कभी जीवन के सबसे सुंदर दृश्य भी मन को सांत्वना नहीं दे पाते। नदी अपने प्रवाह में बहती रहती है, वृक्षों पर फूल खिलते रहते हैं, चाँद अपनी रोशनी बिखेरता
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हिंदी और अंग्रेज़ी में 40 लेख। पूरा संग्रह देखें।
40 लेख

कभी जीवन के सबसे सुंदर दृश्य भी मन को सांत्वना नहीं दे पाते। नदी अपने प्रवाह में बहती रहती है, वृक्षों पर फूल खिलते रहते हैं, चाँद अपनी रोशनी बिखेरता
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मेहनत करने के बाद भी कभी लगता है कि हम वहीं खड़े हैं। दिन व्यस्त बीतता है, थकान भी होती है, लेकिन इच्छित काम आगे नहीं बढ़ता। ऐसे समय केवल प्रयास बढ़ान
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माला को देखते समय पहले मोती दिखाई देते हैं। उन्हें जोड़े रखने वाला धागा अक्सर नजर नहीं आता। सातवें भाग में कृष्ण इसी सरल उपमा से जगत और उसके आध्यात्मि
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हम काम शुरू करते ही उसके परिणाम की कल्पना करने लगते हैं। प्रशंसा मिलेगी या आलोचना, सफलता मिलेगी या असफलता, यह चिंता कई बार काम से अधिक जगह घेर लेती है
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जीवन में कुछ निर्णय ऐसे होते हैं जिनका उत्तर जानने के बाद भी कदम उठाना कठिन होता है। सामने केवल काम नहीं, अपने लोग, पुरानी स्मृतियाँ और संबंधों की आशं
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हम गुरु से अक्सर अपनी किसी तत्काल उलझन का उत्तर चाहते हैं। लेकिन गुरु का कार्य हमारी दृष्टि को भी खोलना है, ताकि आगे आने वाले प्रश्नों को अधिक समझ से
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पुस्तक-संदर्भ: यह लेख मेरी पुस्तक “कृष्ण की राधा” के “व्रजभूमि और श्रीराधा नाम महत्व” अध्याय पर आधारित है। किसी पवित्र स्थान से प्रेम करना केवल वहाँ प
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श्रीमद्भगवद्गीता पढ़ने से जुड़े 20 सरल प्रश्न: कर्म, निर्णय, चिंता, संबंध, जीवन का उद्देश्य और रोज़मर्रा में उसकी सीख का उपयोग।
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अर्जुन के प्रश्न पर श्रीकृष्ण का उत्तर: क्या अधूरी साधना, भक्ति और अच्छे कर्म अगले जन्म में भी साथ रहते हैं?
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धर्मात्मा कौन है, वह क्या करता है, क्यों वह धर्मात्मा है ? धर्मात्मा वह होता है जिसका आत्मा धर्म से जुड़ा हो, जिसका हर कार्य सत्य, करुणा, न्याय और पवि
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भगवान् केवल परम सत्ता नहीं, बल्कि प्रेम के सभी रूपों में अनुभव किए जा सकते हैं। मानव अक्सर भगवान् को केवल एक महान शक्ति या परम सत्ता के रूप में सोचता
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क्या आपने कभी किसी ऐसे निर्णय के सामने स्वयं को खड़ा पाया है, जहाँ दोनों ओर अपने ही लोग हों और कोई भी रास्ता सरल न लगे? मन जानता है कि कुछ करना होगा,
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ज्ञेयं यत् तत् प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते। अनादिमत् परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते॥ १२ ॥ श्रीमद्भगवद्गीता के भाग तेरह के इस श्लोक में अर्जुन के संग, भगवान् श्
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अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे।प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः॥ २९ ॥ यह श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय चार का संख्या 29 श्लोक है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण अ
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बहुत से मानव कहते हैं कि आत्मा करता है कहना सही नहीं है, करती है कहना सही है। जोकि उचित नहीं है। वेदों, शास्त्रों, उपनिषदों में आत्मा को पुल्लिंग ही बताया गया है। सं
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मैं एक लेखक हूँमुझे आध्यात्मिकता पर लिखना बहुत अच्छा लगता है। ऐसा नहीं है कि मैं कोई इस का विश्लेषक हूँ, बल्कि ये इस लिए है कि जब भी आप आध्यात्मिकता पर सोचते हैं, पढ
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आम मानस के मन में एक बहुत बड़ी दुविधा रहती है कि महाभारत पढ़नी नहीं चाहिए या घर पर नहीं रखनी चाहिए। महाभारत के पहले अध्याय में एक श्लोक है:ब्रह्मन् वेदरहस्यं च यच्चा
