20 अक्टूबर 2026 · डॉ. राजेश तकयार
हर नाम में कृष्ण

पुकार में छिपा संबंध
श्रीकृष्ण को पुकारते समय हमारे भीतर कौन-सा भाव उठता है? कोई उन्हें कान्हा कहता है, कोई गोविन्द, कोई मुरलीधर और कोई वासुदेव। इन नामों को ध्यान से पढ़ता हूँ तो हर नाम में उनके किसी गुण, किसी लीला या किसी आत्मीय संबंध की झलक मिलती है। नाम के साथ स्मरण का स्वर भी बदल जाता है। कन्हैया कहते ही यशोदा का स्नेह सामने आता है, गोपाल कहते ही गायों और ग्वालों के बीच रहने वाले कृष्ण दिखाई देते हैं। एक ही कृष्ण हमारे सामने अनेक संबंधों में उपस्थित होते हैं। इसी विविधता में उनकी निकटता का सौंदर्य है।
गर्ग मुनि ने नंद के घर नामकरण के समय कृष्ण के अनेक नाम और रूप होने की बात कही। उनके गुणों और कर्मों के अनुरूप नाम प्रकट होते हैं। इस बात में नामों को समझने की कुंजी है। किसी नाम तक पहुँचने के लिए उस भाव को देखना होगा जिससे वह जुड़ा है। कृष्ण का नाम मन को आकर्षित करने वाले, सच्चिदानन्द स्वरूप परमात्मा का स्मरण कराता है। उनके रूप, प्रेम और कर्मों में जो आकर्षण है, वह भक्त को उनकी ओर खींचता है। नाम उस आकर्षण को अपनी पुकार में जगह देने का माध्यम बन जाता है।
नामों की इस यात्रा में मैं शब्दों के अर्थ के साथ हृदय की स्थिति को भी देखता हूँ। सामने वही कृष्ण हों, फिर भी माता की दृष्टि, सखा की दृष्टि और भक्त की दृष्टि में संबंध का अनुभव अलग होगा। माता अपने बालक को पुकारेगी, सखा अपने साथी को और भक्त अपने आराध्य को। प्रत्येक पुकार में अपनापन है। कृष्ण के नामों की बहुलता इसी अपनत्व को विस्तार देती है। हम उनके जिस रूप का स्मरण करते हैं, उस रूप से जुड़ा प्रेम भी हमारे सामने खुलने लगता है। इसलिए नाम पढ़ना संबंधों को पहचानने की यात्रा भी है।
मुझे इस बात पर ठहरना अच्छा लगता है कि नाम कितना छोटा होता है और उसके भीतर कितनी बड़ी स्मृति समा सकती है। दामोदर में माता का प्रयास और प्रेम है। मुरलीधर में बाँसुरी की मधुरता है। मुकुन्द में मुक्ति की आशा है। इन नामों के अर्थ साथ लेकर स्मरण किया जाए तो पुकार में समझ भी जुड़ती है। मन जानता है कि वह किस संबंध को याद कर रहा है। इस समझ से नाम के प्रति आदर बढ़ता है और कृष्ण का स्मरण जीवन के अनेक भावों के साथ जुड़ने लगता है।
कान्हा से दामोदर तक
कान्हा और कन्हैया में बहुत सहज स्नेह है। कृष्ण के श्यामल स्वरूप से जुड़ा कान्हा नाम गोकुल और वृंदावन के आत्मीय वातावरण को सामने लाता है। राधा और गोपियों की पुकार में यह नाम निकटता का भाव रखता है। कन्हैया में उनके बाल रूप की चंचलता और मोहकता समाई है। बाललीलाएँ, माखन की शरारतें और माता यशोदा की ममता इस संबोधन को जीवंत बनाती हैं। जब यशोदा कन्हैया कहकर बुलाती हैं, तब उनके सामने उनका अपना बालक है। इस एक पुकार में माँ का पूरा स्नेह उतर आता है।
