1 अक्टूबर 2026 · डॉ. राजेश तकयार

मानव-जन्म का रहस्य

मानव-जन्म का रहस्य

कर्म, सन्यास और भक्ति के बारे में बहुत कुछ जान लेने के उपरांत अर्जुन भगवान् कृष्ण से पूछते हैं कि हे माधव! अगर कोई मानव भक्ति करते हुए, अच्छे कर्म करते हुए मृत्यु को प्राप्त हो गया हो और उसकी भक्ति, उसके कर्म अच्छे तो थे पर अभी उस स्थान पर नहीं पहुँचें थे कि उसे मोक्ष मिल सके। तो ऐसे में क्या उसका इस जीवन में सब अच्छा किया हुआ, बेकार हो जाएगा ? उसके प्रभु-प्रेम का कोई मूल्य उसे नहीं मिलेगा ? फिर भक्ति का क्या लाभ।

तब भगवान् इस प्रश्न का उत्तर देते हुए कहते हैं:

पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते। न हि कल्याणकृत् कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति ॥ ६-४० ॥

तब केशव मुस्कुरा कर कहते हैं कि नहीं पार्थ ऐसा नहीं है। जिस प्रकार से किसी खुशबू वाले फूल के पास से जब वायु आगे निकलती है तो वह उस फूल की कुछ खुशबू भी अपने साथ ले लेती है, उसी प्रकार से आत्मा भी उस मानव के जीवन में किए अच्छे कर्मों का सत्, सारांक्ष अपने साथ ले लेता है। अच्छे कर्मों के कारण, की गई भक्ति के कारण उस मानव को पहले तो स्वर्ग सुख भोगना होगा, पापों की सज़ा भोगनी होगी और फिर उसे जो नया जीवन मिलेगी उसमें बहुत सारी सुविधाएँ शुरु से ही साथ में मिलेंगी। अगले जीवन में उसे संघर्ष कम करना होगा क्योंकि उसके पास जीवनोपयोगी बहुत कुछ पहले से ही मिल गया है।

अब यह उस पर फिर से निर्भर करता है कि वह उन सुविधाओं का उपयोग भक्ति से करता है या अहंकार-भाव से करता है। वही नये किए कर्म उसके जीवन की दिशा तय करेंगे। कई मानव सोचते हैं कि मेरे पास साधनों की बहुत कमी है, मुझे भोजन के लिए भी इतना प्रयास करना पड़ रहा है जबकि मेरा मित्र, बंधु या भाई के पास तो ईश्वर ने सब कुछ दिया है पर मेरे संग यह अन्याय क्यों ?

उत्तर बहुत सीधा और स्पष्ट है कि उसके पिछले जीवन के कर्म अच्छे नहीं रहे थे, इसी लिए उसे ये असुविधा वाला जीवन मिला है। उसे फिर से परिश्रम करना होगा, भक्ति में लगना होगा, सत्कर्मों पर ध्यान रखना होगा और परमात्मा पर विश्वास रखना होगा। ये सब यहीं पर समाप्त नहीं होता, इसका असर उसके परिवार पर भी रहता है। जो मानव अच्छे कर्म करता हुआ, ईश्वर की भक्ति करता हुआ पूर्ण मोक्ष का अधिकारी नहीं बन पाया पर मृत्यु को प्राप्त हो गया तो उसका जन्म किसी सुविधा वाले, सम्पन्न परिवार में ही होगा। प्रकृति के नियम उसे दरिद्रता वाले परिवार में जन्म क्यों देंगे? लेकिन जिसने पहले जन्म में भी कुछ नहीं किया; राजसिक और तामसिक गुणों में जीवन बिताया, सत्त्व गुण उसने छुए ही नहीं तो उसे इस नए जीवन में जीवन की कठिनाइयाँ सहनी ही पड़ेगी। नियम, मानव हो या देवता सबके लिए बराबर हैं।

