7 अक्टूबर 2026 · डॉ. राजेश तकयार

करुणा से पहचानी जाती है भक्ति

करुणा से पहचानी जाती है भक्ति

किसी से पूछिए कि भक्ति की पहचान क्या है, तो उत्तर में पूजा, जप, व्रत या मंदिर का नाम आ सकता है। ये अनेक लोगों के जीवन में श्रद्धा के महत्वपूर्ण रूप हैं। लेकिन श्रीमद्भगवद्गीता के बारहवें भाग, भक्ति योग के श्लोक 13–14 एक और कसौटी सामने रखते हैं: हमारा व्यवहार कैसा है? क्या दूसरे के लिए मन में मित्रता और करुणा है? क्या सुख-दुःख में हम अपने विवेक को बचा पाते हैं? डॉ. राजेश तकयार की इन श्लोकों की उपलब्ध व्याख्या भक्ति को केवल क्रिया नहीं, व्यक्ति के बदलते हुए स्वभाव के रूप में पढ़ती है। कृष्ण यहाँ ऐसे भक्त की बात करते हैं जो उन्हें प्रिय है; उनके कहे गुण घर, काम और संबंधों में भी परखे जा सकते हैं।

> अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। > निर्ममो निरहंकारः समदुःखसुखः क्षमी॥ १२.१३ ॥
> सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः। > मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥ १२.१४ ॥

किसी से द्वेष न रखना

पहला शब्द है ‘अद्वेष्टा’। कृष्ण किसी प्राणी के प्रति भीतर द्वेष न रखने वाले भक्त का वर्णन करते हैं। यह सुनते ही एक कठिन प्रश्न आता है: यदि किसी ने अन्याय किया हो, तो क्या उसका विरोध भी नहीं करना चाहिए? लेखक की व्याख्या स्पष्ट करती है कि द्वेष छोड़ने का अर्थ अन्याय स्वीकार करना नहीं। गलत काम के विरुद्ध खड़ा हुआ जा सकता है, आवश्यक सीमा रखी जा सकती है और दूसरे को नुकसान से बचाया जा सकता है। भीतर प्रतिशोध की आग पालना और गलत कर्म का विरोध करना अलग बातें हैं।

यह अंतर दैनिक जीवन में बहुत उपयोगी है। किसी ने विश्वास तोड़ा हो तो उसके साथ पहले जैसा व्यवहार करना आवश्यक नहीं। उसके कृत्य का हिसाब माँगना या दूरी बनाना भी उचित हो सकता है। फिर भी मन को केवल उसी व्यक्ति के प्रति घृणा के हवाले कर देने से हमारा अपना विवेक सिकुड़ सकता है। ‘अद्वेष्टा’ होने का अभ्यास पहले अपने निर्णय को साफ करता है। हम दृढ़ रह सकते हैं, पर केवल क्रोध द्वारा संचालित होने से बच सकते हैं।

इसका अर्थ भावनाएँ दबाना भी नहीं है। चोट लगने पर पीड़ा होगी, डर भी हो सकता है। श्लोक हमारी अनुभूति को झुठलाने को नहीं कहता। वह पूछता है कि पीड़ा के बाद हम किस दिशा में बढ़ेंगे। क्या सत्य, न्याय और सुरक्षा की दिशा चुनेंगे, या मन को निरंतर दूसरे के विनाश की कामना में बाँध देंगे? भक्ति की शुरुआत कभी-कभी इसी छोटे, कठिन चुनाव से होती है।

मैत्री और करुणा

द्वेष के अभाव के बाद ‘मैत्रः करुण एव च’ आता है। केवल किसी को हानि न पहुँचाना पर्याप्त नहीं; दूसरे के प्रति मित्रभाव और करुणा भी चाहिए। मैत्री का अर्थ हर अपरिचित से निकट संबंध बना लेना नहीं। इसका अर्थ है दूसरे को अपने जैसा संवेदनशील जीव मानना, उसके हित को पूरी तरह अनदेखा न करना। करुणा तब प्रकट होती है जब किसी का दुःख देखकर मन सहायता के लिए तैयार हो। यह सहायता कभी समय देने में है, कभी एक ईमानदार वाक्य में, कभी किसी को सुरक्षित स्थान तक पहुँचाने में।

लेखक इन गुणों को व्यवहार में उतारते हैं। कोई घंटों पूजा करे, पर छल, क्रोध और स्वार्थ वैसे ही रहें, तो भीतर परिवर्तन अधूरा है। यह बात बाहरी पूजा को छोटा करने के लिए नहीं, उसके फल को परखने के लिए है। यदि जप के बाद हमारी भाषा थोड़ी अधिक विनम्र हो, काम में थोड़ा अधिक ईमान आए और कमज़ोर की स्थिति के प्रति थोड़ा अधिक ध्यान जागे, तो भक्ति घर और संसार तक पहुँची है।

करुणा को दया दिखाने की ऊँची मुद्रा से भी बचाना चाहिए। सामने वाला हमारे बराबर सम्मान का अधिकारी है। उसके दुःख को सुनना और उसकी ज़रूरत पूछना, अपनी पसंद की मदद थोपने से अधिक अच्छा हो सकता है। मित्रभाव तभी सच्चा होगा जब हम दूसरे की आवाज़ के लिए जगह छोड़ेंगे।