भक्ति में यह बाल रूप मुझे विशेष रूप से आकर्षित करता है। जिन कृष्ण की दिव्यता का वर्णन इतना व्यापक है, वे माता के लिए ऐसे बालक भी हैं जिसकी शरारतों की शिकायत आती है। यशोदा उन्हें समझाती हैं, रोकती हैं और बाँधने का प्रयास करती हैं। संबंध की यह सहजता प्रेम को बहुत पास ले आती है। यहाँ अपनापन किसी औपचारिक परिचय का मोहताज नहीं रहता। माता का स्नेह उनके व्यवहार में दिखाई देता है। कृष्ण उस स्नेह को स्वीकार करते हैं और अपने भक्त के साथ संबंध की गहराई प्रकट करते हैं।
दामोदर नाम इसी प्रेम की स्मृति है। दाम का अर्थ रस्सी और उदर का अर्थ पेट है। यशोदा कृष्ण को ऊखल से बाँधना चाहती हैं, लेकिन रस्सी बार-बार दो अंगुल छोटी पड़ जाती है। अंत में उनके सच्चे प्रेम और प्रयास को देखकर कृष्ण बँध जाने देते हैं। इस प्रसंग को याद करते हुए मैं माता के प्रयास और कृष्ण की स्वीकृति, दोनों पर ध्यान देता हूँ। यशोदा अपने बालक तक पहुँचने के लिए लगी रहती हैं। कृष्ण की ओर से मिली स्वीकृति उनके प्रयास को पूर्ण करती है। दामोदर की पुकार में यह पूरा दृश्य फिर जीवित हो उठता है।
इन नामों से भक्ति की आत्मीय भाषा समझ में आती है। प्रेम अपने आराध्य को पुकारने के लिए घर के भीतर की सहजता भी चुन सकता है। कान्हा में निकटता है, कन्हैया में ममता और दामोदर में उस ममता का स्वीकार। इन संबोधनों का स्मरण करते हुए अपने भीतर भी देख सकता हूँ कि मेरी पुकार में कितना अपनापन है। क्या मैं नाम के साथ उसके स्नेह को महसूस कर रहा हूँ? क्या मेरी दृष्टि उस संबंध पर ठहरती है जिसे यह नाम सामने रखता है? ऐसे प्रश्न नाम के अर्थ को भीतर तक पहुँचाते हैं।
गोपाल की देखभाल, मुरलीधर की मधुरता
गोपाल कहते ही कृष्ण गायों और ग्वालों के बीच दिखाई देते हैं। उनके बाल्य जीवन में गायों की देखभाल, साथियों के साथ उन्हें चराने जाना और उनकी रक्षा करना सम्मिलित है। वे बाँसुरी बजाकर गायों को एकत्रित करते हैं। इस नाम में पालक का भाव है। देखभाल और करुणा उनके संबंध का हिस्सा हैं। मैं गोपाल नाम में प्रेम का वह रूप देखता हूँ जो अपने साथ रहने वालों का ध्यान रखता है। गायों के प्रति उनकी आत्मीयता और ग्वालों के साथ उनका व्यवहार इस नाम को केवल संबोधन से आगे एक सजीव दृश्य बना देते हैं।
गोविन्द नाम में भी रक्षा का भाव आता है। गोकुल पर वर्षा का संकट आने पर कृष्ण गोवर्धन उठाकर सबको आश्रय देते हैं। गायों की देखभाल करने वाले कृष्ण अपने लोगों के संकट में उनके रक्षक बनकर सामने आते हैं। गोविन्द के अर्थ में वेदों का ज्ञान और उनके अर्थ को समझाना भी जुड़ा है। इस प्रकार एक ही नाम पालन, रक्षा और ज्ञान की स्मृति साथ लाता है। जब मैं गोविन्द कहता हूँ, तब उन कृष्ण का स्मरण करता हूँ जो साथ रहने वालों की आवश्यकता और संकट से उदासीन नहीं हैं।