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धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय॥ १॥महाभारत के तृतीय खण्ड के भीष्मपर्व के पञ्चविंशोऽध्यायः से श्रीमद्भगवद्गीता का आरम्भ
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स्कन्दपुराण के माहेशवरखण्ड-कुमारिकाखण्ड [2] के अध्याय ६० और ६६ में घटोत्कच विवाह और उनके पुत्र बर्बरीक के बारे में बहुत विस्तार से बताया गया है। बर्बरीक के बारे में
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बहुत से मानवों को एक संशय रहता है कि भगवान आखिर है कहाँ? विज्ञान इसे सिद्ध क्यों नहीं करता? ब्रह्मपुराणम् के प्रथमोऽध्यायः (१) के शुरू में ही एक श्लोक है:आधारभूतं वि
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स्कन्दपुराण के कार्तिकमास माहात्म्य में बताया गया है कि महर्षि कर्दम की दृष्टि मात्र से तृणविन्दु की कन्या देवहूति के गर्भ से ‘जय’ और ‘विजय’ नाम के दो पुत्रों का जन्
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भगवान् श्रीकृष्ण को सुदर्शन चक्र की प्राप्ति की कहानी हिन्दू पौराणिक कहानीओं में एक महत्वपूर्ण और रोचक प्रसंग है। इसकी प्राप्ति के बारे में विभिन्न पुराणों और ग्रंथो
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ब्रह्मपुराणम् के दो भाग हैं, एक का नाम पूर्वभागः और दूसरे का नाम उत्तरभागः है। पूर्वभागः के अध्याय संख्या ७२ ‘शिवविवाह’ के अंर्तगत कथा में गंगा की उत्पत्ति के बारे म
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श्रीकृष्ण के जीवन में श्रीराधा का क्या स्थान है ये वही जानते हैं जो श्रीराधा को जानते हैं, भजते हैं। शास्त्रों में श्रीराधा का नाम लेने के पश्चात ही कृष्ण कहने को कह
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तिरुपति मंदिर में दर्शन के बाद जो प्रसाद दिया जाता है उसमें पशुओं की चर्बी इत्यादी का मिलना इतना बढ़ा अपराध है कि उसका पश्चाताप पुराणें में है ही नहीं। क्योंकि वराह
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तिरुपति मंदिर में दर्शन के बाद जो प्रसाद दिया जाता है उसमें पशुओं की चर्बी इत्यादी का मिलना कितना बड़ा पाप है, आइये देंखें कि इस बारें में पुराण क्या कहते हैं?
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पुराणों में वर्णित ५० करोड़ योजन में फैले हुए ज्योतिपुंज अपने धाम गोलोक से चल कर जब पृथ्वी का दुःख दूर करने के लिए साँवला रूप बनाकर, सिर पर मोरपंख लगाकर श्रीकृष्ण मा
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ये प्रश्न कई बार कई लोगों के हृदय में उठता होगा। शास्त्रों में इस का उत्तर कई बार कई जगह पर दिया हुआ है। सर्वप्रथम सर्वमान्य भगवद् गीता के अध्याय ९ की श्लोक संख्या ४
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अब वापिस हम अपने श्रीकृष्ण पर आते हैं। सर्वप्रथम हमें ये जानना चाहिए कि कृष्ण का स्वरूप क्या है? वे दिखते कैसे हैं? हमारे शास्त्रों में श्रीकृष्ण के रूप का बहुत ही स
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साल के अंत के साथ ही मैनें अब पुराण, वेद इत्यादि सारे धार्मिक ग्रंथ पढ़ने का मन बना लिया था। मेरे पास अब क्षितिज ने कोई काम करने को छोड़ा ही नहीं, जो मैं कहता हूँ वह
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विद्वान् पुरुष को चाहिये कि अपने शरीर के पैर से ले कर सिर तक चौबीस स्थानों में पहले गायत्री के अक्षरों का न्यास करे। इसके इस प्रयास से उसे परम शान्ति का अनुभव होगा।
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कृष्ण कौन हैं? इसका उत्तर शब्दों में देना बहुत कठिन है। वे अनन्त हैं, कृष्ण को केवल भगवान नहीं कहा जा सकता। अगर ऐसा होता तो उन अजन्मे और अखिलात्मा को बार-बार इस पृथ्
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कृष्ण भगवान हैं, सर्वशक्तिमान हैं, कुछ भी कर सकते हैं, कोई भी संकट उन पर आ ही नहीं सकता; इस बात की सच्चाई को कई बार माता यशोदा ने बहुत नजदीक से देखा और महसूस किया था
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जब नन्दराज जी ने बालक श्रीकृष्ण को राधाजी को सौंप दिया तो वह उन्हें लेकर वन में प्रवेश कर गईं। आसमान में मेघ का दारुण गर्जन गूँज ही रहा था, वज्र जैसा निनाद हो रहा था
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