मैं कौन हूँ
मैं एक लेखक हूँमुझे आध्यात्मिकता पर लिखना बहुत अच्छा लगता है। ऐसा नहीं है कि मैं कोई इस का विश्लेषक हूँ, बल्कि ये इस लिए है कि जब भी आप आध्यात्मिकता पर सोचते हैं, पढ
लेख पढ़ें →23 सितंबर 2024 · डॉ. राजेश तकयार

यस्य कस्यचिन्मासस्य शुक्लपक्षस्य द्वादशीम् ।
उपोष्य चाष्टभक्तं तु दशैकादशमेव च॥ ११॥
प्रभातायां तु शर्वर्यामुदिते च दिवाकरे ।
पञ्चगव्यं ततः पीत्वा शीघ्रं मुच्यति किल्बिषात् ॥ १०० ॥
आगे भगवान वराह कहते हैं- “हे वसुधे ! जो लोग बिना फूल माला और गन्ध के मेरा पूजन करते हैं वह मृत्यु उपरान्त राक्षस योनि को प्राप्त होते हैं। राक्षस योनि का अर्थ यह है कि वह २१ वर्ष तक अपवित्र जगहों पर रहते हैं। प्रायश्चित के लिए ऐसे मानव को २१ दिन तक मात्र आठ ग्रास भोजन करते हुए उपवास पर रहना होगा। जो ऐसा करता है तो उसका ये धूपदान अपराध समाप्त हो जाता है।”
श्रीवराहदेव आगे कहते हैं – “जो व्यक्ति जूता पहन कर मेरे निकट आते हैं वह १३ वर्ष तक चर्मकार के रूप में जीवन व्यतीत करते हैं। उसके पश्चात सुअर का जन्म लेकर गन्दगी में जीवन बिताते हैं। और उसके पश्चात उन्हें कुत्ते की योनि प्राप्त होती है। जो बिना आवाज किए आकर मुझे अपनी पूजा के लिए उठाता है वह एक जन्म तक बधिर का जीवन बिताता है। अगर वह खुले आकाश के नीचे किसी भी शुक्लपक्ष की द्वादशी को शयन करता है तो वह पाप मुक्त हो जाता है। जो लोग अत्यधिक खाने के कारण मेरे आस-पास की वायु दूषित करते रहते हैं वह लोग भी एक जन्म में श्वान की योनि में जाते हैं, फिर वानर, फिर गीदड़ और फिर बकरा बनते हैं। अगर ऐसा पाप करने वाला तीन दिन तक अन्न का सेवन करें, तीन दिन कन्दमूल खायें, तीन दिन केवल फल खायें और फिर खुले आकाश के नीचे शयन करें तो उसका पाप मिटता है।”
प्रातः काल दातुन करने से शरीर शुद्ध होता है। यह सब श्रीवराहपुराणम् के १३६ अध्याय में लिखा हुआ है।
प्रभातायां तु शर्वर्यां दन्तधावनबोधितः ।
पञ्चगव्यं पिबेच्चैव शरीरपरिशोधनम् ॥ ११६ ॥
(कृष्ण एक सत्यज्ञान पुस्तक के अंश) (लेखक की दूसरी किताब इन्वेंटिंग ड्रीम्स अमेजॉन और फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध है)