मेरेपन की पकड़

श्लोक आगे ‘निर्ममो निरहंकारः’ कहता है। लेखक के अनुसार निर्ममता का अर्थ संबंधों में कठोर होना नहीं। इसका अर्थ ‘मेरा’ कहकर हर व्यक्ति या वस्तु पर अधिकार जमाने की पकड़ ढीली करना है। हम परिवार से प्रेम करें, उसकी जिम्मेदारी निभाएँ, पर उसके प्रत्येक निर्णय को अपनी संपत्ति जैसा न समझें। प्रेम में निकटता होती है; स्वामित्व उसे भारी कर सकता है।

अहंकार का प्रश्न भी इसी के साथ जुड़ता है। कोई अच्छे कर्म करके उन्हें अपनी श्रेष्ठता का प्रमाण मानने लगे तो दूसरों के प्रति उसका सम्मान कम हो सकता है। भक्ति का अभ्यास तब अपने गुणों को गिनने का माध्यम नहीं बनना चाहिए। हमें किसी की सहायता मिली है, किसी ने रास्ता बनाया है, और हमारी अपनी सीमाएँ भी हैं—यह याद रखना अहंकार को हल्का करता है। ऐसी विनम्रता आत्मसम्मान घटाती नहीं; वह दूसरों के लिए हमारे भीतर स्थान बनाती है।

इन गुणों को साथ पढ़ें। द्वेष छोड़ना, मैत्री रखना, करुणा करना और अधिकार की पकड़ ढीली करना—ये अलग-अलग आदेश नहीं, संबंधों को देखने की एक समग्र दृष्टि हैं। जहाँ मैं ही सबका केंद्र हूँ, वहाँ दूसरों की पीड़ा छोटी दिखाई देती है। जहाँ दूसरों को स्वतंत्र जीवन के रूप में देखा जाता है, वहाँ करुणा और न्याय दोनों संभव होते हैं।

सुख-दुःख में संतुलन

कृष्ण ‘समदुःखसुखः क्षमी’ भक्त का गुण बताते हैं। समभाव का अर्थ यह नहीं कि प्रिय समाचार पर खुशी न हो या हानि पर दुःख न हो। लेखक स्पष्ट करते हैं कि दोनों अनुभव बने रहते हैं, पर वे मन को बहा या तोड़ नहीं देते। उत्साह में हम मूल्य भूल न जाएँ और संकट में अपना पूरा भरोसा न खो दें। यह कोई एक दिन में मिलने वाली स्थिरता नहीं; बार-बार लौटने का अभ्यास है।

क्षमा को भी समझना ज़रूरी है। क्षमा कमजोरी नहीं, अपने भीतर बदले की आग को निरंतर न पालने की शक्ति है। इसका अर्थ यह नहीं कि जिसने नुकसान किया उसे तुरंत वही विश्वास दे दें। न्याय की माँग और सुरक्षित दूरी क्षमा के साथ भी रह सकती हैं। अंदर की गाँठ को धीरे-धीरे खोलना, बाहर की सीमा को मिटा देना नहीं है। इस तरह श्लोक हमें सरल नारे से बचाता है और जीवन की वास्तविक जटिलता में विवेक बनाए रखने को कहता है।

समभाव की परीक्षा अक्सर छोटी बातों में होती है। प्रशंसा मिले तो क्या हम दूसरों को तुच्छ समझने लगते हैं? आलोचना हो तो क्या पहले ही क्षण स्वयं को निरर्थक मान लेते हैं? सुख और दुःख का इतना प्रभाव स्वाभाविक है, पर यदि हर प्रतिक्रिया हमारे निर्णय की मालिक बन जाए, तो हम स्थिर दिशा नहीं रख पाएँगे। गीता का यह गुण भीतर ठहरने की थोड़ी-सी जगह बनाने का निमंत्रण है।

संतोष और निरंतर योग

दूसरे श्लोक में ‘सन्तुष्टः सततं योगी’ आता है। संतोष के बारे में लेखक एक उपयोगी अंतर बताते हैं: संतुष्ट होना प्रयास छोड़ना नहीं है। जो मिला उसका कृतज्ञता से उपयोग करना और जो नहीं मिला उससे सीखना संतोष का व्यवहारिक रूप है। इच्छा हमें काम करने के लिए प्रेरित कर सकती है; इच्छाओं का गुलाम होना हमें बेचैन कर सकता है। संतोष उस बेचैनी के बीच उपलब्ध जीवन की उपेक्षा न करने देता।

‘सततं योगी’ होने का अर्थ पूजा और सामान्य जीवन को अलग खानों में न बाँटना है। यदि ध्यान में करुणा सुंदर लगती है पर घर में कठोर भाषा बनी रहती है, तो दोनों के बीच दूरी है। यदि हम सत्य का आदर शब्दों में करें पर काम में छल को स्वीकार लें, तो स्मरण अभी व्यवहार तक नहीं पहुँचा। निरंतर योग का एक अर्थ यह है कि भीतर माने गए मूल्य निर्णय, भाषा, संबंध और जिम्मेदारी में भी उतरें।

