11 अक्टूबर 2026 · डॉ. राजेश तकयार
भाग 17 — आत्म-निष्ठा

अर्जुन श्रीकृष्ण से पूछते हैं कि जो लोग शास्त्रीय विधि का पालन नहीं करते, फिर भी श्रद्धापूर्वक उपासना करते हैं, उनकी निष्ठा किस प्रकार की होती है। क्या वह सात्त्विक है, राजसिक है या तामसिक? श्रीकृष्ण बताते हैं कि मनुष्य की श्रद्धा उसके स्वभाव से जुड़ी होती है। प्रकृति के तीन गुणों के अनुसार उसकी श्रद्धा भी तीन प्रकार की होती है। जिस दिशा में उसका गहरा विश्वास और आग्रह है, उसी के अनुसार उसका जीवन बनने लगता है। इसलिए श्रद्धा के साथ विवेक भी आवश्यक है। किसी कार्य के प्रति तीव्र आग्रह होने से ही वह कल्याणकारी नहीं हो जाता। उसके पीछे का भाव, उसकी विधि और उससे होने वाला प्रभाव भी देखना पड़ता है। श्रीकृष्ण ऐसे कठोर तप का उल्लेख करते हैं जो दंभ, अहंकार और हठ से किया जाता है। अपने शरीर को विवेकहीन ढंग से कष्ट देना या दूसरों की हानि की भावना से साधना करना आसुरी निश्चय का रूप है। फिर वे भोजन, यज्ञ, तप और दान के माध्यम से तीनों गुणों का प्रभाव स्पष्ट करते हैं। इससे श्रद्धा का प्रश्न दैनिक जीवन तक पहुँचता है। मनुष्य की निष्ठा उसके छोटे-छोटे चुनावों में भी प्रकट होती है। सात्त्विक प्रवृत्ति को ऐसा भोजन प्रिय होता है जो जीवन, शक्ति, प्रसन्नता और संतुलन को सहारा दे। राजसिक रुचि अत्यधिक तीखेपन और उत्तेजना की ओर जाती है। तामसिक रुचि अशुद्ध, रसहीन और बिगड़े हुए भोजन की ओर झुकती है। यज्ञ में भी भाव का अंतर है। कर्तव्य समझकर, उचित विधि से और फल की इच्छा छोड़कर किया गया यज्ञ सात्त्विक है। लाभ या प्रदर्शन के लिए किया गया यज्ञ राजसिक है। श्रद्धा और आवश्यक मर्यादा से रहित कर्म तामसिक हो जाता है। श्रीकृष्ण तप को शरीर, वाणी और मन के तीन क्षेत्रों में समझाते हैं। शरीर का तप आदर, शुद्धता, सरलता, संयम और अहिंसा से जुड़ा है। साधना का प्रभाव देह के व्यवहार में भी दिखाई देना चाहिए। वाणी का तप सत्य, प्रिय और हितकारी शब्दों में है। ऐसा बोलना जो अनावश्यक उद्वेग न पैदा करे, तथा स्वाध्याय का अभ्यास करना इसका अंग है। सत्य बोलते समय भी उसके साथ विवेक और हित का भाव बना रहना चाहिए। मन का तप प्रसन्नता, सौम्यता, मौन, आत्मसंयम और भावों की शुद्धता में है। भीतर लगातार द्वेष और अशांति हो तो केवल बाहरी संयम साधना को पूर्ण नहीं करता। मन के संकल्पों को भी शुद्ध करना पड़ता है। जब ये तीनों तप श्रद्धा से और फल की इच्छा के बिना किए जाते हैं, तब सात्त्विक होते हैं। सम्मान और प्रतिष्ठा पाने की इच्छा उन्हें राजसिक बना देती है। मूढ़ हठ और हानि की भावना उन्हें तामसिक दिशा में ले जाते हैं। दान की भी यही परीक्षा है। उचित समय और स्थान पर, योग्य पात्र को, बिना बदले की अपेक्षा और सम्मानपूर्वक दिया गया दान सात्त्विक है। देने वाला अपने कर्तव्य को पहचानता है और प्राप्त करने वाले की गरिमा बनाए रखता है। प्रतिफल की आशा से या मन पर बोझ मानकर दिया गया दान राजसिक है। अनुचित ढंग से और तिरस्कार पूर्वक दिया गया दान तामसिक है। इस प्रकार एक ही बाहरी कार्य उसके भीतर के भाव के कारण अलग दिशा ग्रहण कर सकता है। श्रीकृष्ण ‘ॐ’, ‘तत्’ और ‘सत्’ को ब्रह्म के संकेत बताते हैं। ये साधक को परम आधार, फल त्याग और सत्य में निष्ठा का स्मरण कराते हैं। यज्ञ, तप और दान में स्थिरता तथा शुभ भाव का महत्व है। अंत में वे कहते हैं कि श्रद्धा के बिना किया गया अर्पण, तप या दान असत् कहलाता है। आत्म निष्ठा की सच्चाई भीतर और बाहर के मेल में है। मन की श्रद्धा, वाणी की शुद्धता और कर्म का विवेक जब एक दिशा में चलते हैं, तभी साधना जीवन को भीतर से बदलती है। लेखक ने इसका विस्तार अपनी निम्न पुस्तक में 72,408 शब्दों में किया है। श्रीमद्भगवद्गीता — भाग 17 — आत्म-निष्ठा