कभी किसी प्रिय की तस्वीर देखकर मन प्रसन्न भी होता है और उसके सामने न होने की कमी भी अधिक स्पष्ट हो जाती है। तस्वीर आँखों को रूप देती है, पर सामने उपस्
लेख पढ़ें →6 अक्टूबर 2026 · डॉ. राजेश तकयार
यशोदा का प्रेम: जिसे रस्सी बाँध सकी

माँ की गोद में बैठा एक बालक और सारी सृष्टि के रहस्य को समेटे एक दिव्य व्यक्तित्व—डॉ. राजेश तकयार की पुस्तक कृष्ण एक सत्यज्ञान के ‘यशोदा प्रेम’ अध्याय में ये दोनों छवियाँ एक ही कृष्ण के भीतर मिलती हैं। पाठक के सामने केवल माखन चुराने वाले बालक का लोकप्रिय प्रसंग नहीं आता। वह यह भी देखता है कि यशोदा का प्रेम कृष्ण को अपने घर का बच्चा बना देता है, और कृष्ण उसी संबंध की सहजता को स्वीकार करते हैं। अध्याय में ऊखल से बाँधने, अर्जुन वृक्षों के गिरने, मिट्टी खाने और मुँह में ब्रह्मांड के दर्शन जैसे प्रसंग हैं। इन सबके बीच बार-बार वही प्रश्न लौटता है: प्रेम में किसकी शक्ति बड़ी है—उसकी जिसे अनंत कहा जाता है, या उसके सामने खड़ी माता की?
आँगन का छोटा संसार
पुस्तक कहती है कि जिनका स्वरूप वेद भी पूरी तरह नहीं बाँध सकते, वे यशोदा के आँगन में ऊखल से बँधे हैं। बाहर से यह एक बालक को मिली डाँट का दृश्य है। भीतर से यह वात्सल्य का दृश्य है: माँ को अपना बच्चा प्रिय है, इसलिए वह उसकी शरारत पर रोक भी लगाती है और रोते हुए चेहरे को देखकर स्वयं दुखी भी होती है। अंततः वह उसे खोल देती है। उसके लिए बालक को सदा बाँधे रखना कोई विजय नहीं। वह उसे सिखाना चाहती है और फिर अपने स्नेह में वापस ले लेना चाहती है।
यशोदा का प्रेम किसी बड़े विचार से शुरू नहीं होता। वह घुटनों के बल चलने वाले बच्चे को देखने की प्रतीक्षा में, उसके छोटे हाथों के स्पर्श में, गोद में बैठने की इच्छा में और चेहरे को निहारने में बसता है। लेखक बालकाण्ड के बाल्यवर्णन की पंक्तियों को याद करके माँ कौशल्या के मन से यशोदा के मन की निकटता दिखाते हैं। यह समानता किसी एक कथा को दूसरी से बदलने के लिए नहीं है। वह बताती है कि मातृत्व की भाषा कई कथाओं में एक जैसी कोमल हो सकती है।
माता बच्चे के बड़े होने के क्षणों को केवल विकास की सीढ़ियाँ नहीं मानती। पहली बार चलना, कपड़ा खींचकर जिद करना, चेहरे को अपने हाथों में लेना—उसके लिए प्रत्येक घटना एक संबंध को गहरा करती है। इसीलिए अध्याय में यशोदा का सुख उनकी गोद से जुड़ा है। वे कृष्ण को संसार के लिए कोई सिद्धांत सिद्ध करने को नहीं पकड़तीं; वे अपने कान्हा को अपने पास अनुभव करती हैं। इस निकटता में दिव्यता दूर नहीं जाती, बल्कि घर के भीतर रहने लगती है।
माखन की शरारत और मर्यादा
कृष्ण का माखन खाना और मित्रों के साथ बाँटना उनके बालसुलभ स्वभाव का परिचित रूप है। बच्चे की चंचलता घर को हँसी देती है, पर माँ के लिए मर्यादा भी ज़रूरी है। जब यशोदा उन्हें माखन लेते पकड़ती हैं, डाँटती हैं और ऊखल से बाँधने का प्रयास करती हैं, तब यह संबंध अचानक कठोर नहीं हो जाता। स्नेह और अनुशासन एक ही देखभाल के दो पक्ष बन जाते हैं। बच्चे को यह जानना होता है कि उसकी हर इच्छा तुरंत स्वीकार नहीं होगी; माँ को यह भी जानना होता है कि उसका दंड प्रेम के बाहर न चला जाए।
पुस्तक इस बंधन के पीछे एक आध्यात्मिक संकेत भी रखती है। यशोदा प्रयत्न करती हैं, फिर कृष्ण की लीला के कारण ही रस्सी उनकी कमर तक पहुँचती है। जो प्रकृति के गुणों से नहीं बँधते, वे माता के प्रेम की रस्सी से बँध जाते हैं। इसी से उनका नाम दामोदर जुड़ता है। यदि इसे केवल चमत्कार कहकर आगे बढ़ जाएँ, तो कथा का घरेलू स्पंदन छूट जाएगा। इस प्रसंग की सुंदरता उस सम्मति में भी है जिसके साथ कृष्ण अपनी माता की भूमिका को पूरा होने देते हैं।
