5 अक्टूबर 2026 · डॉ. राजेश तकयार

कृष्ण: सच्चे गुरु

कृष्ण: सच्चे गुरु

हम गुरु से अक्सर अपनी किसी तत्काल उलझन का उत्तर चाहते हैं। लेकिन गुरु का कार्य हमारी दृष्टि को भी खोलना है, ताकि आगे आने वाले प्रश्नों को अधिक समझ से देख सकें। कृष्ण एक सत्यज्ञान के इस अध्याय में कृष्ण को ऐसे गुरु के रूप में देखा गया है जो मनुष्य को अपने अस्तित्व, अस्थायी अनुभवों और आत्मिक आधार पर विचार करने के लिए प्रेरित करते हैं।

कृष्ण से सीखने का अर्थ

कृष्ण कौन हैं? इसका उत्तर शब्दों में देना बहुत कठिन है। वे अनन्त हैं, कृष्ण को केवल भगवान् नहीं कहा जा सकता। अगर ऐसा होता तो उन अजन्मे और अखिलात्मा को बार-बार इस पृथ्वी पर जन्म नहीं लेना पड़ता। वे भगवान् के अलावा एक उच्चतम से उच्चतम गुरु हैं। जिसने उनसे शिक्षा ले ली फिर उसे इस जन्म में तो क्या किसी जन्म में भी कुछ शिक्षा लेने की आवश्यकता शायद ही पड़ सकती है। उनका कहा प्रत्येक शब्द और उनका किया प्रत्येक कार्य मानव जाति के लिए ही केवल नहीं बल्कि देवताओं के लिए, ऋषि-मुनियों के लिए वेदवाणी है, मुक्ति का द्वार है। परंतु वह लीलापति हैं, इसीलिए श्रीमद्भगवद्गीता को छोड़ कर उनका कहा कोई भी शब्द लीला से परे नहीं है। अगले ही पल वे क्या करेंगे ये नहीं समझा जा सकता। उन्होंने हम मानवों को सत्यज्ञान की शिक्षा दी है। जिसको समझ कर हम अपने कुल का ही नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों का भी निर्वाह कर सकते हैं। वह हमसे कुछ लेना नहीं चाहते, केवल हमें देना चाहते हैं। परंतु इसे समझना होगा। और उसके लिए उनके बताये हुए सत्यज्ञान का पाठ उन्हीं के कहे शब्दों में हमें खोजना जारी रखना होगा। तभी हम मुक्ति पा सकते हैं। उनका कहा हुआ ये सत्य का ज्ञान है क्या?

बदलते अनुभव और शाश्वत का प्रश्न

सत्य ज्ञान का तात्पर्य उस ज्ञान से है जो वास्तविकता, सत्यता और शाश्वत तत्वों से भरा हुआ है। यह ज्ञान किसी भ्रम या माया से परे है और जीवन के सर्वोच्च सत्य को समझने में सहायक है। ये आध्यात्मिक मुक्ति, मोक्ष और आत्म-साक्षात्कार का मार्ग है। यह ज्ञान हमें बताता है कि इस संसार में जो दिखाई देता है वह क्षणिक और अस्थायी है, जबकि परमात्मा यानी आत्मा एक ब्रह्म सत्य है और वही शाश्वत है, वही सदा से था और वही सदा रहेगा। इसे उन्होंने बहुत आसान शब्दों में श्रीमद्भगवद्गीता में कहा था कि आत्मा अजर-अमर है और हमारी ये हाड़-मांस से बनी हुई देह नाशवान है, इसे एक दिन नष्ट होना ही है। जो उत्पन्न हुआ है वह जन्मते ही, बाल्यावस्था में, युवावस्था में, मध्यमवय में और या फिर जराग्रस्त होने पर मर ही जायेगा। यह परम सत्य ही संसार के सभी प्राणियों का आधार है। इसके अलावा संसार में जो भी माया या भौतिक संसार के तत्व हैं, वे अस्थायी हैं और सत्य नहीं हैं। यही सत्यज्ञान हमें जन्म-मरण के चक्र से ऊपर उठने की प्रेरणा देता है। जिस प्रकार से कपास का बीज तन्तुओं के कारण सूत्रों से घिरा रहता है इसी प्रकार से मनुष्य भी सारा जीवन नाना प्रकार के कष्टों से घिरा रहता है।

