ब्रह्म

ज्ञेयं यत् तत् प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते। अनादिमत् परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते॥ १२ ॥
श्रीमद्भगवद्गीता के भाग तेरह के इस श्लोक में अर्जुन के संग, भगवान् श्रीकृष्ण ‘ज्ञान-अध्याय के सबसे गहरे स्तर में प्रवेश’ कर रहे हैं। अब तक उन्होंने बताया कि क्षेत्र क्या है, क्षेत्रज्ञ कौन है, और ज्ञान के गुण क्या हैं। अब वे बता रहे हैं कि ‘अंततः जानना क्या है’। यह श्लोक ज्ञान की चरम सीमा का संकेत दे रहा है।
‘ज्ञेयं यत्’ अर्थात् जो वास्तव में जानने योग्य है। संसार में बहुत कुछ जानने योग्य प्रतीत होता है जैसे वस्तुएँ, संबंध, विज्ञान, विचार। पर भगवान् मधुसूदन स्पष्ट कर रहे हैं कि इन सबके पार एक ऐसा तत्त्व है, जिसे जान लेने पर फिर कुछ जानना शेष नहीं रहता। वही तत्त्व मानव को ‘अमृत’ प्रदान करता है अर्थात् मृत्यु-बंधन से मुक्त करता है।
संसार ज्ञान के अनंत विषयों से भरा हुआ है। भक्त जन्म से लेकर मृत्यु तक कुछ-न-कुछ जानने में लगा रहता है। वह भाषा सीखता है, संबंधों को समझता है, विज्ञान का अध्ययन करता है, समाज, इतिहास, कला, राजनीति, प्रकृति और स्वयं जीवन के अनेक रूपों का अनुभव करता है। फिर भी जितना वह जानता है, उतना ही उसे यह भी अनुभव होता है कि जानने योग्य वस्तुएँ समाप्त नहीं होतीं। एक प्रश्न का उत्तर मिलता है, तो दूसरा खड़ा हो जाता है। एक रहस्य खुलता है, तो उसके पीछे अनेक और रहस्य दिखाई देने लगते हैं। इस प्रकार बाहरी ज्ञान का क्षेत्र अनंत विस्तार वाला है। परंतु सत्य यह है कि इस अनंत विविधता के पार एक ऐसा मूल तत्त्व है, जिसे जान लेने पर सबका आधार ज्ञात हो जाता है।
यह तत्त्व कोई साधारण वस्तु नहीं, जिसे इंद्रियों से पकड़ा जा सके। यह न केवल जगत का कारण है, बल्कि वही उस चेतना का भी आधार है जिसके द्वारा भक्त सब कुछ जानता है। यही कारण है कि इसे जानना बाकी सभी जानकारियों से भिन्न है। संसार की अन्य वस्तुओं का ज्ञान विषय-ज्ञान है; वहाँ जानने वाला अलग है और ज्ञात वस्तु अलग। पर इस परम तत्त्व का ज्ञान ऐसा है जिसमें जानने वाला स्वयं अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानता है। वहाँ खोज बाहर से भीतर की ओर मुड़ती है।
जब तक भक्त केवल परिवर्तनशील वस्तुओं को जानता है, तब तक उसका ज्ञान भी परिवर्तनशीलता की सीमा में रहता है। वह शरीर को जानता है, पर शरीर बदलता है; वह मन को जानता है, पर मन चंचल है; वह संसार को जानता है, पर संसार क्षणभंगुर है; इसलिए इन सबका ज्ञान उपयोगी तो है, पर अंतिम नहीं। अंतिम ज्ञान वह है जो परिवर्तन के बीच अपरिवर्तनशील को पहचान ले; जो जन्म और मृत्यु के बीच उस तत्त्व को देख ले जो न जन्म लेता है, न मरता है; जो अनुभवों के उठने-बैठने के बीच उस साक्षी को पहचान ले जो सबको देखता है पर स्वयं नहीं बदलता।
मैंने तुमसे अर्जुन अभी कहा कि उस तत्त्व को जान लेने पर फिर कुछ जानना शेष नहीं रहता। मैं यह नहीं कह रहा कि इसे जानकर संसार की सारी सूचनाएँ अचानक मिल जाती हैं, बल्कि अर्थ यह है कि मूल सत्य का बोध हो जाता है। जैसे जड़ को जान लेने पर वृक्ष की शाखाएँ, पत्ते, फूल और फल एक व्यापक एकता में समझ आने लगते हैं, वैसे ही परम तत्त्व को जान लेने पर जीवन की विविधता अपने सही स्थान पर दिखाई देने लगती है। तब ज्ञान बोझ नहीं रहता; वह दृष्टि बन जाता है। तब भक्त वस्तुओं में उलझता नहीं, उनके आधार को पहचानता है।
यही तत्त्व भक्त को ‘अमृत’ प्रदान करता है। अमृत का अर्थ केवल शरीर का मृत्यु से बच जाना नहीं है। शरीर तो प्रकृति का अंग है और उसका नाश निश्चित है। अमृतत्व का वास्तविक अर्थ है; उस आत्म-सत्ता का बोध, जो मृत्यु का विषय ही नहीं है। मृत्यु केवल उस पर लागू होती है जो उत्पन्न हुआ है। जो जन्मा है, वही मरेगा। पर जो शुद्ध चैतन्य है, जो साक्षी है, जो सब परिवर्तनों के बीच अचल है, वह मृत्यु के अधीन नहीं। उसे जान लेना ही मृत्यु-बंधन से मुक्त होना है।
