भारतीय ज्ञान परंपरा को सरल और प्रामाणिक रूप में समझाने का एक प्रयास...

26 अक्टूबर 2026 ·

कुछ न करना भी कर्म है

कुछ न करना भी कर्म है

कभी लगता है कि काम छोड़ देने पर सारी उलझनें समाप्त हो जाएँगी। लेकिन शरीर चलता रहता है, मन सोचता रहता है और हमारे निर्णय दूसरों पर असर डालते रहते हैं। तीसरे भाग में कृष्ण इसी स्थिति को खोलते हैं। प्रश्न यह है कि हमारी सक्रियता किस दिशा में जा रही है और उसमें कितना विवेक, कितना आग्रह तथा कितना समर्पण जुड़ा है।

जीवन की स्वाभाविक गति

कर्म करना मानव की स्वाभाविक प्रवृत्ति है। मानव एक सामाजिक और जीवंत प्राणी है। उसके शरीर के मन, इन्द्रियाँ और बुद्धि हर समय कुछ न कुछ कर रहे होते हैं। चाहे वे सांस लेना हो, सोचना हो, देखना या सुनना हो, ये सब भी कर्म ही हैं। मानव के अपने तीन गुण हैं। पहला सत्त्व गुण यानी शुद्धता बनाएं रखना, ज्ञान प्राप्त करना और स्वयं को प्रकाशित करना। दूसरा रजस् गुण है, जैसे क्रियाशील रहना, इच्छाएँ रखना और अपने अन्दर ऊर्जा या शक्ति रखना। तीसरा प्रकृति का तमस् गुण है। जैसे आलस्य रखना, अज्ञानी रहना या फिर जड़ रहना। यह तीनों ही गुण मानव को कर्म करने के लिए प्रेरित करते हैं, भले ही वह इच्छा न भी करे।

‘अवश,’ का अर्थ ही है कि विवश होकर उसे कर्म करना ही पड़ता है। अर्थात् मानव यह सोचता है कि मैं कर्म नहीं करूँगा, परंतु फिर भी वह किसी-न-किसी रूप में कर्म करता ही है। यदि कोई मानव यह सोचता है कि वह संन्यास लेकर, घर त्याग कर, जंगल में बैठ कर निष्क्रिय हो गया है, तो यह उसका भ्रम है। क्योंकि मन के अंदर विचार चलते रहते हैं, इच्छाएँ उठती रहती हैं। इस प्रकार से वे भी सूक्ष्म कर्म ही हैं जो वह कर रहा है।

यहाँ पर एक बात का ध्यान रखना चाहिए कि इच्छाएँ दीमक होती हैं जो आत्मा को खा जाती हैं। इच्छाएँ मानव के जीवन में उतनी ही स्वाभाविक हैं जितना कि सांस लेना, परंतु जब ये इच्छाएँ सीमा लाँघ जाती हैं, तब वे दीमक की तरह आत्मा को धीरे-धीरे खोखला करने लगती हैं। जैसे घर के भीतर बैठा दीमक लकड़ी को अंदर ही अंदर खा जाता है और बाहर से सब कुछ ठीक दिखता है, वैसे ही इच्छाएँ भी मानव-आत्मा को भीतर से चाटती रहती हैं, जबकि ऊपर से वह सफल, खुश या संपन्न दिखाई देता है। शुरुआत में एक छोटी-सी इच्छा होती है, उसे पूरा करने की चाह उस से मेहनत करवाती है, लेकिन उसका स्वाद पाकर उसका मन तुरंत दूसरी इच्छा पैदा कर देता है। फिर तीसरी, चौथी और यह क्रम अनंत चलता है। परिणाम यह होता है कि मानव कभी संतुष्ट नहीं होता, उसे हमेशा लगता है कि अभी कुछ अधूरा है, अभी कुछ पाना बाकी है। यही असंतोष आत्मा की शांति को खा जाता है। जैसे दीमक लकड़ी को धीरे-धीरे पाउडर बना देता है, वैसे ही इच्छाएँ उस के मन को बेचैनी, डर और लालसा से भर देती हैं।