ब्रह्म या परमात्मा ही इस संसार का मूल है, और वही सर्वत्र व्याप्त है। उपनिषदों में कहा गया है कि ब्रह्म ज्ञान प्राप्त करने से ही आत्मा और परमात्मा की एकता का अनुभव होता है। यह संसार माया के रूप में भिन्न-भिन्न प्रतीत होता है, लेकिन ब्रह्म सत्य है और एक है। अज्ञान के कारण व्यक्ति भ्रम में फँस जाता है, और वह संसार के अस्थायी सुख-दुःख, राग-द्वेष में ही उलझा रहता है। सत्यज्ञान से यह अज्ञान दूर होता है और व्यक्ति सच्चे रूप से संसार की वास्तविकता को समझता है। सत्यज्ञान अद्वैत वेदांत में बिना भेद की स्थिति को प्राप्त करना है, जहाँ व्यक्ति अपने और ईश्वर के बीच कोई भेद नहीं मानता। वह देखता है कि आत्मा और परमात्मा एक ही हैं। श्रीकृष्ण द्वारा रासलीला करना हमें यही स्थिति का ज्ञान कराने के लिए है। रास में भगवान् और गोपियों के बीच में कुछ नहीं रहता। शरीर की कोई बाधा नहीं होती केवल परमात्मा होता है और हमारी आत्मा होता है, जो कि हैं ही एक। वही सच्चा मिलन कहा जा सकता है। यही सत्यज्ञान है जो वे हमें देना चाहते हैं। क्योंकि उसके पश्चात आप की कोई इच्छा, आपका कोई दुःख या सुख रह ही नहीं जाता, सब दूर हो जाता है या पूर्ण हो जाता है। क्योंकि आप स्वयं ही परमात्मा हो गये हो, कोई तृष्णा या अपूर्णता रह ही नहीं गई, आपने सब कुछ प्राप्त कर लिया है।

आत्मा तथा परमात्मा की एकता

श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन को इसी सत्यज्ञान का उपदेश देते हैं। उपनिषदों में सत्यज्ञान को ब्रह्मविद्या कहा गया है, जो व्यक्ति को मोक्ष प्राप्ति की ओर ले जाती है। चांदोग्य उपनिषद् में सत्यज्ञान का एक यह सूत्र कहा गया है। उसमें कहा गया है- ‘तत्त्वमसि’ यानी ‘तू ही ब्रह्म है।‘ इसका भी यही अर्थ है कि आत्मा और परमात्मा में कोई भेद नहीं है। यही सत्यज्ञान का सबसे बड़ा संदेश है। माया के बंधनों से ऊपर उठकर अगर सत्य को समझ लिया तो मोक्ष की प्राप्ति यानी जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति मिल जाएगी और आध्यात्मिक शांति और परम आनंद की भी प्राप्ति हो जाएगी।

ज्ञान को जीवन का प्रश्न बनाएँ

इस अध्याय की भाषा अद्वैत की आध्यात्मिक दृष्टि से जुड़ी है। वह आत्मा और परमात्मा के अभेद का चिंतन करती है। इसे पढ़ते समय केवल शब्द याद कर लेना पर्याप्त नहीं। पाठक अपने जीवन में देख सकता है कि वह अपनी पहचान किन बातों से बनाता है। क्या मैं केवल अपना पद हूँ? क्या मेरी पहचान किसी सफलता, असफलता या दूसरे की राय तक सीमित है? ये प्रश्न हमें भीतर की जाँच के लिए आमंत्रित करते हैं।

हमारा अनुभव निरंतर बदलता है। बचपन की पसंद बदलती है, संबंधों की परिस्थितियाँ बदलती हैं और जीवन की जिम्मेदारियाँ भी नई होती जाती हैं। किसी एक अवस्था को स्थायी मान लेने पर उसके बदलते ही मन घबरा सकता है। अध्याय परिवर्तन को देखने के साथ आत्मिक आधार की खोज की ओर ले जाता है। यह खोज संसार से असावधान हो जाने की छूट नहीं देती। जीवन अस्थायी है, इसलिए उसके प्रति हमारी जिम्मेदारी और संवेदनशीलता मूल्यवान हो जाती है।