मृत्यु-बंधन केवल शरीर छोड़ने की घटना नहीं, बल्कि हर क्षण भय, मोह, असुरक्षा और नश्वरता से बँधे रहने की अवस्था है। जो स्वयं को केवल शरीर मानता है, वह हर परिवर्तन से डरता है। जो अपने को पद, संबंध, धन या नाम में देखता है, वह उनके हिलते ही भीतर से टूट जाता है। पर जिसने उस परम तत्त्व का स्पर्श पा लिया, उसके भीतर एक नई स्थिरता जन्म लेती है। वह जानता है कि बदलने वाली चीजें बदलेंगी, पर मेरा वास्तविक स्वरूप उनसे परे है; यही बोध अमृत है।
अतः संसार का समस्त ज्ञान अपने स्थान पर महत्वपूर्ण है, पर उसका अंतिम मूल्य तभी है जब वह भक्त को इस मूल तत्त्व की खोज तक ले जाए। वही ज्ञान की पराकाष्ठा है, वही आत्मा की मुक्ति है, वही शांति का सर्वोच्च आधार है। जिसे यह ज्ञात हो गया, उसने केवल कुछ तथ्य नहीं जाने; उसने जीवन के केंद्र को पा लिया। वहीं से मृत्यु का भय गलता है, अहंकार ढहता है, और भक्त पहली बार सच में स्वतंत्र होता है।
‘अमृत’ का अर्थ केवल शरीर की अमरता नहीं है। इसका अर्थ है, ‘जन्म-मृत्यु के भय से मुक्ति’, अस्थायी पहचान से मुक्ति और स्थायी शांति की प्राप्ति। जब भक्त इस तत्त्व को जान लेता है, तब वह स्वयं को शरीर और मन की सीमाओं से परे अनुभव करने लगता है।
‘अमृत’ शब्द को सामान्यतः भक्त शरीर की अमरता के अर्थ में समझ लेते हैं, मानो आध्यात्मिक जीवन का लक्ष्य यह है कि भक्त कभी मरे ही नहीं। पर सत्य की दृष्टि से यह समझ बहुत सीमित है। शरीर प्रकृति का बना हुआ है, और जो प्रकृति से बना है, वह परिवर्तन और विनाश के नियम से बँधा हुआ है। जन्म लेने वाला शरीर बढ़ेगा, बदलेगा, रोग से गुजरेगा, वृद्ध होगा और अंततः नष्ट होगा। इसलिए यदि अमृत का अर्थ केवल शरीर की अमरता मान लिया जाए, तो वह सत्य के मूल आशय को ही छोटा कर देगा। शास्त्र जब अमृत की बात करते हैं, तब उनका संकेत उस चेतना की ओर होता है जो शरीर के साथ बदलती नहीं, मन के साथ डगमगाती नहीं, और मृत्यु के स्पर्श से नष्ट नहीं होती।
यही कारण है कि ‘अमृत’ का वास्तविक अर्थ जन्म और मृत्यु के भय से मुक्ति कहा गया है क्योंकि यह चेतना, यह आत्मा, ये क्षेत्रज्ञ नहीं मरता। भक्त का सबसे गहरा भय मृत्यु का भय है, पर यह भय केवल शरीर के समाप्त होने का डर नहीं है। यह उससे भी अधिक सूक्ष्म है। भक्त हर उस चीज़ के खोने से डरता है, जिससे उसने अपनी पहचान बना रखी है। उसे अपने शरीर के बिगड़ने का डर है, अपने संबंधों के टूटने का डर है, अपने पद के छिन जाने का डर है, अपने सम्मान के घटने का डर है, अपने विचारों के अस्वीकार हो जाने का डर है। इन सब भय का मूल कारण यह है कि उसने अपने वास्तविक स्वरूप को नहीं जाना। उसने अस्थायी को ‘मैं’ मान लिया हुआ है, और फिर उस अस्थायी के हिलते ही उसका सारा अस्तित्व हिलने लगता है।
भक्त अमृत को प्राप्त करता है, तो इसका अर्थ है कि वह इस मूल भूल से जागने लगा है। वह देखता है कि शरीर मेरा उपकरण है, पर मैं केवल शरीर नहीं हूँ। मन मेरे अनुभवों का क्षेत्र है, पर मैं केवल मन नहीं हूँ। विचार आते-जाते हैं, पर मैं विचार नहीं हूँ। भावनाएँ उठती-गिरती हैं, पर मैं भावनाएँ भी नहीं हूँ। मेरा वास्तविक स्वरूप उस साक्षी के रूप में है जो इन सबको देखता है। यह साक्षी स्वयं परिवर्तन का विषय नहीं, बल्कि परिवर्तन का दर्शक है। यही आत्म-तत्त्व है, और इसी की पहचान अमृत का आरंभ है।
अस्थायी पहचान से मुक्ति का अर्थ भी यही है। भक्त अनेक परतों में अपने को परिभाषित करता है; मैं यह शरीर हूँ, मैं इस परिवार का सदस्य हूँ, मैं इस समाज में इस पद पर हूँ, मैं इतना सफ़ल हूँ, मैं इतना असफल हूँ, मैं प्रिय हूँ, मैं उपेक्षित हूँ, मैं ज्ञानी हूँ, मैं अज्ञानी हूँ। ये सब पहचानें, ये परतें, व्यवहार-जगत में उपयोगी हो सकती हैं, पर यदि भक्त इन्हीं को अपना अंतिम स्वरूप मान ले, तो वह निरंतर बँधा रहेगा। क्योंकि ये सभी पहचानें परिस्थितियों पर निर्भर हैं। शरीर बदलेगा, पद बदलेगा, संबंध बदलेंगे, समाज की दृष्टि बदलेगी, सफलता-असफलता बदले गी। यदि ‘मैं’ इन पर टिका है, तो मैं हर क्षण संकट में है। इसीलिए अस्थायी पहचान पर आधारित जीवन अनिवार्य रूप से भय, असुरक्षा और अशांति से भरा ही रहेगा।
