11 अक्टूबर 2026 · डॉ. राजेश तकयार
भाग 6 — आत्म संयम

श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि जो मनुष्य कर्मफल का आश्रय लिए बिना अपना कर्तव्य करता है, वही सच्चा योगी और संन्यासी है। केवल कर्म बंद कर देने से योग सिद्ध नहीं होता। इच्छाओं और संकल्पों के निरंतर दबाव से मन को मुक्त करना भी आवश्यक है। साधना के आरंभ में निष्काम कर्म मनुष्य को तैयार करते हैं। जब उसका मन कुछ स्थिर होने लगता है, तब शांति और संयम उसकी साधना को गहरा करते हैं। इस यात्रा में उसे अपने भीतर की दशा को पहचानना पड़ता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि मनुष्य को स्वयं अपने को ऊपर उठाना चाहिए। वही अपना मित्र है और वही अपना शत्रु भी बन सकता है। संयमित मन उसे सही दिशा में ले जाता है। असंयमित मन उसे इच्छाओं, भय और आवेगों के पीछे भटकाता रहता है। जिसने मन को साध लिया, उसके लिए सुख-दुःख, मान-अपमान और अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियाँ सब कुछ तय नहीं करतीं। उसके भीतर ऐसी स्थिरता आने लगती है जो परिस्थितियों के साथ हर क्षण बदलती नहीं। यह स्थिरता दूसरों को देखने की दृष्टि में भी प्रकट होती है। मित्र, विरोधी, परिचित और अपरिचित के प्रति उसके मन में विवेक बना रहता है। वह राग और द्वेष से संचालित होकर प्रत्येक व्यक्ति का मूल्य निर्धारित नहीं करता। ध्यान के लिए श्रीकृष्ण एक स्वच्छ और शांत स्थान, स्थिर आसन तथा संयमित शरीर की बात कहते हैं। शरीर, सिर और गर्दन सीधे हों। मन इधर-उधर भटकने के स्थान पर परमात्मा में लगाया जाए। साधना में भय, संग्रह की लालसा और चंचलता धीरे-धीरे कम हों। पर योग के लिए जीवन में संतुलन भी चाहिए। अत्यधिक भोजन करने वाला और बिल्कुल भोजन न करने वाला, बहुत अधिक सोने वाला और नींद को पूरी तरह रोकने वाला—दोनों ही कठिनाई में पड़ते हैं। भोजन, व्यवहार, कर्म, नींद और जागरण में संतुलन साधना को सहारा देता है। जब मन आत्मा में स्थिर होता है, तब उसकी दशा वायुरहित स्थान में रखे दीपक जैसी होती है। लौ जलती रहती है, लेकिन बार-बार डगमगाती नहीं। ऐसी अवस्था में मनुष्य भीतर की तृप्ति का अनुभव करता है। इस शांति तक पहुँचने में धैर्य आवश्यक है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि मन जहाँ-जहाँ भटके, वहाँ-वहाँ से उसे वापस लाना चाहिए। यह काम बार-बार करना पड़ता है। साधक को निराश होकर अपनी साधना छोड़ नहीं देनी चाहिए। अर्जुन यहाँ अपनी कठिनाई सामने रखते हैं। वे कहते हैं कि मन अत्यंत चंचल, बलवान और हठी है। उसे रोकना उन्हें वायु को रोकने जैसा कठिन लगता है। समता की बात समझ में आती है, लेकिन मन को उसमें स्थिर रखना सहज नहीं दिखाई देता। श्रीकृष्ण उनकी कठिनाई स्वीकार करते हैं। मन का नियंत्रण सचमुच कठिन है, लेकिन अभ्यास और वैराग्य से संभव है। अभ्यास मन को बार-बार सही दिशा में लौटाता है। वैराग्य विषयों के प्रति उस पकड़ को ढीला करता है जो मन को खींचकर ले जाती है। फिर अर्जुन पूछते हैं कि जो श्रद्धा से साधना शुरू करे, पर पूर्ण सिद्धि तक न पहुँच सके, उसका क्या होगा। क्या वह संसार और साधना दोनों से वंचित होकर बिखर जाएगा? श्रीकृष्ण उन्हें आश्वस्त करते हैं कि कल्याणकारी प्रयास कभी नष्ट नहीं होता। साधना में किया गया सच्चा प्रयत्न मनुष्य की आगे की यात्रा का आधार बनता है। पूर्व अभ्यास उसे फिर उसी दिशा में प्रेरित करता है। इसलिए अधूरी प्रगति को पूर्ण विफलता नहीं समझना चाहिए। योग की परिपक्वता केवल अपने भीतर शांत बैठने तक सीमित नहीं रहती। श्रेष्ठ योगी दूसरों के सुख-दुःख को अपने समान समझता है। वह सभी प्राणियों में आत्मा और आत्मा में सभी प्राणियों को देखता है। अंत में श्रीकृष्ण अर्जुन को योगी बनने के लिए कहते हैं। सभी योगियों में वह उन्हें अत्यंत प्रिय है जो श्रद्धा से अपना अंतःकरण उनमें लगाता है। आत्मसंयम की यात्रा मन को दबाकर कठोर बनाने की नहीं, उसे इतना निर्मल और स्थिर करने की है कि उसमें समता, करुणा और परमात्मा के प्रति प्रेम जाग सके। लेखक ने इसका विस्तार अपनी निम्न पुस्तक में 63,200 शब्दों में किया है। श्रीमद्भगवद्गीता — भाग 6 — आत्म संयम