और अहंकार घटाएगा। भाग ग्यारह में वह बताते हैं कि विश्वरूप में सृष्टि, पालन और संहार एक साथ देखकर काल की व्यापकता स्वीकार करो; मरना है ये जानकर भी मनुष्य अपना नियत कर्तव्य फिर भी निभाए, यह महत्वपूर्ण नियम है। अहंकार छोड़कर स्वयं को परम व्यवस्था का निमित्त समझो; विजय और विनाश दोनों पर अपना पूर्ण स्वामित्व कभी मत मानो। इसी कारण मैं यह अपना विश्वरूप तुम्हें दिखा रहा हूँ।

भाग बारह में वह नियम कहते हैं कि भक्ति में द्वेष, अहंकार और अस्थिरता छोड़कर करुणा, क्षमा, संतोष तथा समता अपनाओ; ऐसे भक्त भगवान को प्रिय होते हैं, यह भी नियम है। मन स्थिर न हो तो अभ्यास करो; अभ्यास कठिन लगे तो समर्पित कर्म करो और फलासक्ति धीरज से घटाते जाओ। भाग तेरह में श्रीकृष्ण नियम कहते हैं कि शरीर कर्मों का क्षेत्र है और आत्मा उसका ज्ञाता; दोनों का भेद समझना ज्ञान तथा बंधनमुक्ति की सही दिशा है। प्रकृति के गुण शरीर और मन से कर्म कराते हैं; कर्तापन का अहंकार छोड़कर परिणामों में समता सदा ही रखो।

गुणों की पहचान और पूजा

भाग चौदह में वह अगला नियम बताते हैं कि हर मानव पर सत्त्व, रज और तम के प्रभाव होते हैं, उसे पहचानें; ये गुण कर्म और मन को बाँधते हैं, इसलिए इनसे तादात्म्य सदा छोड़ना चाहिए। गुणों से ऊपर उठने वाला सुख-दुःख और मान-अपमान में सम रहता है; वही स्थिरता मुक्ति की ओर ले जाती है। यह मेरा बनाया नियम है। भाग पंद्रह में वह ब्रह्म का नियम बताते हैं। वह फिर से कहते हैं कि संसार परिवर्तनशील वृक्ष है; उसकी आसक्ति काटो, पर जीवन के कर्तव्य छोड़कर संसार से भागना उचित नहीं, यह सदैव समझो। परमात्मा जीवों का आधार हैं; क्षर शरीर और अक्षर आत्मा से परे स्थित पुरुषोत्तम को जानना मुक्ति का मार्ग है।

भाग सोलह में वह नियम बताते हैं कि निर्भयता, सत्य, अहिंसा, दया और संयम दैवी गुण हैं; अहंकार, कठोरता और छल अंततः पतन की ओर ले जाते हैं। काम, क्रोध और लोभ आत्म विनाश के द्वार हैं; इन्हें छोड़कर शास्त्र सम्मत विवेक से मनुष्य अपना आचरण सदा ही तय करे। भाग सत्रह में वह मानव स्वभाव का नियम बताते हैं कि श्रद्धा, भोजन, यज्ञ, तप और दान गुणों से पहचाने जाते हैं; दिखावे और फल लालसा से साधना अशुद्ध होती है। पूजा की मात्रा से श्रद्धा का गुण और उद्देश्य देखें; सात्त्विक भाव मन को शुद्ध तथा जीवन संतुलित करते हैं।

कर्तव्य निभाते हुए मोक्ष 

अंत में भाग अठारह में वह मोक्ष का नियम बताते हैं। श्रीकृष्ण पहले बताया एक बार फिर से याद दिलाते हैं कि कर्म छोड़ना आवश्यक नहीं; कामना और फलासक्ति छोड़कर कर्तव्य, यज्ञ, दान और तप करते रहना चाहिए। ज्ञान, कर्ता और कर्म के गुण पहचानकर अहंकार त्यागना चाहिए; विवेक पूर्वक निर्णय लेकर अंततः परमात्मा की शरण सदा ही ग्रहण करो, तभी मोक्ष प्राप्त होता है।

संदर्भ: श्रीमद्भगवद्गीता — 18 भाग — लेखक द्वारा प्रदत्त दस्तावेज़: गीता क्या है
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