भक्त जब तत्त्वज्ञान के प्रकाश में देखना शुरू करता है, तब वह इन पहचानो को नकारता नहीं, पर उनके पार देखना सीखता है। वह जानता है कि मैं पिता, पुत्र, मित्र, भक्त, कर्मयोगी, गृहस्थ; जो कुछ भी हूँ, वह व्यवहार के स्तर पर सत्य है; पर मेरा अंतिम स्वरूप इन सब सीमाओं से बड़ा है। मैं वह चेतना हूँ जो इन सभी भूमिकाओं को निभाती है, पर किसी एक भूमिका में कैद नहीं होती। यही समझ भक्त के भीतर बड़ी शांति लाती है। अब संबंध रहते हैं, पर स्वामित्व कम हो जाता है; कर्म होते हैं, पर अहंकार घट जाता है; सफलता आती है, पर मद नहीं चढ़ता; असफलता आती है, पर आत्मा टूटता नहीं; यही अमृत की दिशा है।
स्थायी शांति की प्राप्ति भी इसी बोध से जुड़ी हुई है। सामान्यतः भक्त शांति को बाहरी अनुकूलता में खोजता है। वह सोचता है कि यदि सब दूसरे मेरे अनुसार हों, यदि परिस्थितियाँ मेरे मन की हों, यदि स्वास्थ्य ठीक रहे, धन सुरक्षित रहे, संबंध मधुर रहें, और भविष्य नियंत्रण में रहे, तो मैं शांत रहूँगा। यह ‘यदि’ ही उसका आधार बना रहता है; पर ऐसा कभी स्थायी रूप से संभव नहीं होता। संसार परिवर्तनशील है, इसलिए बाहरी आधारों पर खड़ी शांति भी परिवर्तनशील ही होगी। यही कारण है कि बाहरी सुविधा बढ़ने पर भी भक्त भीतर से बेचैन रहता है। उसे सब कुछ मिल जाए, फिर भी कोई डर, कोई रिक्तता, कोई असुरक्षा बनी ही रहेगी।
स्थायी शांति तब आती है जब भक्त अपने आधार को बदलता है। वह बाहर से भीतर आता है। वह अनुभव करता है कि शांति परिस्थितियों की देन नहीं, आत्मा के निकट होने की अवस्था है। जब ‘मैं’ अपने को शरीर-मन की चंचलता से अलग साक्षी रूप में पहचानने लगता है, तब शांति धीरे-धीरे उसके भीतर से फूटने लगती है। यह शांति उत्तेजना नहीं है, भावशून्यता भी नहीं है; यह एक गहरी स्थिरता है। इसमें जीवन चलता रहता है, कर्म चलता रहता है, संबंध चलते रहते हैं, आनंद भी आता है और दुःख भी आता है, पर भीतर एक केंद्र बना रहता है जो टूटता नहीं; यही आध्यात्मिक शांति है।
इसलिए जब मैं कह रहा हूँ कि भक्त स्वयं को शरीर और मन की सीमाओं से परे अनुभव करने लगता है, तो इसका अर्थ कोई कल्पना या केवल दार्शनिक विचार नहीं है। यह एक जीवित अनुभूति है। पहले वह हर भाव को अपना स्वरूप मानता था; क्रोध आया तो ‘मैं क्रोधित हूँ’; दुःख आया तो ‘मैं दुःखी हूँ’; भय आया तो ‘मैं भयभीत हूँ।’ पर अब वह देखने लगता है कि क्रोध मन में उठा है, मैं उसका साक्षी हूँ; दुःख मन पर छाया है, मैं उसका साक्षी हूँ; भय शरीर और मन में चल रहा है, मैं उसका साक्षी हूँ। इसी सूक्ष्म अंतर में उसकी मुक्ति छिपी है। जब तक अनुभव और अनुभव करने वाला एक ही समझे जाते हैं, तब तक बंधन है। जब साक्षी जागता है, तब स्वतंत्रता आरंभ होती है।
यही स्वतंत्रता मृत्यु-बंधन से मुक्ति का आधार है। जो स्वयं को केवल ‘शरीर’ यानि क्षेत्र मानता है, उसके लिए मृत्यु सब कुछ समाप्त हो जाने का नाम है; जो स्वयं को मन, संबंध और व्यक्तित्व का जोड़ मानता है, उसके लिए मृत्यु भयावह है, क्योंकि उससे उसकी सारी जानी-पहचानी दुनिया छिनती हुई लगती है। पर जिसने ‘आत्मा’ यानि ‘क्षेत्रज्ञ’ का स्पर्श पा लिया, वह समझने लगता है कि मृत्यु परिवर्तन है, अंत नहीं। जैसे वस्त्र बदलते हैं, वैसे ही देह भी बदलती है। यहाँ यह बात केवल शाब्दिक सांत्वना नहीं रह जाती, बल्कि चेतना की प्रत्यक्ष समझ बनने लगती है। तब मृत्यु का भय पूरी तरह तुरंत मिट जाए, यह आवश्यक नहीं; पर उसकी जड़ अवश्य कमज़ोर होने लगती है। भक्त पहली बार समझता है कि उसका सत्य उसके नश्वर रूप से बड़ा है।
यहाँ भक्ति का महत्व और बढ़ जाता है। केवल बौद्धिक विचार से यह अनुभव स्थिर नहीं होता। बुद्धि समझ लेती है, पर पुरानी आदतें फिर भी भक्त को देहाभिमान में गिरा देती हैं। इसलिए भक्त केवल विचार नहीं करता; वह समर्पण करता है। वह ईश्वर को अपना अंतिम आधार मानता है। यही समर्पण उसके लिए पुल बनता है। जब वह हर परिस्थिति में याद करता है कि मेरा सत्य ईश्वर में स्थित है, तब उसकी आत्म-स्मृति सुदृढ़ होती है। भक्ति ज्ञान को कोमलता देती है, और ज्ञान भक्ति को स्थिरता देता है; दोनों मिलकर भक्त को अमृत के अनुभव की ओर ले जाते हैं।
