भारतीय ज्ञान परंपरा को सरल और प्रामाणिक रूप में समझाने का एक प्रयास...

11 अक्टूबर 2026 · डॉ. राजेश तकयार

निर्णय लेना कौन सिखाएगा?

निर्णय लेना कौन सिखाएगा?

श्रीकृष्ण से अर्जुन कहते हैं कि वे समझ नहीं पा रहे कि उनके लिए क्या करना उचित है। एक ओर कर्तव्य है और दूसरी ओर वे संबंध हैं जिन्हें खोने की कल्पना भी उन्हें व्याकुल कर देती है। उन्हें यह भी स्पष्ट नहीं कि विजय उनके लिए अच्छी होगी या पराजय। जिन लोगों को मारकर वे जीना नहीं चाहते, उन्हीं के सामने उन्हें खड़ा होना पड़ा है।

अर्जुन को लगता है कि पृथ्वी का समृद्ध राज्य मिल जाए, यहाँ तक कि देवताओं का आधिपत्य भी मिल जाए, तब भी उनके भीतर का यह शोक दूर नहीं होगा। अंततः वे अपनी असमर्थता स्वीकार करते हैं। श्रीकृष्ण से कहते हैं कि उनका मन धर्म के विषय में भ्रमित हो गया है। वे अब उनके शिष्य हैं और उनकी शरण में आए हैं। जो निश्चित रूप से कल्याणकारी हो, श्रीकृष्ण वही उन्हें समझाएँ।

यहीं संवाद की दिशा बदलती है। अर्जुन अपनी बात कहने के साथ अब सीखने के लिए भी तैयार होते हैं।

श्रीकृष्ण उन्हें सबसे पहले उस सत्य की ओर ले जाते हैं जिसे वे अपने शोक में भूल रहे हैं। वे समझाते हैं कि शरीर और उसमें स्थित आत्मा एक ही वस्तु नहीं हैं। शरीर बदलता है। बाल्यावस्था आती है, फिर युवावस्था और उसके बाद वृद्धावस्था। इन परिवर्तनों के बीच भी भीतर का अस्तित्व बना रहता है। इसी प्रकार शरीर का अंत होने पर आत्मा का अंत नहीं होता।

आत्मा न जन्म लेती है और न मरती है। शरीर के नष्ट होने पर भी उसका विनाश नहीं होता। जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र छोड़कर नए वस्त्र धारण करता है, वैसे ही आत्मा पुराने शरीर को छोड़कर दूसरा शरीर धारण करती है। उसे शस्त्र काट नहीं सकते, अग्नि जला नहीं सकती, जल भिगो नहीं सकता और वायु सुखा नहीं सकती।

श्रीकृष्ण अर्जुन को केवल मृत्यु का अर्थ नहीं समझाते; वे जीवन के बदलते अनुभवों को देखने की दृष्टि भी देते हैं। सर्दी और गर्मी, सुख और दुःख आते हैं और चले जाते हैं। वे स्थायी नहीं हैं। जो मनुष्य प्रत्येक परिवर्तन के साथ पूरी तरह टूटता या बहता नहीं, बल्कि धैर्य बनाए रखता है, उसकी बुद्धि स्थिर होने लगती है।

इसके बाद श्रीकृष्ण अर्जुन का ध्यान उनके कर्तव्य की ओर लाते हैं। वे कहते हैं कि अपने स्वधर्म को देखकर भी उन्हें विचलित नहीं होना चाहिए। इस परिस्थिति में मोह के कारण अपने कर्तव्य से हट जाना समाधान नहीं है। अर्जुन को सुख-दुःख, लाभ-हानि और विजय-पराजय के बीच संतुलन रखते हुए अपने धर्म का पालन करना होगा।

लेकिन मन यह संतुलन बनाए कैसे रखे? वह तो कुछ पाने की आशा और कुछ खोने के भय से बार-बार डगमगा जाता है।

श्रीकृष्ण इसका उत्तर कर्म और फल के संबंध को स्पष्ट करके देते हैं। अर्जुन का अधिकार कर्म करने में है, उसके फल पर नहीं। उन्हें फल की आसक्ति में बँधकर कर्म नहीं करना चाहिए, लेकिन कर्म न करने में भी आसक्त नहीं होना चाहिए। परिणाम का भय उन्हें निष्क्रिय न बनाए और परिणाम का लोभ उनकी बुद्धि को अपने अधीन न कर ले।

