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24 अक्टूबर 2026 ·

कर्तव्य के बीच त्याग

कर्तव्य के बीच त्याग

कर्तव्य के बीच त्याग का प्रश्न

जब त्याग का नाम लिया जाता है, तब बहुत बार सबसे पहले कुछ छोड़ देने का विचार आता है। घर छोड़ना, काम छोड़ना या उन लोगों से दूर चले जाना जिनके लिए हम उत्तरदायी हैं, त्याग का बाहरी रूप प्रतीत हो सकता है। लेकिन श्रीमद्भगवद्गीता के भाग अठारह में अर्जुन का प्रश्न हमें भीतर की ओर देखने को कहता है। उन्होंने संन्यास और त्याग का भेद जानना चाहा। भगवान् श्रीकृष्ण के उत्तर में केवल यह निर्णय नहीं है कि कौन-सा काम करना है; उसमें यह भी है कि काम करते समय मन किससे बँधा हुआ है।

मानव अपने हाथों से अनेक काम करता है। परिवार का पालन, ईमानदार आजीविका, किसी की सेवा, सत्य का साथ और समाज के प्रति जिम्मेदारी; ये सब जीवन के बीच उपस्थित होते हैं। यदि मन इनसे थककर कहे कि अब सब कुछ छोड़ देना ही आध्यात्मिकता है, तो उसे पहले अपनी प्रेरणा देखनी चाहिए। क्या उसने वास्तव में लोभ और अहंकार छोड़ा है, या केवल उस काम से दूर जाना चाहता है जो उससे परिश्रम माँगता है? काम का स्थान बदल जाने से भीतर की कामना अपने-आप नहीं बदलती।

मैं त्याग को निष्क्रियता का नाम नहीं दे सकता। देहधारी होकर सभी कर्मों को छोड़ देना संभव नहीं, यह बात भाग अठारह में स्पष्ट की गई है। प्रश्न यह नहीं कि शरीर और जीवन को कर्म से अलग कैसे किया जाए। प्रश्न यह है कि कर्म को बंधन बनाने वाली फल-लालसा, अपना यश बढ़ाने की इच्छा और स्वयं को सबका अकेला कर्ता मानने का भाव कैसे पहचाना जाए। इन्हें साथ लेकर किया गया पुण्य दिखने वाला कार्य भी भीतर हिसाब-किताब बन सकता है। इन्हें छोड़कर किया गया सामान्य कर्तव्य साधना का रूप ले सकता है।

यहीं से एक दूसरा प्रश्न उठता है: जिस काम को मैं त्यागने की बात कर रहा हूँ, वह मेरे जीवन का धर्मसम्मत उत्तरदायित्व है या किसी इच्छा को पूरा करने का साधन? इन दोनों को एक नाम दे देने से निर्णय धुँधला हो जाता है। आवश्यक कर्म को केवल इसलिए छोड़ देना कि वह कठिन है, और इच्छाओं से प्रेरित कर्म को केवल इसलिए पकड़े रहना कि वह सुख देता है; दोनों में मन अपनी सुविधा का अनुसरण करता है। सच्चे विवेक में बाहरी कर्म के साथ उसकी भीतरी प्रेरणा भी देखी जाती है।

कर्म और कामना में भेद

अर्जुन के प्रश्न के उत्तर में भगवान् श्रीकृष्ण कामना से किए जाने वाले कर्मों के परित्याग को संन्यास से और कर्मों के फल का त्याग करने को त्याग से जोड़ते हैं। यह अंतर बहुत सूक्ष्म है। कोई व्यक्ति दिन भर सक्रिय रहकर भी फल की चिंता में इतना डूब सकता है कि उसका हर काम लाभ और हानि की गणना बन जाए। दूसरा व्यक्ति उतने ही मनोयोग से काम करे, किन्तु अपने कर्तव्य की शुद्धता पर ध्यान रखे और परिणाम को अपनी पहचान न बनाए। बाहर से दोनों कर्मशील हैं; भीतर की स्वतंत्रता एक जैसी नहीं है।