अतः ‘अमृत’ का अर्थ किसी चमत्कारिक शरीर-अमरता में नहीं, बल्कि गहरी आध्यात्मिक जागृति में है। यह वह अवस्था है जहाँ भक्त मृत्यु के भय से मुक्त होने लगता है, अस्थायी पहचान की जकड़न ढीली पड़ने लगती है, और भीतर स्थायी शांति का जन्म होता है। तब जीवन पहले जैसा दिखता हुआ भी पहले जैसा नहीं रहता। वही संसार है, वही लोग हैं, वही सुख-दुःख हैं, पर देखने वाला बदल गया है। अब वह शरीर में रहते हुए भी शरीर तक सीमित नहीं है, मन का उपयोग करते हुए भी मन में खोया नहीं है, संबंध निभाते हुए भी उनमें बँधा नहीं है। यही अमृत का अर्थ है; सीमित से असीम की ओर जागना, भय से शांति की ओर बढ़ना, और नश्वरता के बीच अविनाशी आत्मा अर्थात् क्षेत्रज्ञ को पहचान लेना।
भगवान् त्रिविक्रम गोपीनाथ उस तत्त्व का नाम लेते हैं और कहते हैं; ‘परं ब्रह्म’। यह ब्रह्म किसी शरीर, वस्तु या रूप में सीमित नहीं है। वह अनादि है अर्थात् उसका कोई आरंभ नहीं है। जो आरंभ हीन है, वह नष्ट भी नहीं हो सकता। जिसे वाणी व्यक्त नहीं कर सकती, पर जिसकी शक्ति से वाणी बोलती है। इसलिए वह शाश्वत है। इसके बाद भगवान् एक अत्यंत सूक्ष्म बात कहते हैं:
‘न सत्तन्नासदुच्यते’ अर्थात् इस ब्रह्म को न ‘सत्’ कहा जा सकता है और न ही ‘असत्’। अर्थात् तुम इस का गहरा अर्थ समझो। ‘सत्’ वह होता है जो अनुभव में स्पष्ट रूप से उपस्थित हो जैसे शरीर, वस्तु, विचार। ‘असत्’ वह होता है जो बिल्कुल नहीं है। पर ब्रह्म इन दोनों से परे है। वह है भी और नहीं भी; पर भक्त की सामान्य समझ के अनुसार नहीं। यह वह समझ है, जो भक्त के सामान्य ज्ञान को तोड़ती है। जैसा मैंने पहले कहा कि भक्त संसार की हर वस्तु को प्रायः दो श्रेणियों में बाँटकर समझता है या तो वह ‘है’, या ‘नहीं है’। जो सामने दिखाई दे, जिसे इंद्रियाँ ग्रहण कर लें, जिसे मन विचार में पकड़ ले, उसे वह ‘सत्’ कहने लगता है। और जो बिल्कुल न हो, जिसका कोई अस्तित्व ही न हो, उसे ‘असत्’ कह देता है। पर ‘ब्रह्म’ के संदर्भ में यही सामान्य विभाजन अपर्याप्त हो जाता है। ब्रह्म न सत् है, न असत् है। इसका अर्थ यह नहीं है कि ब्रह्म कोई विरोधाभास है, या उसका अस्तित्व संदिग्ध है; बल्कि इसका अर्थ यह है कि ब्रह्म ऐसा तत्त्व है जिसे साधारण अनुभव की श्रेणियों में बाँधकर नहीं समझा जा सकता।
पहले ‘सत्’ को समझना आवश्यक है। सामान्य दृष्टि में ‘सत्’ वह है जो अनुभव में उपस्थित हो, जैसे यह शरीर, यह पृथ्वी, यह आकाश, यह विचार, यह सुख, यह दुःख, यह संसार। भक्त अक्सर कहता है कि ‘यह’ सब है, क्योंकि ‘यह’ उसके अनुभव में आता है। पर सत्य की दृष्टि से देखो तो यह सब निरंतर बदल रहा है। शरीर हर क्षण बदल रहा है, मन हर क्षण बदल रहा है, विचार आते-जाते हैं, संबंध बनते-बिगड़ते हैं, परिस्थितियाँ उठती-बैठती हैं। जो आज है, कल वैसा नहीं रहेगा। इस अर्थ में संसार का ‘यह’ या ‘सत्’ स्थिर नहीं, परिवर्तनशील है। यह व्यवहारिक स्तर पर सत्य है, पर अंतिम सत्य नहीं।
अर्जुन अब तुम ‘असत्’ को समझो। असत् वह है जिसका कोई अस्तित्व ही न हो; जैसे आकाश-कुसुम, खरगोश का सींग, केवल कल्पना की वस्तु। वह न अनुभव में आती है, न किसी स्तर पर उसका अस्तित्व सिद्ध होता है। इसलिए उसे असत् कहा जाता है। पर ‘ब्रह्म’ को असत् भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि ‘ब्रह्म’ कोई शून्य कल्पना नहीं है। वह अस्तित्व का मूल आधार है। वही सबको धारण करता है, वही सबके पीछे छिपा हुआ सत्य है। यदि ‘ब्रह्म’ न हो, तो न अनुभव संभव हो, न अनुभव करने वाला संभव है, न जगत संभव है। इसलिए ‘ब्रह्म’ को ‘नहीं है’ कहना भी असंभव है।