इच्छाएँ वर्तमान से काटकर हमेशा भविष्य में धकेल देती हैं, जब यह मिलेगा, तब मैं सुखी हो जाऊँगा, यही मानव सोचता रहता है। लेकिन जैसे ही वह मिल जाता है, अगली इच्छा जन्म ले लेती है और फिर वे उसी चक्र में फँस जाता है। धीरे-धीरे मानव व्यस्त हो जाता है अपनी इच्छाओं की पूर्ति में। उसे यह याद ही नहीं रहता कि उसकी आत्मा को वास्तविक पोषण क्या चाहिए, शांति, प्रेम, सच्चाई और ईश्वर से जुड़ाव या ये सब इच्छाओं की पूर्ति। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा भी है कि इच्छाएँ क्रोध और लोभ को जन्म देती हैं, और वही विनाश का कारण बनती हैं। इच्छाओं का दीमक केवल आत्मा को नहीं, रिश्तों को भी खा जाता है। क्योंकि जब मानव की आँखों में सिर्फ अपनी चाहतें होती हैं, तब वह दूसरों की भावनाएँ और अपनापन देख ही नहीं पाता। धीरे-धीरे वह खालीपन, अकेलापन और थकान महसूस करने लगता है, मानो सब कुछ पाने के बाद भी भीतर कुछ खो गया है। इससे परिवार टूटने की कगार पर पहुँच जाता है।

इच्छा और वर्तमान का संबंध

असली आत्मा का तेज़ और आनंद तभी खिलता है जब कोई अनावश्यक इच्छाओं को पहचानकर उनसे दूरी बना लें। इसका अर्थ यह नहीं कि जीवन में कोई चाह या लक्ष्य ही न रखें, बल्कि यह कि इच्छाएँ हमारी स्वामी न बनें, बल्कि हम उनके स्वामी रहें। जरूरतें पूरी होनी चाहिए, लेकिन लालसा का अंत नहीं होता, ये भी याद रखना चाहिए। जब कोई मानव यह समझ लेता है कि बाहरी वस्तुएँ केवल अस्थायी सुख दे सकती हैं, और असली संतोष भीतर के आत्मज्ञान से आता है, तब वह दीमक रूपी इच्छाओं से मुक्त होकर आत्मा की सच्ची ताकत और शांति को अनुभव करने लगता है। इच्छा और सोच में बहुत मामूली सा ही अन्तर होता है। सोच बीज है, इच्छा उस बीज से निकली हुई बेल है। सोच से पैदा हुई इच्छाओं में फँस जाने पर वही दीमक बनकर आत्मा को खाने लगती है।

सोच मन का स्वाभाविक कार्य है। यह विचारों का प्रवाह है, मानव कभी भूत से जुड़ता है, कभी भविष्य से और कभी कल्पना से जुड़ता है। सोच का काम है विकल्प बनाना, तर्क करना, समझना, योजना करना। सोच कभी सकारात्मक हो सकती है, कभी नकारात्मक। यह बिना मानव के चाहने से भी चलती रहती है, जैसे बादल आकाश में चलते रहते हैं। इच्छा सोच से जन्म लेती है, यह सोच का ही परिणाम है। इच्छा का अर्थ है, मुझे यह चाहिए। सोच का केवल बौद्धिक अस्तित्व है, जबकि इच्छा भावनात्मक आग्रह है। सोच कहेगी, यह चीज अच्छी है। इच्छा तुरंत जोड़ेगी, मुझे यह चाहिए। इसे समझना जरूरी है। सोच केवल विचार है, जबकि इच्छा आकर्षण है। सोच केवल ज्ञानेन्द्रिय द्वारा जानकारी देती है, जबकि इच्छा खींचने लगती है। और सबसे बड़ा ये है कि सोच तर्कपूर्ण होती है और इच्छा भावनात्मक होती है। इसलिए इच्छा नहीं सोच पालनी चाहिए।

कोई कहीं बैठ कर अगर सोचता है कि वह कुछ कर्म नहीं कर रहा तो ग़लत सोच रहा है। वह सांस ले रहा है जो कि उसका शारीरिक कर्म है। वह कुछ सोच भी रहा है जो कि उसका मानसिक कर्म है। उसे कुछ पुराना याद आ रहा है या फिर वह भविष्य के लिए कोई योजना बना रहा है तो यह उसका बौद्धिक कर्म है। इससे ये सिद्ध होता है कि मानव शरीर में रहता हुआ निष्क्रिय कभी भी नहीं होता। सोते हुए भी उस की सांस चलती ही रहती है जो उसका शारीरिक कर्म है।

