11 अक्टूबर 2026 · डॉ. राजेश तकयार
भाग 16 — स्वयं को पहचानो

श्रीकृष्ण अर्जुन को मनुष्य के भीतर की दो प्रकार की प्रवृत्तियाँ समझाते हैं—दैवी और आसुरी। इनकी पहचान उसके व्यवहार, संकल्प और जीवन की दिशा से होती है। मनुष्य क्या चाहता है और उसे पाने के लिए कैसे कर्म करता है, इससे उसका स्वभाव प्रकट होता है। दैवी संपदा में निर्भयता, अंतःकरण की शुद्धता, ज्ञान में निष्ठा, दान, इन्द्रिय संयम, स्वाध्याय, तप और सरलता आते हैं। ये गुण मनुष्य को अपने भीतर व्यवस्थित होने और दूसरों के साथ मर्यादा पूर्वक जीने का आधार देते हैं। अहिंसा, सत्य, क्रोध का संयम, त्याग और शांति भी इसी संपदा के अंग हैं। दूसरों की चुगली न करना, प्राणियों के प्रति दया रखना और लोभ से बचना उसके आचरण को निर्मल बनाते हैं। धैर्य, क्षमा, शुद्धता और अभिमान का अभाव उसकी शक्ति को स्थिर करते हैं। ऐसी शक्ति में तेज होता है, लेकिन वह दूसरों को तुच्छ समझने पर निर्भर नहीं होती। इसके विपरीत दिखावा, घमंड, अभिमान, क्रोध, कठोरता और अज्ञान आसुरी प्रवृत्ति के लक्षण हैं। इनके प्रभाव में मनुष्य अपनी इच्छाओं को ही सर्वोच्च मानने लगता है। उसके लिए दूसरों की पीड़ा और आचरण की मर्यादा का महत्व कम हो जाता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि दैवी संपदा मुक्ति की ओर ले जाती है और आसुरी संपदा बंधन बढ़ाती है। वे अर्जुन को आश्वस्त करते हैं कि उन्हें भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वे दैवी संपदा से युक्त हैं। फिर वे आसुरी दृष्टि का विस्तार बताते हैं। ऐसी दृष्टि में मनुष्य यह नहीं समझता कि क्या करना चाहिए और किससे बचना चाहिए। सत्य और सदाचार के स्थान पर अपनी इच्छा पूरी करना उसका प्रमुख निर्णय बन जाता है। जब भोग को ही जीवन का अंतिम लक्ष्य मान लिया जाता है, तब कामनाओं की सीमा नहीं रहती। मनुष्य सोचता है कि एक उपलब्धि और मिल जाए तो वह संतुष्ट हो जाएगा। लेकिन हर प्राप्ति अगली माँग के लिए स्थान बना देती है। इस प्रकार असंख्य आशाएँ बंधन बन जाती हैं। उनके साथ चिंता और क्रोध बढ़ते हैं। इच्छा पूरी होने में बाधा आए तो मनुष्य दूसरों को विरोधी मानने लगता है। धन और प्रभाव पाने के लिए अन्यायपूर्ण उपाय भी उसे उचित दिखाई देने लगते हैं। श्रीकृष्ण उस मनःस्थिति का वर्णन करते हैं जिसमें मनुष्य लगातार सोचता है कि उसने कितना पा लिया और आगे कितना प्राप्त करेगा। वह अपने को शक्तिशाली, सफल और दूसरों से श्रेष्ठ घोषित करता रहता है। इस घमंड के भीतर भी उसकी बेचैनी समाप्त नहीं होती। यह प्रवृत्ति धार्मिक कर्मों में भी प्रवेश कर सकती है। दान और यज्ञ केवल प्रतिष्ठा दिखाने के साधन बन सकते हैं। बाहरी कर्म बना रहता है, लेकिन उसके भीतर विनम्रता और शुद्ध संकल्प कम हो जाते हैं। अहंकार, कामना और क्रोध के कारण मनुष्य अपने तथा दूसरों के भीतर स्थित परमात्मा की उपेक्षा करता है। उसका व्यवहार अधिक कठोर हो जाता है और वही उसे आगे दुःख तथा पतन की ओर ले जाता है। श्रीकृष्ण इस पूरे विवेचन को तीन द्वारों में समेटते हैं—काम, क्रोध और लोभ। ये मनुष्य के आत्म कल्याण को नष्ट करते हैं। अतृप्त इच्छा उसे दौड़ाती है, क्रोध उसके विवेक को क्षीण करता है और लोभ उसे मर्यादा से दूर ले जाता है। इनसे मुक्त होने पर वह अपने कल्याण का आचरण कर सकता है। इसके लिए उसे हर इच्छा को उचित मान लेने की आदत छोड़नी होगी। क्या करना है और क्या नहीं, इसका निर्णय विवेक और शास्त्रीय मर्यादा के आधार पर करना चाहिए। स्वयं को पहचानने का अर्थ अपने भीतर काम कर रही दिशा को पहचानना है। हमारे कर्म करुणा, सत्य और संयम को बढ़ा रहे हैं या घमंड, कठोरता और लालसा को—इस प्रश्न के प्रति सजग होना ही परिवर्तन का आरंभ है। दैवी गुणों को जीवन में स्थान देने से मनुष्य अपने कल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ता है। लेखक ने इसका विस्तार अपनी निम्न पुस्तक में 62,244 शब्दों में किया है। श्रीमद्भगवद्गीता — भाग 16 — स्वयं को पहचानो