27 अक्टूबर 2026 · डॉ. राजेश तकयार
कर्म के बीच ईश्वर-स्मरण

घर, काम और जिम्मेदारियों से भरा जीवन देखकर कई लोग सोचते हैं कि अध्यात्म के लिए अलग समय और अलग संसार चाहिए। आठवें भाग का यह प्रसंग दोनों को एक साथ देखने की दिशा देता है। कृष्ण अर्जुन को स्मरण के साथ कर्म करने के लिए कहते हैं। हमारे लिए प्रश्न बनता है: काम करते हुए मन की दिशा और नीयत कैसे सँभाली जाए?
स्मरण का भीतरी अर्थ
स्मरण का अर्थ केवल नाम लेना नहीं है, वह अनुभव से होता है। स्मरण शब्द बहुत सरल है, पर इसका अर्थ गहरा है। स्मरण का अर्थ केवल याद रखना नहीं, बल्कि जुड़ जाना है। जैसे कोई मानव किसी प्रिय को याद करता है, तो वह केवल उसके चेहरे की कल्पना नहीं करता, बल्कि उसके साथ जुड़े भाव को महसूस करता है, ऐसे ही मुझ से जुड़ना है। वास्तविक स्मरण में भावनात्मक जुड़ाव, मानसिक एकाग्रता और आंतरिक अनुभव; तीनों एक साथ आने चाहिए। जब कोई किसी चीज़ को बार-बार याद करता है, तो वह उसकी चेतना का हिस्सा बन जाती है। जैसे कोई संगीतकार अपने वाद्य को रोज़ बजाता है; शुरुआत में उसे वह मेहनत लगती है, पर धीरे-धीरे उसकी उंगलियाँ अपने आप सुर पकड़ लेती हैं। उसी प्रकार, जो मानव हर क्षण स्मरण का अभ्यास करता है, उसका मन धीरे-धीरे स्थिर हो जाता है। उसे अपने भीतर एक शांत साक्षी बैठा मिलता है जो कहता है, मैं उपस्थित हूँ, मेरे भगवान् मेरे पास हैं। यही उपस्थितता स्मरण है। यही अभ्यास मृत्यु के समय काम आता है। उस समय शरीर साथ नहीं देता, आवाज़ नहीं निकलती, सांस धीमी हो जाती है, पर अगर मन ने जीवन भर स्मरण का अभ्यास किया है, तो वह सहज रूप से उसी चेतना में टिक जाता है। जो जीवन भर भूलता रहा, वह उस समय याद नहीं कर पाता। इसलिए स्मरण अभी से करो, ये केवल एक आदेश नहीं, बल्कि जीवन जीने का तरीका है। परंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि योद्धा अपना कर्तव्य भूल जाए और समय आने पर युद्ध से ही मुंह मौड़ ले।
स्मरण और कर्म दोनों एक साथ करना क्यों आवश्यक है? मैंने पहले भी बताया है कि अक्सर कुछ मानव सोचते हैं कि स्मरण का अर्थ है संसार छोड़ देना, पहाड़ों में जाकर बैठ जाना या घर-परिवार से दूर रहना। पर यह धारणा गलत है। स्मरण और कर्म विरोधी नहीं हैं, वे एक-दूसरे के पूरक हैं। जीवन को अर्थ तभी मिलता है जब कोई कर्म करते हुए भी स्मरण बनाए रखें। परिवार की देखभाल करते हुए, निर्णय लेते हुए; स्मरण करते रहना, यही तो जीवन का कर्म है। यदि कोई हर कर्म के पीछे यह जागरूकता रखें कि मैं यह कार्य ईमानदारी से कर रहा हूँ, मेरे भीतर जो चेतना काम कर रही है, वही ईश्वर का अंश है, तो वही कर्म कर्मयोग बन जाता है। तब काम बोझ नहीं रहता, पूजा बन जाता है। किसी भी मानव का स्मरण उसके कर्म के बीच भी रह सकता है। इसलिए मैंने कहा है कि युद्ध भी कर, और मुझे भी याद रख। अर्थात्, जीवन का संघर्ष छोड़ो मत, लेकिन उसमें डूब भी मत। लड़, काम