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ब्रह्म
ज्ञेयं यत् तत् प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते। अनादिमत् परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते॥ १२ ॥ श्रीमद्भगवद्गीता के भाग तेरह के इस श्लोक में अर्जुन के संग, भगवान् श्रीकृष्ण ‘ज्ञान-अध्याय के सबसे गहरे स्तर में प्रवेश’ कर रहे हैं। अब तक उन्होंने बताया कि क्षेत्र क्या है, क्षेत्रज्ञ कौन है, और ज्ञान के गुण क्या हैं। अब वे बता रहे हैं कि ‘अंततः जानना क्या है’। यह श्लोक ज्ञान की चरम सीमा का संकेत दे रहा है। ‘ज्ञेयं यत्’ अर्थात् जो वास्तव में जानने योग्य है। संसार में बहुत कुछ जान
rajeshtakyr
Apr 27


प्राणायाम का महत्व - श्रीकृष्ण मुख से
प्राणायाम का महत्व अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे।प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः॥ २९ ॥ यह श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय...
rajeshtakyr
Aug 10, 2025


आत्मा करता है या करती है?
आत्मा करता है न कि करती है ब हुत से मानव कहते हैं कि आत्मा करता है कहना सही नहीं है, करती है कहना सही है। जोकि उचित नहीं है। वेदों,...
rajeshtakyr
Aug 1, 2025


मैं कौन हूँ
मैं एक लेखक हूँ मु झे आध्यात्मिकता पर लिखना बहुत अच्छा लगता है। ऐसा नहीं है कि मैं कोई इस का विश्लेषक हूँ, बल्कि ये इस लिए है कि जब भी आप...
rajeshtakyr
Jun 8, 2025


महाभारत क्यों पढें
आ म मानस के मन में एक बहुत बड़ी दुविधा रहती है कि महाभारत पढ़नी नहीं चाहिए या घर पर नहीं रखनी चाहिए। महाभारत के पहले अध्याय में एक श्लोक...
rajeshtakyr
Jun 8, 2025
इन सभी ब्लॉगस में वही जानकारी लिखी गई है जिसे अपनी आँखों से शास्त्रों, पुराणों या धर्मग्रंथों में पढ़ा है, कोई भी जानकारी सुनी-सुनाई हुई शामिल नहीं की है।
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