वे अर्जुन से कहते हैं कि सफलता और असफलता में समभाव रखकर कर्म करें। यही समत्व योग है। कर्म करते समय मन केवल इस गणना में न उलझा रहे कि मुझे क्या मिलेगा। बुद्धि इतनी स्पष्ट हो कि मनुष्य अपने उचित कर्म को पहचान सके और उसे पूरी तत्परता से कर सके। श्रीकृष्ण इसी प्रसंग में योग को कर्मों की कुशलता कहते हैं।

इस मार्ग में निश्चय का भी महत्त्व है। जिस बुद्धि का लक्ष्य स्पष्ट है, वह एक दिशा में चलती है। लेकिन जो मन अनेक इच्छाओं और आकर्षणों के पीछे भागता रहता है, उसकी बुद्धि अनेक शाखाओं में बँट जाती है। भोग, ऐश्वर्य और सुख प्राप्त करने की आकांक्षा ही सब कुछ बन जाए, तो भीतर स्थिरता नहीं आती।

यह सुनकर अर्जुन श्रीकृष्ण से एक और प्रश्न करते हैं। जिसकी बुद्धि स्थिर हो गई है, उसकी पहचान क्या है? वह कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है?

श्रीकृष्ण उत्तर में उसके भीतर की अवस्था बताते हैं। ऐसा मनुष्य मन की कामनाओं को छोड़कर आत्मा में संतुष्ट रहता है। दुःख उसे विचलित नहीं करता और सुख की लालसा उसे अपने पीछे नहीं दौड़ाती। वह राग, भय और क्रोध से मुक्त होता है। अनुकूल परिस्थिति उसे आसक्ति में नहीं बाँधती और प्रतिकूल परिस्थिति उसे द्वेष में नहीं डुबोती।

श्रीकृष्ण कछुए का उदाहरण देते हैं। जैसे कछुआ आवश्यकता होने पर अपने अंग समेट लेता है, वैसे ही संयमी मनुष्य अपनी इन्द्रियों को विषयों से हटा सकता है। लेकिन केवल बाहरी दूरी पर्याप्त नहीं है। किसी वस्तु से दूर रहने पर भी उसका आकर्षण मन में बना रह सकता है। इसलिए संयम के साथ भीतर की दिशा बदलना और परम सत्य में स्थित होना आवश्यक है।

वे अर्जुन को मन के भटकने का क्रम भी समझाते हैं। किसी विषय का बार-बार चिंतन करने से उसमें आसक्ति होती है। आसक्ति से कामना जन्म लेती है और कामना से क्रोध उत्पन्न होता है। क्रोध विवेक को ढक देता है। स्मृति भ्रमित होती है और बुद्धि नष्ट होने लगती है। तब मनुष्य अपने ही निर्णयों से पतन की ओर बढ़ जाता है।

इसके विपरीत, जो राग-द्वेष से मुक्त होकर संयमित इन्द्रियों के साथ जीवन जीता है, वह आंतरिक प्रसन्नता प्राप्त करता है। प्रसन्न चित्त में बुद्धि स्थिर होती है। अशांत मन में सुख कैसे टिक सकता है?

अंत में श्रीकृष्ण समुद्र का उदाहरण देते हैं। अनेक नदियाँ उसमें आकर मिलती हैं, फिर भी वह अपनी मर्यादा में स्थिर रहता है। उसी प्रकार जिसके भीतर इच्छाएँ उठकर शांत हो जाती हैं, जो उनका दास नहीं बनता, वही शांति पाता है। ‘मैं’ और ‘मेरा’ की पकड़ छोड़कर जीने वाला मनुष्य उस स्थिर अवस्था तक पहुँचता है जिसे श्रीकृष्ण ब्राह्मी स्थिति कहते हैं।

दूसरे अध्याय में अर्जुन के सामने निर्णय की दिशा खुलती है। आत्मा के सत्य को जानना, परिवर्तन को धैर्य से सहना, अपने कर्तव्य को पहचानना और फल की आसक्ति छोड़कर कर्म करना—ये सब एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। मन का संयम और बुद्धि की स्थिरता उसी दिशा को स्पष्ट करते हैं। तब निर्णय केवल भय, मोह या लाभ की इच्छा से नहीं निकलता; उसके पीछे विवेक होता है। लेखक ने इसका अर्थ-विस्तार अपनी इस पुस्तक में 60500 शब्दों से किया है।

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