अपने कर्म की दिशा पहचानें

इसलिए निष्क्रियता का दिखावा केवल एक मिथ्या ही है। कर्म तो मानव का स्वभावजन्य है। इस लिए प्रत्येक कर्म को करते हुए उसे ईश्वर को समर्पित करके बिना फल की इच्छा से करना ही श्रेष्ठ मार्ग है। कुछ मानव सोचते हैं कि कर्म न करने से मोक्ष मिल सकता है तो ऐसा नहीं हो सकता। कर्म प्रत्येक मानव को करना ही पड़ता है। कर्म केवल शारीरिक नहीं होते, मानसिक, वाचिक यानी वाणी द्वारा किए गए और संकल्पात्मक यानी काल्पनिक भी होते हैं।

मानव की स्वाभाविक प्रकृति ही कर्म करने वाली है। चाहे कोई कहे कि वह कुछ नहीं कर रहा, पर सोचना, देखना, साँस लेना, इच्छा करना, इन सब में कर्म ही है। ‘अकर्मकृत्’ उसका मिथ्या भ्रम है। कुछ मानव ऐसा सोचते हैं कि कर्म न करना ही मोक्ष है, जो ठीक नहीं है।

‘प्रकृतिजैः गुणैः कार्यते,’ अर्थात् उसे पता ही नहीं होता कि यह कर्म कौन करवा रहा है? परंतु प्रकृति इसमें लगी रहती है। वही मानव को कर्म के लिए प्रेरित करती रहती है। मानव अपने गुणों का दास है, इसलिए वह अवश यानी विवश होकर कर्म करता ही रहता है। अगर कोई कहे कि मैं संन्यास लेकर जंगल चला जाऊँगा और कुछ नहीं करूँगा, परंतु वहाँ पर भी उसे शरीर चलाना होगा, मन में विचार चलेंगे, भावनाएँ आएँ गी। यह सब भी कर्म ही है। इस लिए तुम समझ जाओ कि कर्म से भागना संभव नहीं है। कर्म का मार्ग ही जीवन का स्वाभाविक मार्ग है। अतः कर्म को त्यागो नहीं, योग से करो।

नदी चाहे हिमालय से निकले या किसी छोटे स्रोत से, वह बहना नहीं छोड़ सकती। जैसे नदी रुक नहीं सकती, वैसे ही मानव की प्रकृति भी उसे कर्म करने के लिए प्रेरित करती है। यदि कोई एक पत्थर पर बैठें और कहें, मैं अब कुछ नहीं करूँगा, तब भी उसके फेफड़े चलेंगे यानी श्वास कर्म होता रहेगा। उसका मन भी सोचेगा, यह उसका मानसिक कर्म है। स्मृति जागती रहेगी तो यह उसका सूक्ष्म कर्म है। और इसी प्रकार से उसके शरीर में रक्त प्रवाह होता रहेगा जो उसका स्वाभाविक जैविक कर्म होगा। इसी लिए मैं कह रहा हूँ कि कर्म करना छोड़ा ही नहीं जा सकता। कर्म से बचना नहीं, कर्म को समझ कर, विवेक से, समर्पण से, और फल की इच्छा छोड़ कर करना ही योग है।

कर्म को दिशा देने का छोटा अभ्यास

आज अपने दिन को देखें। समय किन कामों में गया और मन कहाँ भटकता रहा? किसी कार्य को व्यस्त रहने के लिए किया या उसके पीछे उपयोगी उद्देश्य था? इन प्रश्नों से दोष खोजने के बजाय दिशा स्पष्ट करें। एक जरूरी काम चुनें और उसे पूरे ध्यान से करें। काम छोटा हो सकता है, लेकिन नीयत साफ होनी चाहिए। निरंतर गति को सजग कर्म में बदलना इस व्याख्या का व्यावहारिक संकेत है। जिम्मेदारी पहचानकर उठाया गया कदम जीवन को अर्थ देता है।

संदर्भ: श्रीमद्भगवद्गीता — कर्म और फल
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