29 सितंबर 2026 · डॉ. राजेश तकयार

प्रेम का अर्थ

प्रेम का अर्थ

भगवान् केवल परम सत्ता नहीं, बल्कि प्रेम के सभी रूपों में अनुभव किए जा सकते हैं। मानव अक्सर भगवान् को केवल एक महान शक्ति या परम सत्ता के रूप में सोचता है। जो आकाश में कहीं दूर बैठकर इस सृष्टि को चला रहे हैं। परंतु यह भगवान् का आधा सत्य है। भगवान् केवल एक परम सत्ता नहीं, बल्कि प्रेम के सभी रूपों में उपस्थित और अनुभव किए जा सकते हैं। वे शक्ति हैं, पर उसी शक्ति का सबसे सुंदर रूप है, प्रेम। भगवान्, शक्ति नहीं, स्नेह का अनुभव हैं। भगवान् केवल न्याय करने वाले, दंड देने वाले या जगत् को नियंत्रित करने वाले नहीं हैं। वे हर उस प्रेम में हैं जो निष्काम है, निर्मल है और करुणा से भरा है। माँ का अपने बच्चे के प्रति स्नेह भगवान् का ही रूप है। मित्र का निस्वार्थ साथ भी उसी प्रेम का विस्तार है। गुरु का मार्गदर्शन, पिता की सुरक्षा, और सच्चे प्रेम का त्याग; इन सबके भीतर वही परमात्मा विद्यमान है। जब कोई कर्मयोगी किसी दूसरे के दुःख को अपना दुःख मानकर करुणा दिखाता है, तब वह भगवान् की उपस्थिति का अनुभव कर रहा होता है; क्योंकि भगवान् कहीं बाहर नहीं, वे प्रेम के हर कोमल भाव में जीवित हैं।

प्रेम, ईश्वर का सबसे सजीव स्वरूप है। ईश्वर को समझने के लिए किन्हीं शास्त्रों की आवश्यकता नहीं होती, एक प्रेममय हृदय ही पर्याप्त है। प्रेम वह भाषा है जिसे बोलने के लिए शब्दों की आवश्यकता नहीं होती, यह आत्मा की भाषा है, और आत्मा स्वयं ईश्वर है। जब कोई सच्चे मन से किसी से प्रेम करता है, बिना स्वार्थ, बिना भय, बिना किसी अपेक्षा के; तो उस क्षण वह केवल ईश्वर का अनुभव कर रहा होता है। उन्हें वास्तव में केवल प्रेम से ही जाना जा सकता है। इसलिए, ईश्वर को जानना बुद्धि का नहीं, प्रेम का विषय है। माँ का वात्सल्य, पिता का अनुशासन, मित्र का अपनापन, पति-पत्नी का स्नेह, संत का करुण भाव; इन सबके भीतर एक ही तत्त्व है; प्रेम, और वही प्रेम भगवान् का स्वरूप है। सच्चा प्रेम सीमित नहीं होता; वह जाति, धर्म, भाषा या रूप नहीं देखता। वह सबको जोड़ता है, सबको अपनाता है; और यही भगवान् की वास्तविक अभिव्यक्ति है। जब प्रेम सीमित नहीं रहता, तो वह भक्ति बन जाता है। भक्ति वह प्रेम है जो कर्मयोगी से उठकर किसी को भी सीधे ईश्वर तक पहुँचा देती है। कर्मयोगी के लिए भगवान् कोई सत्ता नहीं हैं, बल्कि उसका उनसे जीवंत संबंध हैं। वह उन्हें कभी माता-पिता, कभी मित्र, कभी प्रेमी, और कभी स्वामी के रूप में अनुभव करता है। हनुमानजी के लिए श्रीराम प्रभु और मित्र थे, और यशोदा के लिए वही कृष्ण बालक हैं। अर्जुन के लिए वह केवल उसके सखा हैं। इन सभी रूपों में भक्ति का केंद्र एक ही है; प्रेम। प्रेम ही वह सेतु है जो इन सबको ईश्वर से जोड़ता है।

भगवान् श्री गोवर्धनधारी कृष्ण का स्वयं को माता, पिता, ब्रह्म और वेद बताना केवल शब्द भर नहीं हैं। उनके पीछे यही गूढ़ रहस्यमय ज्ञान यानि राजविद्या राजगुह्ययोग का अर्थ छिपा है। उन्होंने यही समझाया है कि वह केवल परम सत्ता नहीं हैं जो कहीं दूर विराजमान हैं, वे सब मानवों के बहुत निकट रहते हैं। वह हर प्रेम, हर करुणा, हर स्नेह के रूप में विद्यमान हैं। जब कोई प्रेम करता है, सेवा करता है, क्षमा करता है, या किसी के आँसू पोंछता है, तब वह सब कुछ ईश्वर के साथ ही कर रहा होता है, यही राजविद्या राजगुह्ययोग रहस्यमय ज्ञान है। प्रेम ईश्वर की सबसे सरल अभिव्यक्ति है, और जो प्रेम करता है, वह वास्तव में भगवान् को अनुभव कर रहा होता है। सत्य यह है कि भगवान् केवल परम सत्ता नहीं, बल्कि प्रेम के सभी रूपों में अनुभव किए जा सकते हैं। क्योंकि ईश्वर शक्ति नहीं, प्रेम की धड़कन हैं, जो हर हृदय में, हर संबंध में और हर श्वास में जीवित है। ईश्वर केवल दूरस्थ ब्रह्म नहीं, बल्कि हर संबंध में जीवित प्रेम हैं। सृष्टि, धर्म और ज्ञान; तीनों में वही व्याप्त हैं। जो उन्हें सर्वस्व मानता है, उसके लिए संसार, ब्रह्म और वेद एक ही सत्य हो जाते हैं।

ईश्वर केवल पूजनीय देवता नहीं हैं, बल्कि वह तो जीवन के हर संबंध में हैं, हर शब्द में हैं, हर प्रार्थना में हैं। जब यह अनुभूति होती है, तो संसार किसी बोझ की तरह नहीं, बल्कि ईश्वर की लीला के रूप में दिखाई देने लगता है। तभी तो उन्होंने यहाँ कहा हे कि हे अर्जुन! मैं ही इस संसार का पिता, माता, पालक और पितामह हूँ। वेदों में जिसे जानना चाहिए, वही मैं हूँ। वेदों का बीज ‘ॐ’ मैं ही हूँ, और वेदों के सभी स्वरूप; ऋक्, साम, यजुः; भी मैं ही हूँ। यही राजविद्या रहस्यमय ज्ञान का दिव्य सत्य है; ईश्वर सब संबंधों, सब शब्दों और सब धर्मों का मूल है। जो यह जानता है, वह हर अनुभव में परमात्मा का साक्षात्कार करता है।

प्रेम वह कारण है जो श्रीकृष्ण से मिलाता है; प्रेम कोई किस से करता है, यह कुछ मायने नहीं रखता। भाग - 9

डॉ. राजेश तकयार

डॉ. राजेश तकयार

लेखक · स्वतंत्र शोधकर्ता

पूरी जीवनी पढ़ें →