यशोदा के लिए उस समय सामने कोई दार्शनिक पहेली नहीं थी। सामने उनका नटखट बच्चा था, जिसके व्यवहार पर उन्हें कुछ कहना था। कृष्ण भी इसी संबंध के भीतर हैं। बड़ी आध्यात्मिक व्याख्या पाठक बाद में सोच सकता है, पर माँ पहले माँ बनी रहती है। शायद इसी कारण यह प्रसंग इतना प्रिय है: प्रेम अपनी पहचान खोए बिना दिव्यता से मिल सकता है। यशोदा को अपने बच्चे से प्रेम करने के लिए उसके पूरे विश्वरूप का ज्ञान होना आवश्यक नहीं।
ऊखल के साथ बाहर निकला बालक
माता यह कहकर अपने काम में लगती हैं कि यदि शक्ति है तो स्वयं छूटकर दिखाओ। पुस्तक के अनुसार कृष्ण ऊखल को खींचते हुए आँगन के बाहर जाते हैं। फिर वह दो साथ खड़े अर्जुन वृक्षों के बीच अटक जाता है और उनके खींचने पर वे वृक्ष गिर पड़ते हैं। व्रज के लोग चकित रह जाते हैं। वे एक बालक को मृत्यु के समीप से लौटता हुआ समझते हैं। उस क्षण किसी को लीला का पूरा अर्थ नहीं दिखाई देता; सबसे पहले उन्हें बच्चे की कुशलता की चिंता होती है।
यहाँ व्रजवासियों की प्रतिक्रिया कथा को मानवीय धरातल देती है। पाठक जानता है कि कृष्ण दिव्य हैं, पर माँ की धड़कन को इस ज्ञान से मिटाया नहीं जा सकता। यशोदा के लिए ऊखल और गिरते वृक्ष कोई विचार-विमर्श का विषय नहीं, अपने बच्चे की सुरक्षा का प्रश्न हैं। प्रेम में भय भी शामिल होता है। किसी प्रिय को संकट में देखकर हमारा पहला भाव उसे बचाने और अपने समीप रखने का होता है। अध्याय इस भाव को दिव्य कथा के बीच सम्मान देता है।
नन्द बाबा का कृष्ण को ऊखल से मुक्त कर लेना और उन्हें गोद में लेना, जैसे खोया हुआ बालक वापस मिलने का दृश्य है। कृष्ण के बल का संकेत वृक्षों के प्रसंग में प्रकट होता है, पर घरवालों के लिए वे वही लाड़ले हैं। दो स्तर साथ चलते हैं। आध्यात्मिक पाठक उसमें अनंत सामर्थ्य देख सकता है; परिवार की आँख में वह बच्चे का सुरक्षित लौट आना है। दोनों दृष्टियों को साथ रखे बिना कथा की पूरी संवेदना समझना कठिन है।
मुँह में दिखा ब्रह्मांड
अध्याय का एक और प्रसंग यमुना के किनारे का है। दूसरे बालक यशोदा से कहते हैं कि कृष्ण ने मिट्टी खाई है। माँ पहले अपने कान्हा पर सहज विश्वास करती हैं, फिर बलराम से पूछती हैं। कृष्ण से उनका मुँह खोलने को कहा जाता है। पुस्तक के वर्णन में वह खुला मुँह किसी साधारण बालक का मुँह नहीं रह जाता; यशोदा वहाँ अनेक लोकों और समूचे ब्रह्मांड का दर्शन करती हैं। यह अनुभव उनकी परिचित दुनिया को एक क्षण के लिए बदल देता है।
इस दृश्य की शक्ति उसका विस्तार और निकटता दोनों हैं। जिन हाथों से माँ बच्चे का चेहरा पकड़ती है, उन्हीं के बीच उन्हें असीम की झलक मिलती है। पर बाद में उन्हें घर लौटना है, उसे खिलाना है और उसकी चिंता करनी है। दिव्य दर्शन माँ की दैनिक जिम्मेदारी को समाप्त नहीं करता। वह उनके प्रेम के भीतर एक आश्चर्य जोड़ता है। कृष्ण की विशालता देखकर भी माता का संबंध उनसे बचपन की भाषा में बना रहता है।
कई बार हम सोचते हैं कि आध्यात्मिक अनुभव का अर्थ अपने साधारण संबंधों से ऊपर उठ जाना होगा। यशोदा की कथा उलटा प्रश्न करती है: क्या महानता हमारे सबसे पास के संबंध को और सावधान बना सकती है? यदि सृष्टि का रहस्य सचमुच किसी बच्चे की मुस्कान के साथ उपस्थित हो, तो उसे देखने के बाद बच्चे के प्रति हमारी सजगता कम कैसे हो सकती है? अध्याय के घरेलू दृश्यों में यह प्रश्न शांत ढंग से गूँजता है।