यहीं से गहराई आरंभ होती है। ब्रह्म को ‘सत्’ इस अर्थ में नहीं कह सकते कि वह किसी वस्तु की तरह सामने उपस्थित नहीं है; वह शरीर की तरह दृश्य नहीं है, विचार की तरह पकड़ा जाने वाला नहीं है, भावना की तरह बदलने वाला नहीं है; वह इंद्रियों का विषय भी नहीं है; वह मन की अवधारणा में पूरी तरह समा नहीं सकता; इसलिए यदि कोई कहे कि ‘ब्रह्म’ भी इसी संसार की वस्तुओं की तरह ‘है’, तो यह अधूरी समझ होगी। और यदि कोई कहे कि जो इस प्रकार पकड़ा नहीं जा सकता, वह ‘नहीं है’, तो यह भी भूल होगी। ‘ब्रह्म’ न तो वस्तु-जगत के ‘होने’ जैसा है, और न ही शून्य के ‘न होने’ जैसा है।
इसलिए मैंने कहा कि वह है भी और नहीं भी; पर भक्त की सामान्य समझ के अनुसार नहीं है। ‘है’ इसलिए कि यह वही आधार है, वही चेतना है, वही सत्य है, वही परम सत्ता है। ‘नहीं’ इसलिए कि उसे वस्तुओं की तरह सीमित रूप में नहीं दिखाया जा सकता; वह किसी एक आकार में बँधा हुआ नहीं है; वह किसी एक जगह पर स्थित नहीं है; वह किसी एक गुण से परिभाषित नहीं है; यदि कोई उसे किसी रूप, किसी नाम, किसी विचार, किसी धारणा में पूरी तरह बाँध दें, तो ‘ब्रह्म’ छोटा दिखेगा। ब्रह्म की महानता इसी में है कि वह सब रूपों में प्रकट होकर भी किसी एक रूप तक सीमित नहीं है।
सागर और तरंग को देखो; तरंग है; उसे देखा जा सकता है, गिना जा सकता है, उसका आकार बताया जा सकता है। पर तरंग का सत्य क्या है ? जल। अब जल तरंग में है, पर केवल तरंग नहीं है। तरंग उठेगी, गिरेगी, टूटेगी, मिट जाएगी; पर जल बना रहेगा। यदि कोई केवल तरंग को देखकर कहे कि यही अंतिम सत्य है, तो वह अधूरा देख रहा है। और यदि कोई कहे कि तरंग के पीछे जो जल है, वह क्योंकि तरंग की तरह अलग नहीं दिखता, इसलिए वह नहीं है; तो वह भी ग़लत है। ठीक इसी प्रकार यह जगत तरंगों की तरह है, और ‘ब्रह्म’ उस आधार की तरह है जो सबमें है, पर किसी एक रूप में समाप्त नहीं हो जाता।
‘ब्रह्म’ को न सत् कहना और न असत् कहना, वास्तव में भाषा की सीमा का बोध कराता है। भाषा द्वैत में चलती है; यह या वह, है या नहीं है, एक या अनेक। पर ‘ब्रह्म’ अद्वैत है। वहाँ यह विभाजन टिकता नहीं। इसलिए उपनिषद् बार-बार संकेत की भाषा अपनाते हैं। वे कहते हैं; ‘नेति-नेति’, यह नहीं, वह नहीं। इसका उद्देश्य ब्रह्म को नकारना नहीं, बल्कि यह दिखाना है कि जो कुछ तुम सीमित रूप में समझ रहे हो, ‘ब्रह्म’ उससे बड़ा है। वह किसी परिभाषा में कैद नहीं हो सकता।
भक्त के लिए इसका विशेष अर्थ है। सामान्य भक्त ईश्वर को कभी-कभी केवल मूर्ति, रूप, कथा या भाव में पकड़ना चाहता है। यह आरंभ के लिए ठीक है, क्योंकि मन को सहारा चाहिए। पर यदि वह यहीं रुक जाए, तो ‘ब्रह्म’ की अनंतता से वंचित रह जाएगा। उसे धीरे-धीरे समझना होगा कि ईश्वर रूप में भी हैं और अरूप में भी; निकट भी हैं और परे भी; अनुभव में भी हैं और अनुभव से परे भी। वे केवल मंदिर में नहीं, केवल विचार में नहीं, केवल भावना में नहीं; वे सबके आधार में हैं। यह समझ भक्ति को संकीर्णता से मुक्त करती है।
सत्य रूप से, ब्रह्म वह तत्त्व है जो सभी अनुभवों को संभव बनाता है, पर स्वयं किसी अनुभव-विशेष तक सीमित नहीं रहता। वह अस्तित्व का आधार है, पर वस्तु नहीं। वह चेतना का प्रकाश है, पर विचार नहीं। वह सबमें व्याप्त है, पर किसी सीमा से बँधा नहीं। इसीलिए उसे न सत् कहा जा सकता है, और न असत्। वह दोनों का आधार है, दोनों से परे है, दोनों को अर्थ देने वाला है।
जब भक्त इस बात को समझने लगता है, तब उसकी दृष्टि बदलती है। वह जगत को मिथ्या कहकर तिरस्कार नहीं करता, न जगत को अंतिम सत्य मानकर उसमें खो जाता है। वह जानता है कि जो दिख रहा है, वह है; पर अपने आधार पर नहीं; और जो नहीं दिख रहा, वही सबका आधार है। यही गहरी दृष्टि है। यही ब्रह्म-विचार का प्रवेश-द्वार है। और यही वह बिंदु है जहाँ सामान्य बुद्धि मौन होने लगती है, और अंतःकरण पहली बार उस अनिर्वचनीय सत्य की आहट सुनने लगता है।
इसीलिए मैं कह रहा हूँ कि ‘ब्रह्म’ को शब्दों, अवधारणाओं और तर्कों में बाँधा नहीं जा सकता। जब कोई कहता है कि ‘यह है’, तो उसने उसे किसी रूप में सीमित कर दिया है। जब कोई कहता है कि ‘यह नहीं है’, तो वह उसका निषेध कर रहा है। ‘ब्रह्म’ इन दोनों सीमाओं से परे है। वह अनुभव का आधार है, वस्तु नहीं है।