फल का त्याग काम के प्रति लापरवाही का नाम नहीं है। जो फल की आसक्ति छोड़ता है, वह यह नहीं कहता कि अब मुझे अपने काम की गुणवत्ता से कोई मतलब नहीं। वह जितना उसके हाथ में है, उसे पूरे मन, विवेक और ईमानदारी से करता है। पर वह यह दावा नहीं करता कि परिणाम केवल उसी की इच्छा से बनेगा। दूसरों की भूमिका, समय और परिस्थिति भी किसी परिणाम में जुड़ते हैं। अपना प्रयत्न छोड़ना त्याग नहीं; परिणाम पर अपना पूर्ण स्वामित्व मान बैठना भी उचित नहीं।

मैं इस भेद को अपने साधारण व्यवहार में देख सकता हूँ। यदि किसी की सहायता करके मैं बार-बार उसकी प्रशंसा सुनना चाहता हूँ, तो मेरे भीतर सहायता के साथ मान की चाह भी चल रही है। यदि किसी काम के बाद मेरा मन हर समय केवल इस विचार से भरा है कि मेरा नाम कितना बढ़ेगा, तो काम का उद्देश्य बदल रहा है। इसी प्रकार असफलता की आशंका से सही काम शुरू ही न करना भी फल से बँधे होने का रूप है। आसक्ति केवल प्राप्ति की लालसा में नहीं, परिणाम के भय में भी दिखाई देती है।

इसीलिए कर्म की भीतरी जाँच आवश्यक है। मैं किसलिए कर रहा हूँ? यदि किसी को मेरे काम का ज्ञान न हो, तो क्या मैं फिर भी इसे ठीक तरह करूँगा? परिणाम मनचाहा न मिले, तो क्या मैं सत्य और ईमानदारी को छोड़ दूँगा? ये प्रश्न दूसरों की परीक्षा लेने के लिए नहीं हैं। इन्हें अपने सामने रखने से कर्म और कामना के बीच छिपा हुआ संबंध दिखाई देता है। त्याग का अभ्यास उसी क्षण शुरू होता है जब मैं अपनी प्रेरणा को सजावट के बिना स्वीकार करता हूँ।

इस जाँच का अर्थ अपने प्रत्येक विचार से भयभीत होकर निष्क्रिय हो जाना भी नहीं है। मन में अपेक्षा दिखाई दे तो उसे पहचानकर काम को फिर कर्तव्य की ओर मोड़ना चाहिए। साधना में सजगता आती है, पूर्णता का दिखावा नहीं। जिस व्यक्ति को अपनी प्रशंसा की इच्छा दिख गई, वह उससे अलग होने की दिशा पा सकता है। जिसे अपना भय समझ आ गया, वह डर को निर्णय का स्वामी बनाए बिना आगे बढ़ सकता है। कर्म के बीच यह जागरूकता ही भीतर के त्याग को व्यवहार से जोड़ती है।

जिन कर्मों को छोड़ना नहीं है

श्रीमद्भगवद्गीता में यज्ञ, दान और तप को छोड़ने योग्य नहीं कहा गया। इन्हें करने की बात कही गई है, पर संग और फल की आसक्ति छोड़कर। यह शिक्षा इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि त्याग का अर्थ केवल कमी कर देना नहीं रह जाता। जीवन से उपयोगी और शुद्ध करने वाले कर्म हटाकर मन का अहंकार बचा रहे, तो क्या बदला? दूसरी ओर वही कर्म बिना दिखावे, स्वार्थ और प्रतिफल की गणना के किए जाएँ, तो उनका भाव बदलता है। कर्म बाहर से दिखाई देता है; उसका वास्तविक संस्कार भीतर बनता है।

दान में यह अंतर साफ दिखता है। किसी को सहायता देकर यदि मैं उसके जीवन पर अपना अधिकार मानने लगूँ, तो देने में भी आसक्ति आ गई। यदि सहायता का उपयोग समझूँ, सामने वाले के सम्मान को बचाऊँ और बदले की माँग न करूँ, तो देने का भाव निर्मल हो सकता है। यज्ञ और तप के साथ भी यही सावधानी है। पूजा या अनुशासन केवल दूसरों को दिखाने के लिए हो, तो बाहरी रूप के पीछे मन का व्यापार चलता रहता है। इनके माध्यम से मन को शुद्ध करना है, अपने महत्त्व का प्रदर्शन नहीं।