कभी-कभी हम निरंतरता को असंभव मान बैठते हैं। मन हर समय एक जैसा शांत नहीं रह सकता। लेखक की व्याख्या स्मरण को हर क्षण शब्द दोहराना भर नहीं मानती; भीतर उसी आधार की लय बनाए रखना है। भूल जाने पर वापस लौटना, भटकने पर दिशा पहचानना और जीवन के छोटे कामों में भी आदर रखना—निरंतरता का आरंभ ऐसे हो सकता है।

संयम और दृढ़ निश्चय

‘यतात्मा दृढनिश्चयः’ में संयम और निश्चय साथ हैं। संयम प्रतिक्रिया से पहले ठहरने का अवसर देता है। किसी कड़वे वाक्य के उत्तर में तत्काल उतनी ही कटु बात कह देना सरल है। एक साँस भर रुककर विचार करना कठिन, पर अक्सर अधिक अच्छा होता है। संयम भावनाओं को नष्ट करना नहीं; उनके बीच अपने विवेक के लिए जगह बनाना है।

दृढ़ निश्चय को जिद से अलग रखना चाहिए। जिद कभी नई बात सुनने नहीं देती; निश्चय अपने मूल मूल्य को पहचानकर आवश्यक सीख स्वीकार कर सकता है। भक्त थक सकता है, दुखी या भयभीत भी हो सकता है। पर केवल कठिनाई आ जाने से वह अपनी करुणा, सत्य और समर्पण की दिशा नहीं छोड़ता। विश्वास सुविधा मिलने का सौदा नहीं, जीवन के मार्ग का आधार बनता है।

यदि कोई व्यक्ति आज कठोर प्रतिक्रिया दे बैठा है, तो उसके लिए मार्ग बंद नहीं होता। वह अपनी बात सुधार सकता है, क्षमा माँग सकता है, अगली बार ठहरने का अभ्यास कर सकता है। संयम का अर्थ कभी गलती न होना नहीं। गलती को पहचानकर सही दिशा में फिर लौटने का निश्चय भी उसका हिस्सा है।

मन और बुद्धि का समर्पण

श्लोक का अंतिम अंश कहता है कि जिसने मन और बुद्धि कृष्ण को अर्पित कर दी है, वह भक्त उन्हें प्रिय है। मन का प्रेम और बुद्धि की दिशा दोनों आवश्यक हैं। केवल भावुकता हमें किसी भी बात पर विश्वास करा सकती है; केवल तर्क संबंध को निर्जीव बना सकता है। समर्पण में हृदय का स्नेह और विचार की जिम्मेदारी मिलते हैं। हमें जो प्रिय है, उसके अनुसार हमारा आचरण भी सजना चाहिए।

इन दो श्लोकों को पढ़कर भक्ति की परीक्षा अपने बाहर नहीं, अपने भीतर देखना स्वाभाविक है। आज किसी के प्रति अनावश्यक द्वेष कम हुआ क्या? किसी की पीड़ा ध्यान से सुनी क्या? कठिन परिस्थिति में सत्य के अनुसार निर्णय लिया क्या? ये प्रश्न पूजा की जगह नहीं लेते; वे उसका जीवन से संबंध पूछते हैं। यही लेखक की व्याख्या की विशेषता है कि प्रिय भक्त के गुण किसी असाधारण उपलब्धि की सूची नहीं बनते। वे सामान्य जीवन की भाषा, निर्णय और संबंधों में दिखाई दे सकते हैं।

कुरुक्षेत्र की पृष्ठभूमि में करुणा की यह शिक्षा और भी गंभीर लगती है। अर्जुन युद्धभूमि में है; यहाँ द्वेष छोड़ना वास्तविक संघर्ष से आँख चुराना नहीं हो सकता। कृष्ण उसे उस आंतरिक स्थिति की ओर बुलाते हैं जिसमें आवश्यक कर्म करते हुए भी मन घृणा का घर न बने। इस बात को समझना आसान नहीं, पर यही श्लोकों का साहस है। वे धार्मिक पहचान से आगे बढ़कर पूछते हैं कि संघर्ष के बीच भी मनुष्यता कैसे बची रहे।

अंत में ‘स मे प्रियः’ पर ठहरें—वह मुझे प्रिय है। प्रिय होने का आधार बाहरी वैभव, प्रभावशाली भाषा या लंबी उपलब्धियों की सूची नहीं है। वह करुणा, मित्रता, संतोष, संयम और समर्पण का शांत जीवन है। ऐसा जीवन तुरंत तैयार नहीं होता। पर हर संबंध में, हर निर्णय में, एक छोटा अभ्यास संभव है। किसी से कम द्वेष, किसी के लिए अधिक सहानुभूति, और अपने भीतर थोड़ा अधिक विवेक—यहीं से भक्ति दिखाई देने लगती है।

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डॉ. राजेश तकयार

डॉ. राजेश तकयार

लेखक · स्वतंत्र शोधकर्ता

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