मुरलीधर नाम का अपना माधुर्य है। मुरली बाँसुरी है और धर उसे धारण करने वाला। कृष्ण की बाँसुरी की धुन गोपियों, ग्वालबालों और पशु-पक्षियों को आकर्षित करती है। इस प्रसंग में उनकी निकटता संगीत के माध्यम से प्रकट होती है। जहाँ गोपाल का नाम देखभाल का दृश्य सामने रखता है, वहीं मुरलीधर का नाम मधुर ध्वनि के साथ सबके जुड़ने का भाव जगाता है। दोनों रूप साथ देखें तो कृष्ण का संसार अधिक पूरा दिखाई देता है। उसमें संरक्षण भी है, साथ भी है और साथ होने का आनंद भी है।
गोपाल और मुरलीधर के रूप में मैं प्रेम की सक्रिय उपस्थिति देखता हूँ। किसी का ध्यान रखना, साथ चलना और अपने आनंद में उसे सहभागी बनाना, इन नामों से जुड़े प्रसंगों में दिखाई देता है। इनके स्मरण से मन स्वयं अपने संबंधों की ओर लौट सकता है। जिस प्रेम को मैं आदर देता हूँ, उसका ध्यान और करुणा मेरे व्यवहार में कितनी जगह पाते हैं? कृष्ण की गायों के प्रति कोमलता इस प्रश्न को बहुत सरल बना देती है। उनके नाम से जुड़ा अर्थ मेरे सामने प्रेम को पहचानने का एक स्पष्ट आधार रखता है।
रूप, सरलता और सर्वव्यापकता
पीताम्बर और वनमाली नाम कृष्ण के दृश्य स्वरूप को स्मरण में लाते हैं। पीले वस्त्र धारण करने के कारण वे पीताम्बर कहे जाते हैं। वनमाला धारण करने वाले कृष्ण वनमाली हैं। इन नामों को सुनकर मन उनके रूप को पहचान सकता है। नाम में वस्त्र का रंग है, माला है और उनके वन से जुड़े जीवन की झलक है। यह भी प्रेम का एक ढंग है कि प्रिय के रूप की छोटी-सी विशेषता आत्मीय संबोधन बन जाती है। उस विशेषता से पूरे स्वरूप का स्मरण होने लगता है और मन उसी ओर ठहरता है।
बाँकेबिहारी में कृष्ण की मनोहर त्रिभंगी मुद्रा और विहार का भाव जुड़ा है। कुंजबिहारी में वृंदावन के कुंज, वृक्षों और लताओं की छाया तथा अपने साथियों के बीच आनंद से विचरण करते कृष्ण सामने आते हैं। कुंजों में उनकी लीलाएँ प्रेम और भक्ति के भाव को प्रकट करती हैं। इन नामों में प्रकृति के साथ उनकी सहज निकटता दिखाई देती है। वन, गायें, सखा और मधुर बाँसुरी, सब उसी अनुभव के अंग हैं। कृष्ण का स्मरण करते हुए यह पूरा वातावरण मन में उतर सकता है। उनकी सहजता को समझने के लिए यह रूप बहुत सुंदर अवसर देता है।
कालीकमली वाले नाम में साधारण काली चादर धारण किए कृष्ण की सरलता है। यह संबोधन उन्हें भक्त के समीप और सुलभ दिखाता है। उस रूप में वे सखा और प्रेमी की तरह हृदय के पास अनुभव होते हैं। उनकी विनम्रता और सामान्य वेश में उपस्थित आत्मीयता पर मेरी दृष्टि टिकती है। फिर वासुदेव नाम उसी दृष्टि को व्यापक करता है। वे वसुदेव के पुत्र हैं और सभी प्राणियों में वास करने वाले भी हैं। पिता से जुड़े परिचय के साथ इस नाम में अन्तर्यामी का भाव आता है। आत्मीय संबंध और व्यापक उपस्थिति, दोनों एक नाम में मिलते हैं।
वासुदेव के इस अर्थ को साथ रखने पर कृष्ण के दूसरे नामों की गहराई भी खुलती है। गायों के बीच गोपाल, माता के सामने कन्हैया और सभी प्राणियों में वास करने वाले वासुदेव, ये रूप एक ही कृष्ण की ओर ले जाते हैं। उनके किसी एक आत्मीय रूप का स्मरण करते समय उनकी व्यापकता का बोध भी बना रह सकता है। मुझे यहाँ भक्ति की सुंदर संभावना दिखाई देती है। अपने प्रिय संबंध में कृष्ण को निकट अनुभव करते हुए भी उन्हें उस संबंध की सीमा में बाँध देना आवश्यक नहीं। उनका अपनापन विस्तृत होता जाता है।