अगर कोई आस-पास किसी सम्पन्नता-सुविधा वाले परिवार को देखे तो उसे समझ जाना चाहिए कि उस परिवार के लोगों का जीवन किसी पक्षपात के कारण नहीं, इस कारण सुखी है कि उन सब सदस्यों ने अपने पिछले जन्म में बहुत अच्छे कर्म ईश्वर भक्ति के संग किए हैं। हाँ, वह इस जन्म में जो कर रहे हैं उसका परिणाम आना अभी बाकी है। ऐसा देखने वाले को कर्म और भक्ति केवल अपनी चिन्ता करते हुए तुलना छोड़ कर, केवल सत्त्व कर्म वाले ही करने चाहिए, इसी में उसकी भलाई होगी।

न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन । नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि ॥ ३-२२ ॥

संसार, प्रकृति, मानव, देवता और ब्रह्मांड नियमों में बँधें हैं, इसीलिए चलायमान है। अगर नियम टूटने के लिए बने होते तो ये कब का समाप्त हो जाता। और ऐसे नियम केवल मानवता को बचाने के लिए मेरे द्वारा बनाएँ गए हैं। इसे तुम अटल सत्य मानों। इससे सूर्य, चन्द्रमा, वायु, अग्नि, पृथ्वी, देवता, यक्ष और ग्रह आदि सभी बंधे हैं; कोई अछूता नहीं है। और अर्जुन इनमें मैं स्वयं भी बंधा हूँ, मैं भी कर्म करता हूँ। अगर मैं कर्म ना करूँ तो ये सृष्टि समाप्त हो जाएगी। इसी कारण मैं कर्म करने को कहता हूँ। फल की इच्छा से रहित होकर कर्म करने को कहता हूँ। क्योंकि फल या आसक्ति आते ही अंहकार आ जाएगा, जो बड़े-से-बड़े पंडित ज्ञानी को भी निगल जाता है। इससे कोई देवता भी अछूता नहीं है।

श्रीकृष्ण यह भी कह रहे हैं कि किसी भी मानव का किया हुआ कर्म या की हुई भक्ति का प्रयास कभी भी व्यर्थ नहीं जाता। उसे साधना के आधार पर ही जन्म मिलते हैं। वह दो प्रकार के हैं। पहला सबसे पहले मानव को अपने किए पुण्यों के आधार पर स्वर्ग आदि उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है और वह वहाँ लंबे समय तक सुख भोगता है। इसके बाद वह वापस धरती पर आकर पवित्र और धनी मानव-परिवार में जन्म लेता है। ताकि उसे छोटी आयु यानि बचपन से ही अच्छे आचरण और साधना के लिए अनुकूल माहौल मिल सके। इसकी तुलना में उच्च कोटि का भक्त यदि परिपक्व है तो वह स्वर्ग आदि लोकों का सुख भोगकर ज्ञानी योनियों के यहाँ जन्म लेता है; हाँ ऐसा कठिन बहुत है पर दुर्लभ नहीं है। पिछले जन्म में की गई साधना के कारण उसे आध्यात्मिक बुद्धि और चेतना स्वतः ही प्राप्त हो जाती है। वह एक बार फिर से नया जन्म पाकर मोक्ष पाने के लिए, दोबारा जुट जाता है। यही कारण है कि कुछ मानव जन्म से ही भक्त होते हैं।

और इसके विपरीत जिन मानवों ने पिछले जन्म में भी कुछ नहीं किया केवल तामसिक और राजसिक गुणों की चकाचौंध में जीवन बीता दिया उन्हें इस जन्म में कुछ अधिक भक्ति और अधिक मेहनत करनी होती है। नहीं तो पिछले जन्म की तरह से उनका यह जन्म भी व्यर्थ ही जाएगा। जिसे वह अपने स्वार्थ, लालच, और अहंकार से दूसरों से छीनकर या ना छीनकर इकट्ठा कर रहे हैं वह उनके किसी काम नहीं आने वाला; ईश्वर भक्ति, परोपकार, सेवा, सत्संग और सबसे ज़रूरी अपने बच्चों को अच्छे संस्कार देकर जाना ही कुछ दे सकता है। यही परम लक्ष्य है मानव-जीवन का।

क्या यह लेख उपयोगी लगा?

डॉ. राजेश तकयार

डॉ. राजेश तकयार

लेखक · स्वतंत्र शोधकर्ता

पूरी जीवनी पढ़ें →