कर, सपने पूरे कर, लेकिन भीतर यह जान कि तू केवल साधन है; करने-कराने वाला कोई और है। जब यह भाव आता है, तब स्मरण और कर्म दोनों एक साथ प्रवाहित होते हैं। जब कोई किसी कार्य में पूरे मन से होता है, तो उसके भीतर जो मैं है, वह धीरे-धीरे पिघलने लगता है। यह पिघलना ही स्मरण की साधना है। मृत्यु का क्षण हर किसी के लिए आता है। कोई उससे डरता है, कोई उसे टालता है, पर कोई-कोई ही उसे स्वीकार करता है। जो मानव मृत्यु से डरता है, वह वास्तव में जीवन से अनजान है। जो जीवन के हर क्षण को जागरूकता से जीता है, उसके लिए मृत्यु भय नहीं, बल्कि वही एक प्रवेश द्वार बन जाती है। मृत्यु के समय शरीर ढीला पड़ जाता है, इंद्रियाँ काम करना बंद कर देती हैं। परंतु चेतना, जो भीतर जल रही होती है, वह वैसी ही रहती है, जैसी जीवन में थी। यदि वह चेतना अशांत रही, भयभीत रही, आसक्त रही, तो मृत्यु के समय वही अशांति आगे ले जाती है। पर यदि जीवन भर उसने स्मरण किया, तो उस क्षण भी वह स्थिर रहती है। स्मरण मृत्यु की तैयारी नहीं, जीवन की पूर्णता है। जब कोई मानव जीवन भर स्मरण करता है अर्थात जागरूक रहता है, अपने कर्मों में प्रेम रखता है, मन को शांत रखता है, तो उसके भीतर एक आंतरिक प्रकाश जगता है। मृत्यु उस प्रकाश को बुझा नहीं सकती, क्योंकि वह किसी शरीर पर नहीं, आत्मा पर आधारित है। जिसने जीते-जी हर क्षण को ध्यान, प्रेम और सत्य के साथ जिया, उसके लिए मृत्यु केवल शरीर का परिवर्तन है। वह जैसे सोते समय दिन के बोझ को उतारता है, वैसे ही मृत्यु में शरीर का बोझ उतार देता है। स्मरण इस परिवर्तन को सहज बना देता है।
कर्तव्य के साथ साधना
हर कोई चाहे तो स्मरण का अभ्यास कर सकता है। इसके लिए किसी आश्रम या गुरु की आवश्यकता नहीं; बस अपने भीतर ईमानदारी चाहिए। सुबह उठते ही पहले एक सांस गहरी लेकर अगर कोई कहता है कि मैं जीवित हूँ, मैं जागरूक हूँ। यह एक छोटा-सा कदम दिन की दिशा बदल देता है। और कुछ नहीं सोचना। बस मन में कहना है कि मैं उपस्थित हूँ। यह विराम मानसिक बोझ घटाता है और धीरे-धीरे स्थिरता लाता है। ध्यान को कहीं से वापस लाना ही वास्तविक ध्यान है। सोने से पहले विचार करना, दिन भर में जो हुआ, उसे शांत मन से देखना कि किस समय मैंने स्मरण खोया, कब पाया? यह आत्मदर्शन धीरे-धीरे जीवन की दिशा बदल देता है। जब किसी से बात करो, तो वास्तव में सुनो। जब कुछ दो, तो दिल से दो। यह प्रेम ही स्मरण का रूप है। इसी से आंतरिक परिवर्तन आते हैं। जब कोई मानव जीवन के हर क्षण में स्मरण रखता है, तो उसके भीतर धीरे-धीरे कई परिवर्तन आते हैं। मन स्थिर होता है, छोटी-छोटी बातों से क्रोध नहीं आता। निर्णय स्पष्ट होते हैं, क्योंकि मन शुद्ध होता है। भय कम होता है, क्योंकि भीतर सुरक्षा का भाव आता है। संबंध मधुर होते हैं, क्योंकि वह दूसरों को भी उसी चेतना का अंश मानने लगता है। मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है, क्योंकि जीवन का हर क्षण अर्थपूर्ण बन गया है। इन परिवर्तनों को कोई बाहर से नहीं देख सकता, पर कर्मयोगी स्वयं महसूस करता है। वह जानता है कि अब वह पहले जैसा नहीं रहा, उसका मन हल्का, हृदय खुला और विचार निर्मल हो गए हैं। तभी अंत समय में ये सब किया काम आएगा और वह मेरा ध्यान कर पाएगा।