घर और समाज के सामान्य दायित्वों में भी यही शिक्षा लागू होती है। माता-पिता का परिवार के प्रति ध्यान, संतान का सम्मान, सत्यपूर्ण आजीविका और किसी आवश्यक काम को पूरा करना; इनके लिए मंच की आवश्यकता नहीं। इन्हें निभाते समय मन प्रशंसा चाह सकता है; मन यह भी कह सकता है कि मेरे बिना कुछ नहीं होगा। ऐसे विचार दिखें तो कर्तव्य को हटाना उपाय नहीं है। अपने काम का स्थान समझते हुए उस पर चढ़े हुए अहंकार को हटाना अधिक सच्चा अभ्यास है।

नियत कर्म को निभाने का अर्थ यह भी नहीं कि हर परिस्थिति में बिना समझे वही तरीका अपनाया जाए। धर्मसम्मत उत्तरदायित्व के लिए विवेक, उचित समय और अपनी वास्तविक क्षमता पर ध्यान देना पड़ता है। भाग अठारह की व्याख्या कठिन सेवा को आवश्यकता के अनुसार छोटा और संतुलित करने की बात भी कहती है, लेकिन सेवा-भाव छोड़ने को नहीं। इसलिए कर्म में सावधानी और भीतर अनासक्ति साथ चल सकती हैं। काम को ठीक तरह करना मेरा उत्तरदायित्व है; उससे अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करना मेरा उद्देश्य नहीं होना चाहिए।

कर्म के शुद्ध होने की कसौटी केवल उसका धार्मिक नाम नहीं है। सेवा स्वार्थ का साधन बन सकती है, दान यश का और तप अभिमान का। इसलिए किसी कार्य को यज्ञ, दान या तप कहकर अपने मन की जाँच से छूट नहीं मिलती। श्रीकृष्ण बार-बार संग और फल को छोड़ने की ओर ले जाते हैं। यही प्रश्न हर अच्छे दिखने वाले काम के भीतर रखना होगा: इससे किसी का उचित कल्याण हो रहा है, या मैं उसके सहारे अपने लिए कोई विशेष स्थान माँग रहा हूँ?

कठिनाई से भागना और वास्तविक त्याग

भाग अठारह में नियत कर्म को मोह से छोड़ना तामसिक त्याग कहा गया है। वहाँ कर्म की कठिनाई को सामने रखकर शरीर के कष्ट के भय से उसे छोड़ने को राजसिक बताया गया है। ये भेद केवल शब्दों का अभ्यास नहीं हैं; ये मन के बहानों को पहचानने में सहायक हैं। कभी मैं अपने दायित्व को आध्यात्मिक वैराग्य का नाम देकर दूर कर सकता हूँ। कभी कह सकता हूँ कि यह काम मुझे असुविधा देता है, इसलिए इसे छोड़ना ही उचित है। दोनों स्थितियों में देखना होगा कि मैं क्या छोड़ रहा हूँ; आसक्ति या उत्तरदायित्व।

कठिन कार्य से थकना मानवीय अनुभव है। थकान को नकारना या अपनी क्षमता से अधिक भार उठा लेना इस शिक्षा का उद्देश्य नहीं। पर कठिनाई आते ही प्रत्येक आवश्यक काम से भाग जाना भी मन को स्वतंत्र नहीं करता। यदि मेरा निर्णय केवल तुरंत आराम पाने के लिए है, तो उस आराम की चाह ही नई आसक्ति हो जाती है। जो काम सचमुच करना चाहिए, उसके लिए उचित सहायता, समय और संतुलन खोजना एक बात है; उसे बिना जाँच के पलायन कहकर छोड़ देना दूसरी।

श्रीकृष्ण अर्जुन को युद्ध के सामने खड़ा देखकर यह शिक्षा देते हैं। यहाँ मैं उस प्रसंग को अपने जीवन के हर मतभेद पर हिंसा का निर्देश नहीं बना सकता। इस प्रसंग में अर्जुन का धर्मसम्मत कर्तव्य और उसके मोह, भय तथा फल की चिंता का प्रश्न है। मेरे लिए सीख यह है कि अपने सही दायित्व का निर्णय विवेक से करूँ और फिर उससे केवल इसलिए पीछे न हटूँ कि उसमें मेहनत, अप्रियता या अनिश्चित परिणाम हैं। प्रसंग का सम्मान तभी है जब उसके अर्थ को अपनी सुविधा से न मोड़ूँ।

