11 अक्टूबर 2026 · डॉ. राजेश तकयार
भाग 8 — दिव्यमार्ग

अर्जुन श्रीकृष्ण से ब्रह्म, अध्यात्म और कर्म का अर्थ पूछते हैं। वे अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ को भी समझना चाहते हैं। उनके प्रश्न का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि जीवन के अंतिम समय में संयमित मनुष्य परमात्मा को कैसे जानता है। श्रीकृष्ण उन्हें नश्वर और अविनाशी के भेद की ओर ले जाते हैं। जो उत्पन्न होता है और नष्ट होता है, वह परिवर्तन के क्षेत्र में है। देह और दृश्य जगत इसी नियम के अधीन हैं। परम ब्रह्म वह अक्षर सत्य है जो इस उत्पत्ति और विनाश से परे है। मनुष्य प्रायः अपने जीवन को शरीर की अवस्था, संबंधों और उपलब्धियों से पहचानता है। लेकिन ये सब बदलते रहते हैं। श्रीकृष्ण अर्जुन को उस आधार का स्मरण कराते हैं जो इन परिवर्तनों के बीच भी नष्ट नहीं होता। वे बताते हैं कि अंतिम समय का स्मरण जीव की आगे की गति से जुड़ा है। मनुष्य जिस भाव में स्थिर होकर शरीर छोड़ता है, उसी भाव की दिशा में जाता है। इसलिए जीवन भर मन को किस ओर लगाया गया, यह महत्वपूर्ण है। अंतिम क्षण की तैयारी पूरे जीवन के अभ्यास में होती है। मन बार-बार जिन विषयों की ओर लौटता है, वही उसके भीतर गहरे बसते हैं। परमात्मा का स्मरण भी निरंतर अभ्यास से मन का स्वभाव बनता है। इसीलिए श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि उनका स्मरण करते हुए अपना कर्तव्य भी करें। स्मरण और कर्म एक साथ चल सकते हैं। मन और बुद्धि को परमात्मा में अर्पित रखते हुए जीवन के आवश्यक कार्य पूरे किए जा सकते हैं। यह साधना मन को बार-बार एक दिशा में लाने की है। जब वह अनेक इच्छाओं में बिखरने लगता है, तब अभ्यास उसे लौटाता है। अनन्य चिंतन में साधक का लक्ष्य स्पष्ट होता जाता है और उसके भीतर की चंचलता घटती है। श्रीकृष्ण उस परम पुरुष का स्वरूप बताते हैं जो सर्वज्ञ, सनातन और सबका धारण करने वाला है। वह अणु से भी सूक्ष्म है, चिंतन की सीमाओं से परे है और अज्ञान के अंधकार से ऊपर है। साधक का ध्यान उसी पर स्थिर होता है। वे संयमित इन्द्रियों, स्थिर मन, भक्ति और योगबल का उल्लेख करते हैं। प्रणव के स्मरण के साथ परमात्मा में चित्त लगाना भी इसी साधना का अंग है। इन सबका केंद्र भीतर की एकाग्रता और समर्पण है। जो निरंतर परमात्मा का स्मरण करता है, उसके लिए उनकी प्राप्ति सहज होती है। इस सहजता का आधार जीवन भर का जुड़ाव है। जहाँ मन बार-बार प्रेम और निष्ठा से लौटता है, वहाँ दूरी धीरे-धीरे कम हो जाती है। इसके बाद श्रीकृष्ण सृष्टि की विशाल समय-व्यवस्था बताते हैं। प्राणी प्रकट होते हैं और फिर अप्रकट अवस्था में लीन हो जाते हैं। यह क्रम बार-बार चलता है। दीर्घायु लोक भी इस परिवर्तन से पूरी तरह बाहर नहीं हैं। पर इस प्रकट और अप्रकट प्रकृति से परे एक सनातन तत्त्व है। समस्त प्राणियों के नष्ट होने पर भी वह नष्ट नहीं होता। उसी अक्षर अवस्था को परम गति कहा गया है। उसे प्राप्त करके जीव पुनः उसी आवागमन में नहीं लौटता। श्रीकृष्ण दो गतियों का भी वर्णन करते हैं—एक ऐसी जो पुनरागमन से परे ले जाती है और दूसरी जिसमें लौटना होता है। इस विवेचन के बाद उनका निर्देश यही है कि अर्जुन प्रत्येक समय योगयुक्त रहें। साधना को किसी एक अवसर तक सीमित न रखें। वेदाध्ययन, यज्ञ, तप और दान से मिलने वाले पुण्य का अपना महत्व है। किंतु परमात्मा के स्वरूप को जानकर उनमें स्थित होने वाला योगी उन सीमित फलों से आगे बढ़ता है। उसकी खोज स्वयं उस परम आधार की होती है। दिव्यमार्ग का सार जीवन की दिशा में है। जिस परम सत्य को अंत में पाना है, उसका स्मरण अभी के जीवन में स्थापित करना होगा। कर्तव्य, अभ्यास, भक्ति और समर्पण से जीया गया प्रत्येक दिन उसी यात्रा का हिस्सा बन जाता है।
लेखक ने इसका विस्तार अपनी निम्न पुस्तक में 57,000 शब्दों में किया है। (श्रीमद्भगवद्गीता — भाग 8 — दिव्यमार्ग)