जन्म से पहले की चाह
लेखक यशोदा को मिले इस निकट संबंध के पीछे द्रोण और धरा के तप का प्रसंग भी देते हैं। दोनों हरि के भक्त थे और संतान की अभिलाषा रखते थे। वे ब्रह्माजी से अनुमति लेकर कठिन तप करते हैं। पुस्तक की धार्मिक कथा के भीतर यह तप लंबे समय की इच्छा, प्रतीक्षा और समर्पण को प्रकट करता है। यशोदा-कृष्ण का संबंध अचानक मिला हुआ वरदान भर नहीं; उसके पीछे प्रेम की एक पुरानी प्रार्थना भी दिखाई जाती है।
इस प्रसंग को पढ़ते हुए प्रत्येक माता-पिता की परिस्थिति पर कोई नियम लागू करना उचित नहीं होगा। कथा किसी परिवार के सुख-दुख का हिसाब बताने के लिए नहीं लिखी गई है। यह उस भक्तिपरंपरा की कथा है जिसमें ईश्वर को अपनी गोद में पाने की लालसा का रूप दिया गया है। किसी को अपना कह पाने की इच्छा और फिर उस संबंध को दिन-प्रतिदिन निभाना—यशोदा के व्यवहार में उसी का फल दिखाई देता है।
प्रेम की रस्सी क्या सिखाती है
रस्सी का रूपक हमें बाँधने और जोड़ने का अंतर समझाता है। सामान्य बंधन किसी की स्वतंत्रता छीन सकता है। यशोदा की रस्सी भी कथा में अनुशासन का साधन है, इसलिए उसके भीतर माँ की जिम्मेदारी बनी रहनी चाहिए। पर लेखक इसे जिस तरह देखते हैं, वहाँ निर्णायक शक्ति भय नहीं, स्नेह है। कृष्ण अपनी माता से विमुख नहीं होते; वह संबंध उनकी लीला का प्रिय स्थान बनता है। प्रेम तब पकड़ से अधिक एक-दूसरे को स्थान देने का नाम हो जाता है।
दैनिक जीवन में इस कथा को पढ़ते समय बच्चे पर अधिकार जताने का बहाना नहीं बनाना चाहिए। माता यशोदा के प्रसंग की गरिमा इस बात में है कि डाँट के बाद भी उनका हृदय बच्चे के रोने पर द्रवित होता है। शिक्षा देने वाले संबंध में कोमलता खो जाए तो वह केवल नियंत्रण बन सकता है। इस अध्याय से मिलने वाली प्रेरणा बच्चे की सुरक्षा, उसकी चंचलता को समझने और सीमा तय करते समय भी उसके सम्मान को बनाए रखने की है।
वात्सल्य का दूसरा पाठ उपस्थित रहने का है। माता बच्चे के बढ़ने की प्रतीक्षा करती है, उसके शब्द सुनना चाहती है, छोटी-छोटी हरकतें देखती है। अक्सर हम बड़े क्षणों को याद रखकर छोटे क्षणों को भूल जाते हैं। लेकिन किसी संबंध का अधिकांश जीवन इन्हीं साधारण मिनटों से बनता है। यशोदा और कृष्ण की कथा घर के आँगन को उपासना की भूमि जैसा बना देती है, क्योंकि वहाँ प्रेम लगातार व्यवहार में उतर रहा है।
एक और बात ध्यान देने योग्य है: यशोदा को हर क्षण पूर्ण ज्ञान नहीं चाहिए। उन्हें कभी बालक की शरारत दिखाई देती है, कभी खतरा, कभी ब्रह्मांड का दर्शन। उनकी दृष्टि बदलती है, पर स्नेह की डोर बनी रहती है। जीवन में भी प्रियजन कभी हमें चकित कर देते हैं। हम उन्हें पूरी तरह जान लेने का दावा छोड़कर यदि सुनते, देखते और साथ निभाते रहें तो संबंध अधिक सच हो सकता है। यशोदा का प्रेम इसी विनम्र निकटता का चित्र है।
अंत में ऊखल से बँधे कृष्ण को याद करें। वेद जिनके बारे में प्रश्न करते हैं, वे घर के आँगन में अपनी माँ को देख रहे हैं। माता का हृदय डाँट और दया के बीच चल रहा है। दुनिया कृष्ण की शक्ति का गान कर सकती है; उस क्षण यशोदा उनके आँसू देखती हैं। शायद इसी कारण इस कथा में प्रेम किसी विजय की घोषणा नहीं करता। वह रस्सी खोलता है, बच्चे को गोद में लेता है और उसके साथ घर लौट आता है।









