जब कोई काम रुचिकर हो, तब उससे चिपकना सहज है; जब वह अप्रिय हो, तब उससे घृणा करना भी सहज है। आगे की व्याख्या में सात्त्विक त्यागी के लिए न अप्रिय कर्म से द्वेष और न प्रिय कर्म से आसक्ति की बात आती है। यह मन को पत्थर बनाने का आग्रह नहीं है। यह देखने की दिशा है कि सुख और असुख मेरे निर्णय के अकेले स्वामी न बनें। धर्मसम्मत काम में कभी आनंद होगा, कभी श्रम। दोनों अवस्थाओं में निष्ठा बनाए रखना त्याग की परीक्षा है।

कर्म में रहकर भीतर स्वतंत्र होना

श्रीकृष्ण सात्त्विक त्याग की निर्णायक बात इस श्लोक में कहते हैं:

कार्यमित्येव यत् कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन ।
सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः ॥ ९ ॥

यहाँ कर्तव्य इसलिए किया जाता है कि वह कर्तव्य है। संग और फल छोड़े जाते हैं; कर्म नहीं। इस विचार से त्याग की दिशा बदल जाती है। मेरा ध्यान इस प्रश्न पर रहता है कि आज जो उचित काम मेरे सामने है, उसे कितनी सत्यनिष्ठा से निभा सकता हूँ। काम पूरा होने पर उसकी सफलता को अहंकार का प्रमाण और विफलता को अपने अस्तित्व का निर्णय नहीं बनाना है। मेरे हाथ का कर्म आवश्यक है, पर समूचे परिणाम का स्वामी होने का दावा आवश्यक नहीं।

कर्तापन का त्याग विशेष सावधानी चाहता है। यह कह देना कि सब ईश्वर कराते हैं, और फिर अपने हिस्से का काम अधूरा छोड़ देना, इस शिक्षा का पालन नहीं है। कर्मयोगी अपनी जिम्मेदारी निभाता है, लेकिन भीतर यह नहीं पालता कि उसी के कारण संसार चल रहा है। वह स्वयं को व्यापक व्यवस्था में एक निमित्त समझता है। इससे उसका परिश्रम कम नहीं होता; उसका अभिमान कम हो सकता है। जो काम मैंने किया, उसका सत्य स्वीकार करूँ, पर उससे दूसरों के योगदान या ईश्वर की व्यापक व्यवस्था को मिटाऊँ नहीं।

फल-त्याग भी परिणाम को देखने से आँख फेरना नहीं है। काम के बाद क्या हुआ, उससे सीखना जरूरी हो सकता है। भूल हुई हो तो सुधार करना होगा; सहायता अधूरी रही हो तो उसे समझना होगा। पर सीखने और स्वयं को परिणाम का बंदी बना लेने में अंतर है। पहला कर्म को अधिक शुद्ध करता है, दूसरा मन को चिंता और भय से भर देता है। सात्त्विक त्याग में सजगता बनी रहती है, साथ ही यह विनम्रता भी कि परिणाम अकेले मेरे हाथ से नहीं बनते।

जब मैं अगली बार किसी आवश्यक काम के सामने खड़ा होऊँ, तो अपने से दो प्रश्न पूछ सकता हूँ। क्या यह काम मेरे लिए उचित कर्तव्य है? और यदि है, तो क्या मैं इसे बिना यश, नियंत्रण तथा निश्चित फल की माँग के कर सकता हूँ? इन प्रश्नों से उत्तरदायित्व भी सुरक्षित रहता है और मन की गाँठ भी दिखाई देती है। श्रीमद्भगवद्गीता का त्याग संसार से अनुपस्थित हो जाने का आग्रह नहीं करता। वह कर्म के बीच रहते हुए भीतर के स्वार्थ को पहचानने और छोड़ने का मार्ग खोलता है।

संदर्भ: श्रीमद्भगवद्गीता — मोक्ष
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