मान लें कि किसी काम में आपकी प्रशंसा हुई। मन प्रसन्न होना स्वाभाविक है। लेकिन यदि उसी प्रशंसा को अपना पूरा मूल्य मान लें, तो अगली आलोचना भीतर गहरी चोट पहुँचा सकती है। इसी प्रकार असफलता को अपना अंतिम परिचय बना लेना भी दृष्टि को सीमित करता है। सत्यज्ञान की ओर मुड़ना हमें अनुभव और अपनी संपूर्ण पहचान के बीच स्थान बनाने की प्रेरणा देता है। घटना से सीखें, पर स्वयं को उसी घटना में समाप्त न मानें।

कृष्ण को गुरु मानने का व्यावहारिक अर्थ यह भी है कि उनके संदेश के सामने अपनी सुविधाजनक धारणाओं को जाँचने के लिए तैयार रहें। हम कभी वही बात स्वीकार करना चाहते हैं जो पहले से पसंद है। लेकिन सीखना तब शुरू होता है जब कोई विचार हमारी आदत से प्रश्न करता है। क्या मैं अपने भय को विवेक कह रहा हूँ? क्या मैं अपने लगाव को सत्य मान रहा हूँ? ऐसे प्रश्न कठिन हो सकते हैं, पर वे ईमानदार अध्ययन का हिस्सा हैं।

प्रेम और एकता की दृष्टि

अध्याय में भक्त और भगवान् के संबंध का वर्णन भी आता है। उसका केंद्रीय भाव निकटता, प्रेम और समर्पण है। इस संबंध को केवल लेनदेन की तरह देखने पर उसका विस्तार कम हो जाता है। यदि प्रार्थना केवल मनचाही वस्तु पाने का साधन बन जाए, तो भीतर की तैयारी पीछे रह सकती है। भक्ति हमें अपनी नीयत, अपने व्यवहार और दूसरों के प्रति दृष्टि को भी देखने का अवसर देती है।

एकता का चिंतन यदि केवल चर्चा में रह जाए तो वह अधूरा अनुभव होगा। घर में असहमति होने पर किसी को ध्यान से सुनना, किसी कमजोर व्यक्ति का अपमान न करना और अपनी सुविधा के लिए छल से बचना उसके व्यावहारिक संकेत हो सकते हैं। सभी में आत्मिक आधार देखने की भावना मानव की गरिमा के प्रति सजग बनाती है। मतभेद रहते हुए भी सम्मान बना रह सकता है। यह जीवन में अभ्यास से विकसित होने वाली क्षमता है।

पढ़ने के बाद एक विराम

इस अध्याय को पढ़कर तुरंत बहुत से निष्कर्ष निकालना आवश्यक नहीं है। कोई एक प्रश्न अपने साथ रखें और दिन के अनुभवों में उसे देखें। आज किस बात ने मुझे सबसे अधिक विचलित किया? मैं उस अनुभव से क्या सीख सकता हूँ? किस लगाव ने मेरी दृष्टि संकुचित की? उत्तर अधूरा मिले तो भी प्रश्न उपयोगी रहता है।

कृष्ण के गुरु रूप का यह चिंतन हमें तैयार उत्तरों के साथ सजग जिज्ञासा भी देता है। अध्ययन, आत्मपरीक्षण और संवेदनशील कर्म साथ आएँ तो ज्ञान जीवन से जुड़ने लगता है। यही इस अध्याय की ओर फिर लौटने का कारण है: अपने भीतर अधिक स्पष्टता, अपने संबंधों में अधिक सम्मान और अपने कर्म में अधिक जिम्मेदारी लाने की सतत कोशिश।

सीखने की शुरुआत किसी असाधारण अनुभव से ही हो, यह आवश्यक नहीं। ईमानदारी से बात करना, अपने भीतर उठे अहंकार को पहचानना और किसी उपयोगी प्रश्न को खुले मन से सुनना भी तैयारी है। गुरु का संदेश जीवन में उतरे, इसके लिए हमारी ओर से सहभागिता आवश्यक रहती है। यही अध्ययन को साधना से जोड़ती है।

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डॉ. राजेश तकयार

डॉ. राजेश तकयार

लेखक · स्वतंत्र शोधकर्ता

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