‘तस्मात् सर्वेषु कालेषु माम् अनुस्मर’, अर्थात् हर समय स्मरण करना चाहिए। भगवान् कह रहे हैं कि केवल मृत्यु के समय नहीं, हर समय मेरा स्मरण करो। यह निरन्तर स्मरण ही भक्ति की चरम अवस्था है। निरन्तर स्मरण जैसे सतत नाम-जप, ईश्वर-चिन्तन, आत्मसमर्पण। भक्त का हृदय भगवान् की उपस्थिति का अखण्ड अनुभव बन जाता है। योग में इसे ही स्मृति-साधना कहा है, जब मन निरन्तर एक ही चिन्तन में टिका रहता है। जैसे दीपक की लौ वायु में भी स्थिर रहती है, वैसे ही साधना करने वाले का मन संसार के तूफ़ानों में भी ईश्वर-स्मरण में स्थिर रहता है।
‘युध्य च’ अर्थात् कर्म करते रहना ज़रूरी है। इस कारण भगवान् योगमाया अर्जुन से कह रहे हैं कि तू युद्ध भी कर। अर्थात् कोई भी अपना कर्तव्य-कर्म करते हुए भी भगवान् को स्मरण कर सकता है। कर्म से भागना नहीं, उसे ईश्वर-अर्पण बनाना; यह निष्काम-कर्मयोग है, जहाँ कर्ता स्वयं को नहीं, ईश्वर को कर्ता मानता है। यह अध्यात्म और व्यवहार के बीच पुल है। इस प्रकार कोई भी गृहस्थ, कर्मी, विद्वान; सब अपने कार्य करते हुए ईश्वर-स्मरण रख सकते हैं।
मन और बुद्धि का समर्पण
‘मय्यर्पितमनोबुद्धिः’ अर्थात् मन और बुद्धि का समर्पण करना चाहिए। मन, भावनात्मक क्षेत्र है। बुद्धि, विचारों का निर्णय क्षेत्र है। दोनों जब भगवान् में अर्पित हो जाएँ, तो जीवन स्वतः योगमय हो जाता है। भक्ति में मन और बुद्धि का कार्य है मन को भगवान् की लीलाओं में रमाना। यह भक्ति है। बुद्धि को भगवान् की योजना में समर्पित करना, ये ज्ञान है। जब मन-बुद्धि का समर्पण होता है, तो कर्म कर्तृत्व-अहंकार से मुक्त होता है। अहं कर्ता नहीं, ईश्वर निमित्त हूँ; यही भाव मानव के कर्म को पूजा बना देता है।
किसी यात्रा की तैयारी के लिए कई दिन पहले समय देना होता है, यही सोच कर नित्य भगवान् को समय देना चाहिए।
अपने दिन में स्मरण के विराम
तीन अवसर चुनें: काम आरंभ करते समय, किसी से कठिन बातचीत से पहले और दिन समाप्त होने पर। एक क्षण रुककर देखें कि मन में क्या चल रहा है। अपना काम ईमानदारी से करने का संकल्प याद करें। बातचीत में सामने वाले को सुनने की तैयारी रखें। शाम को देखें कि कहाँ सजग रहे और कहाँ भूल गए।
यह अभ्यास जिम्मेदारियों से समय चुराने के लिए नहीं है। इसका उद्देश्य उन्हीं जिम्मेदारियों को अधिक स्पष्ट मन से निभाना है। स्मरण का मूल्य तब दिखेगा जब व्यवहार में धैर्य, निर्णय में विवेक और संबंधों में सम्मान बढ़े। इस तरह काम के बीच भी साधना के लिए स्थान बन सकता है और गृहस्थ जीवन आध्यात्मिक अभ्यास की भूमि बन जाता है।