आत्मज्ञान कोई बौद्धिक निष्कर्ष नहीं, बल्कि अनुभव का रूपांतरण है। जब भक्त ‘ब्रह्म’ को जानता है, तब उसका देखने का ढंग बदल जाता है। वह संसार को छोड़ता नहीं, पर संसार में बँधता भी नहीं। यही अमृत की अवस्था है। आत्मज्ञान को अक्सर भक्त-लोग एक ऊँचे विचार, दार्शनिक सिद्धांत, या शास्त्रीय निष्कर्ष के रूप में समझ लेते हैं। उन्हें लगता है कि कुछ गूढ़ वाक्य याद कर लेना, आत्मा और ब्रह्म के संबंध पर चर्चा कर लेना, या यह कह देना कि ‘मैं शरीर नहीं, आत्मा हूँ’, यही आत्मज्ञान है। पर वास्तव में आत्मज्ञान इतना सतही नहीं है। यह केवल बुद्धि की सहमति नहीं, बल्कि अनुभव की दिशा बदल जाने का नाम है। यह भक्त के भीतर ऐसी क्रांति है, जिसके बाद वह उसी संसार को देखकर भी पहले जैसा नहीं देखता। वस्तुएँ वही रहती हैं, दूसरे वही रहते हैं, घटनाएँ वही रहती हैं, पर देखने वाला बदल जाता है। यही आत्मज्ञान का वास्तविक आरंभ है।
बौद्धिक निष्कर्ष में भक्त सत्य के बारे में सोचता है, पर अनुभव के रूपांतरण में वह सत्य के अनुसार जीने लगता है। पहले वह यह जानता था कि संसार नश्वर है, पर नश्वर वस्तुओं के खोने पर टूट जाता था। पहले वह यह सुनता था कि सुख-दुःख आते-जाते हैं, पर थोड़ी-सी असफलता में अशांत हो जाता था। पहले वह कहता था कि आत्मा शाश्वत है, पर शरीर के छोटे-से संकट से भयभीत हो उठता था। इसका अर्थ यह है कि ज्ञान अभी बुद्धि तक था, जीवन तक नहीं उतरा था। आत्मज्ञान तब होता है जब यह दूरी मिटने लगती है। तब जो जाना जाता है, वही धीरे-धीरे दृष्टि बन जाता है; और जो दृष्टि बनता है, वही चरित्र, व्यवहार और आंतरिक शांति में प्रकट होता है।
जब भक्त ‘ब्रह्म’ को जानता है, तब वह किसी नई वस्तु को नहीं जानता; वह अस्तित्व की जड़ को पहचानता है। ब्रह्म का ज्ञान बाहर की किसी वस्तु पर अधिकार नहीं देता, बल्कि भीतर के भ्रम को दूर करता है। पहले भक्त अनेक वस्तुओं, संबंधों, विचारों और पहचानो में बँटा हुआ रहता है। वह कभी अपने शरीर में अटकता है, कभी मन की इच्छाओं में, कभी दूसरों की राय में, कभी अपने मान-सम्मान में। उसका ‘मैं’ हर क्षण किसी न किसी बदलती हुई चीज़ से जुड़ा रहता है। इसलिए उसकी शांति भी बदलती रहती है। पर जब वह ब्रह्म को जानने लगता है, तब उसे पहली बार यह दिखाई देता है कि इन सबके पीछे एक अखंड सत्ता है, एक आधार है, एक चैतन्य है, जो सबमें है और सबके पार भी है। यही पहचान उसकी दृष्टि को बदल देती है।
दृष्टि बदलने का अर्थ यह है कि अब वह वस्तुओं को केवल उपयोग, स्वामित्व या मोह की दृष्टि से नहीं देखता। वह संसार को ईश्वर की अभिव्यक्ति के रूप में देखने लगता है। वह लोगों को केवल अपने सुख-दुःख का साधन नहीं मानता, बल्कि उनमें भी उसी चेतना का प्रकाश अनुभव करने लगता है। यह अनुभव उसे संवेदनशील भी बनाता है और स्वतंत्र भी। संवेदनशील इसलिए कि वह अब जीवन की एकता को अधिक गहराई से देखता है। स्वतंत्र इसलिए कि वह किसी एक वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति पर अपने अस्तित्व को टिकाता नहीं।
यही कारण है कि आत्मज्ञानी संसार को छोड़ता नहीं। संसार को छोड़ देना आत्मज्ञान की शर्त नहीं है। यदि बंधन केवल बाहरी वस्तुओं में होता, तो स्थान बदलते ही मुक्ति मिल जाती। पर बंधन वस्तुओं में नहीं, उनसे जुड़ी आसक्ति, अभिमान, भय और अज्ञान में है। इसलिए भक्त वन में जाकर भी बँधा रह सकता है, और गृहस्थ होकर भी मुक्त हो सकता है। आत्मज्ञान का सार बाहर भागने में नहीं, भीतर बदलने में है। भक्त संबंध निभाता है, कर्म करता है, परिवार में रहता है, समाज के बीच चलता है, पर अब उसका केंद्र बदल चुका है। वह बाहर कार्य करता है, पर भीतर साक्षी रहता है। वह प्रेम करता है, पर पकड़ता नहीं। वह सेवा करता है, पर स्वामित्व नहीं रखता। वह प्रयास करता है, पर फल में डूबता नहीं।