नाम से स्मरण की ओर
राधारमण में राधा के प्रिय और उन्हें आनंद देने वाले कृष्ण का भाव है। माधव भी उनके प्रेमपूर्ण संबोधनों में आता है; राधा को यह नाम अत्यंत प्रिय बताया गया है। इन नामों में प्रेम का अपना आनंद है। मुकुन्द में भक्ति और प्रेम देने वाले, मुक्ति प्रदान करने वाले कृष्ण का स्मरण होता है। नामों को इस तरह समझने पर प्रेम और आध्यात्मिक आकांक्षा साथ दिखाई देते हैं। मन अपने आराध्य के समीप होना चाहता है और उसी निकटता में बंधनों से मुक्त होने की आशा भी रखता है।
कृष्ण के नाम उनके रक्षक स्वरूप का भी स्मरण कराते हैं। केशव में केशी के संहार की स्मृति आती है, मुरारी में मुरा के अंत की और मधुसूदन में मधु के विनाश की। इन संबोधनों में संकट दूर करने वाले कृष्ण प्रकट होते हैं। उनके कोमल और प्रेमपूर्ण रूपों के साथ यह सामर्थ्य भी जुड़ा है। नामों को समग्रता में पढ़ने से उनके व्यक्तित्व के अनेक पक्ष सामने आते हैं। ममता, माधुर्य, देखभाल, रक्षा, ज्ञान और मुक्ति, सबके माध्यम से मन उसी एक आराध्य की ओर जाता है। किसी नाम का भाव दूसरे नाम की आत्मीयता को घटाता नहीं है।
नाम की महत्ता को समझने के बाद स्मरण का प्रश्न अपने सामने आता है। प्रातःकाल, मध्याह्न, संध्या और रात्रि में भगवान् का स्मरण करने का भाव इस प्रसंग में रखा गया है। दिन के अलग-अलग समय में उनकी ओर लौटना, जीवन में उनकी स्मृति को स्थान देना है। मैं नाम के उच्चारण के साथ उसके अर्थ को भी मन में रहने देना चाहता हूँ। गोपाल कहूँ तो देखभाल का भाव भूले नहीं, दामोदर कहूँ तो प्रेम का स्वीकार याद रहे, वासुदेव कहूँ तो सबमें उनकी उपस्थिति का बोध बना रहे।
हर नाम का अर्थ समझने के लिए सभी नाम एक साथ याद होना आवश्यक नहीं। जिस नाम से हृदय जुड़ता है, उसके भाव पर ठहरकर भी शुरुआत हो सकती है। फिर दूसरे नामों में व्यक्त गुणों को समझते हुए वह परिचय अधिक व्यापक होता जाता है। यहाँ मैं अपनी पुकार को ध्यान से सुनना चाहता हूँ। क्या उसमें केवल परिचित ध्वनि है, या उस ध्वनि के साथ संबंध का अनुभव भी जाग रहा है? नाम की यह समझ स्मरण को गहराई देती है। पुकार अपने आराध्य के किसी प्रिय रूप से मिलने का अवसर बन सकती है।
अंत में मेरे सामने वही कृष्ण रहते हैं, जिन्हें यशोदा कन्हैया कहकर पुकारती हैं, जिनके साथ ग्वालबाल रहते हैं और जिनकी बाँसुरी सबको आकर्षित करती है। नाम बदलते हैं तो स्मरण में उनके गुणों और संबंधों की नई झलक खुलती है। मैं इन नामों को प्रेम से समझते हुए अपनी भक्ति में स्थान देना चाहता हूँ। कान्हा की निकटता, गोपाल की करुणा, मुरलीधर की मधुरता और वासुदेव की व्यापकता, इन सबमें उसी कृष्ण को पहचानना है। जब पुकार में उनका भाव भी साथ हो, तब छोटा-सा नाम हृदय के लिए कितना विशाल आश्रय बन जाता है।