‘संसार में बँधता भी नहीं’, यह वाक्य आत्मज्ञान की परिपक्वता को बताता है। बंधन का अर्थ है किसी अस्थायी वस्तु को स्थायी आधार मान लेना। शरीर बदलता है, इसलिए शरीर में बंधा भक्त भय से भरा रहेगा। संबंध बदलते हैं, इसलिए संबंधों में अपना अंतिम आश्रय खोजने वाला भक्त असुरक्षा में रहेगा। धन, सफलता, प्रतिष्ठा, विचार; सब बदलने वाले हैं; जो इनमें बँधता है, वह उनके साथ ऊपर-नीचे होता रहेगा। पर आत्मज्ञानी जानता है कि ये सब जीवन के प्रवाह का भाग हैं, अंतिम सत्य नहीं। इसलिए वह उन्हें अस्वीकार नहीं करता, पर उनके भीतर खोता भी नहीं। उसका उपयोग होता है, पर उसका अस्तित्व उन पर निर्भर नहीं रहता। यही अमृत की अवस्था है। ‘अमृत’ का अर्थ शरीर की अमरता नहीं, बल्कि उस चेतना में स्थित होना है जो नश्वरता के बीच भी अविनाशी है। जब भक्त यह जान लेता है कि उसका वास्तविक स्वरूप शरीर, मन, भावनाओं और भूमिकाओं से बड़ा है, तब जन्म-मृत्यु का भय धीरे-धीरे ढीला पड़ने लगता है। इसका अर्थ यह नहीं कि वह पत्थर बन जाता है या जीवन के अनुभवों से अछूता हो जाता है। वह सुख को भी अनुभव करता है, दुःख को भी; मिलन का आनंद भी जानता है, वियोग की वेदना भी। पर अब वह इनसे टूटता नहीं, क्योंकि वह इनके पार अपने भीतर एक अचल केंद्र को पहचान चुका है।
अमृत की अवस्था में जीवन भागना नहीं, जागना बन जाता है। वहाँ शांति निष्क्रियता नहीं, बल्कि गहरा संतुलन है। वहाँ वैराग्य कठोरता नहीं, बल्कि पकड़ से मुक्ति है। वहाँ भक्ति अंध-भावुकता नहीं, बल्कि सत्य में नम्र समर्पण है। आत्मज्ञान इसलिए अंतिम रूप से अनुभव का रूपांतरण है, क्योंकि यह केवल यह नहीं बताता कि सत्य क्या है; यह भक्त को ऐसा बना देता है कि वह सत्य के अनुसार देखने, जीने और रहने लगे। तब संसार पहले जैसा दिखते हुए भी पहले जैसा नहीं रहता। वही जीवन अब बंधन नहीं, भक्ति बन जाता है। वही जगत अब भ्रम का कारण नहीं, ब्रह्म की झलक बन जाता है। और वही भक्त, जो कभी हर परिवर्तन से काँपता था, अब परिवर्तन के बीच भी अमृत की शांति में स्थित होने लगता है।
उपनिषदों में ‘ब्रह्म’ के इसी स्वरूप का वर्णन बार-बार मिलता है। तैत्तिरीय उपनिषद् के ब्रह्मानन्दवल्ली के दूसरे वल्ली के सप्तम अनुवाक का मन्त्र है:
असद्वा इदमग्र आसीत्। ततो वै सदजायत। तदात्मानं स्वयमकुरुत। तस्मात्तत्सुकृतमुच्यत इति। यद्वै ततेसुकृतं रसो वै सः। रसं ह्येवायं लब्ध्वाऽऽनन्दी भवति। को ह्येवान्यात्कः प्राण्याद् यदेष आकाश आनन्दो न स्यात् । एष ह्येवानन्दयाति।
अर्थात् आरंभ में यह संसार वैसे प्रकट रूप में नहीं था जैसा आज दिखाई देता है। न पेड़ थे, न पर्वत, न मानव, न पशु, न यह अलग-अलग नाम और रूप। सब कुछ एक अप्रकट अवस्था में था। यहाँ ‘असत्’ का अर्थ बिल्कुल शून्य या कुछ भी न होना नहीं है। अर्थ है, जो अभी दिखाई नहीं दे रहा, जो छिपा हुआ है, जो प्रकट नहीं हुआ है। जैसे बीज में पूरा वृक्ष छिपा होता है, पर किसी को बाहर से नहीं दिखता, वैसे ही यह संसार पहले अप्रकट रूप में था।
फिर उसी से ‘सत्’ उत्पन्न हुआ, अर्थात् वही जगत प्रकट हो गया। जो पहले छिपा था, वही बाद में दिखाई देने लगा। अर्थ है, कि संसार किसी पूर्ण शून्य से नहीं बना, बल्कि एक गहरे सत्य से प्रकट हुआ। यह जगत उसी मूल सत्य की अभिव्यक्ति है। ‘तदात्मानं स्वयमकुरुत’, यानि कि उस परम सत्य ने स्वयं को ही अनेक रूपों में प्रकट किया। कोई बाहर बैठा कारीगर यह दुनिया बना नहीं रहा था; बल्कि वही एक परम तत्त्व स्वयं ही इस अनेक रूप वाले जगत के रूप में प्रकट हुआ। इसलिए संसार और उसका मूल आधार पूरी तरह अलग नहीं हैं। जैसे मिट्टी से घड़ा बनता है, तो घड़ा नया रूप है, पर उसका आधार मिट्टी ही है। वैसे ही यह संसार अनेक रूपों में दिखाई देता है, पर उसका मूल एक ही है। ‘तस्मात्तत्सुकृतमुच्यते’, अर्थात् यह सृष्टि उसी की सुंदर, अच्छी और सार्थक रचना है। दुनिया में दुःख, कठिनाई और परिवर्तन भी हैं, फिर भी उसका मूल आधार बुरा नहीं है। मूल सत्य शुभ है, पूर्ण है। ‘रसो वै सः’, ये सबसे सुंदर शब्द हैं। अर्थात् वह परम सत्य ‘रस’ है। रस का मतलब स्वाद नहीं है। रस का अर्थ है सार, मधुरता, जीवन की वास्तविक तृप्ति, वह आनंद जिससे जीवन जीवंत लगता है। भक्त जीवन में जो भी चाहता है जैसे प्रेम, सम्मान, सफलता, परिवार, धन, सुंदरता; उन सबके पीछे एक ही खोज छिपी होती है; आनंद की खोज। भक्त हर काम, अंत में आनंद पाने के लिए करता है।
‘रसं ह्येवायं लब्ध्वाऽऽनन्दी भवति’, अर्थात् जब भक्त उस परम रस को पा लेता है, तब वह सचमुच आनंदित हो जाता है। असली आनंद बाहर की वस्तुओं में स्थायी रूप से नहीं मिलता। बाहर की चीजें थोड़ी देर खुशी दे सकती हैं, पर फिर मन खाली हो जाता है। एक इच्छा पूरी होती है, तो दूसरी खड़ी हो जाती है। लेकिन जब भक्त अपने भीतर के परम सत्य, ईश्वर, ब्रह्म या आत्मा के आनंद से जुड़ता है, तब उसे गहरी शांति और स्थायी संतोष मिलता है। ‘को ह्येवान्यात्कः प्राण्याद् यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्’ अर्थात् यदि यह सर्वव्यापक आनंद न हो, तो कौन जी सकेगा ? कौन श्वास ले सकेगा ? भाव यह है कि जीवन का असली आधार केवल भोजन, वायु और शरीर नहीं है; भीतर एक गहरा आनंद-तत्त्व भी है जो सबको धारण किए हुए है। भक्त जीता इसलिए है कि उसके भीतर कहीं न कहीं आनंद की संभावना है, आशा है, प्रकाश है।
‘एष ह्येवानन्दयाति’, अर्थात् वही वास्तव में आनंद देता है। इसका मतलब यह है कि असली आनंद का स्रोत परम सत्य है, न कि केवल बाहरी चीजें। बाहरी वस्तुएँ माध्यम हो सकती हैं, पर आनंद का मूल स्रोत भीतर है। यह संसार एक गहरे सत्य से निकला है, वही सत्य सबका आधार है, वही आनंदस्वरूप है, और उसी को पाकर भक्त सच में आनंदित होता है। इसलिए जीवन का उद्देश्य केवल बाहर की चीजें इकट्ठी करना नहीं, बल्कि उस परम आनंद के स्रोत को पहचानना है, जो उसके भीतर और पूरे जगत में छिपा हुआ है। और वह ‘ब्रह्म’ है।
मैंने पहले भी कहा है:
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः ॥ (श्रीमद्भगवद्गीता, भाग दो ‘निर्णय लेना कौन सिखाएगा’)
अर्थात् जो वास्तव में असत्य है, जो केवल क्षणिक, परिवर्तनशील और उधार के अस्तित्व पर टिका है, उसका स्थायी स्वरूप नहीं होता। और जो सत्य है, उसका अभाव कभी नहीं होता। वह न समय से मिटता है, न परिवर्तन से नष्ट होता है। शरीर, परिस्थितियाँ, सुख-दुःख, लाभ-हानि, नाम-रूप; ये सब बदलते रहते हैं। इसलिए ये व्यवहार में तो सत्य हैं, पर अंतिम अर्थ में नित्य नहीं हैं। दूसरी ओर आत्मा, चैतन्य, अस्तित्व का मूल तत्त्व; यह कभी नष्ट नहीं होता। वही सत् है। जो असत् है, उसका अस्तित्व नहीं; जो सत् है, उसका अभाव नहीं।
भक्त को ईश्वर को सीमित कल्पनाओं से मुक्त रखना चाहिए। भक्त अक्सर ईश्वर को किसी एक रूप, नाम या भाव में पकड़ लेता है। ईश्वर उससे कहीं अधिक व्यापक हैं। वे न केवल ‘हैं’, बल्कि सबके ‘होने’ का आधार हैं। सच्चा भक्त ईश्वर को पाने की लालसा नहीं करता, बल्कि ईश्वर में विलीन होने की तैयारी करता है। जब भक्त यह समझ लेता है कि ब्रह्म न सत् है न असत्, तब उसका अहंकार स्वयं गिरने लगता है। वह यह नहीं कहता कि ‘मैं ईश्वर को जानता हूँ’, बल्कि यह अनुभव करता है कि ‘ईश्वर के बिना मैं कुछ भी नहीं हूँ’। जीवन का सबसे बड़ा सत्य परिभाषाओं से परे है। जब भक्त यह स्वीकार कर लेता है कि सब कुछ समझ में आना आवश्यक नहीं, तब वह भीतर से शांत होने लगता है।
सच्चा ज्ञान किसी वस्तु को जानना नहीं, बल्कि उस आधार को पहचानना है जिस पर सब कुछ टिका है। ब्रह्म कोई दूर की सत्ता नहीं, बल्कि हर अनुभव का मूल है। मुक्ति किसी नए अनुभव को जोड़ने से नहीं, बल्कि ग़लत पहचान को छोड़ने से मिलती है। जब भक्त यह समझ लेता है कि वह शरीर, मन या विचार नहीं है, बल्कि उस चेतना का अंश है जो सबको जानती है, तब वह अमृत का अनुभव करता है। यह अमृत मृत्यु के बाद नहीं, जीवन में ही उपलब्ध होता है। भय घट जाता है, पकड़ ढीली पड़ जाती है और शांति स्थिर हो जाती है। यही अवस्था ब्रह्मज्ञान है।
जो जानने योग्य है,वह कोई वस्तु नहीं; वह वही है जिसके बिना कुछ भी जाना नहीं जा सकता। (पुस्तक जीव-क्षेत्र कहाँ है? के कुछ अंश, लेखक डॉ. राजेश तकयार)



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