11 अक्टूबर 2026 · डॉ. राजेश तकयार
भाग 15 — एक ब्रह्म

श्रीकृष्ण अर्जुन के सामने संसार का एक गहरा रूपक रखते हैं। वे उसे ऐसे अश्वत्थ वृक्ष के समान बताते हैं जिसकी जड़ ऊपर है और शाखाएँ नीचे फैली हुई हैं। इस वृक्ष का विस्तार अनेक रूपों में दिखाई देता है, जबकि उसका मूल आधार हमारी साधारण दृष्टि से छिपा रहता है। उसकी शाखाएँ प्रकृति के गुणों से पोषित होती हैं। विषय उसके नए अंकुरों की तरह हैं और कर्मों से बनने वाले बंधन उसकी जड़ों की तरह मनुष्य को पकड़े रहते हैं। इच्छा से कर्म, कर्म से आसक्ति और आसक्ति से नई इच्छा का क्रम फैलता जाता है। मनुष्य इस विस्तार में इतना उलझ सकता है कि उसे अपने जीवन की दिशा स्पष्ट नहीं रहती। वह एक शाखा से दूसरी शाखा तक बढ़ता रहता है, लेकिन मूल का प्रश्न पीछे छूट जाता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि इस गहरे बंधन को दृढ़ असंग के शस्त्र से काटना चाहिए। असंग का अर्थ भीतर की उस पकड़ को छोड़ना है जो प्रत्येक वस्तु और अनुभव को अपनी स्थायी तृप्ति का आधार बना लेती है। इसके बाद उस परम पद की खोज करनी चाहिए जहाँ पहुँचकर फिर लौटना नहीं होता। साधक उसी आदि पुरुष का आश्रय लेता है जिससे यह संपूर्ण सृष्टि-प्रवाह विस्तृत हुआ है। इस खोज के लिए मान और मोह से मुक्त होना आवश्यक है। आसक्ति के दोष को पहचानना, अध्यात्म में स्थिर रहना, कामनाओं की अनिवार्यता से ऊपर उठना और सुख-दुःख के द्वन्द्व को सहना साधना के अंग हैं। श्रीकृष्ण उस परम धाम का वर्णन करते हैं जिसे सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि प्रकाशित नहीं करते। उसकी सत्ता किसी बाहरी प्रकाश पर निर्भर नहीं है। वही अविनाशी प्राप्ति साधक का अंतिम लक्ष्य है। फिर वे जीव का स्वरूप बताते हैं। संसार में स्थित जीव उनका सनातन अंश है। वह मन और इन्द्रियों के साथ प्रकृति में अनुभव करता है। विषयों की ओर खिंचाव उसे बार-बार बाहरी वस्तुओं में तृप्ति खोजने के लिए प्रेरित करता है। देह के परिवर्तन का उदाहरण देते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं कि जैसे वायु गंध को साथ लेकर चलती है, वैसे ही जीव मन और इन्द्रियों को साथ लेकर एक देह से दूसरी देह की ओर जाता है। शरीर का परिवर्तन उसकी यात्रा का पूर्ण अंत नहीं है। मोहग्रस्त दृष्टि इस सूक्ष्म सत्य को नहीं पहचानती। ज्ञान की दृष्टि रखने वाले साधक आत्मतत्त्व को समझने का प्रयास करते हैं। इसके लिए प्रयत्न के साथ अंतःकरण का शोधन भी चाहिए। श्रीकृष्ण अर्जुन को फिर संसार की ओर देखते हुए अपना स्मरण कराते हैं। सूर्य का प्रकाश, पृथ्वी की धारण करने वाली शक्ति और वनस्पतियों का पोषण उन्हीं से है। जीवन के बने रहने की व्यवस्था में उनका आधार उपस्थित है। प्राणियों के शरीर में अन्न को पचाने वाली शक्ति भी उन्हीं से है। वे सभी के हृदय में स्थित हैं। स्मृति, ज्ञान और विस्मरण का मूल भी उन्हीं में है। इस प्रकार परमात्मा का संबंध केवल दूर की किसी अवस्था से नहीं, जीवित होने के प्रत्येक अनुभव से जुड़ता है। वे क्षर और अक्षर का भेद बताते हैं। समस्त परिवर्तनशील जगत क्षर है। अविनाशी, स्थिर तत्त्व अक्षर कहा जाता है। इनसे श्रेष्ठ वह परम पुरुष है जो सबको धारण करता है और परमात्मा कहलाता है। श्रीकृष्ण अपने को उसी पुरुषोत्तम स्वरूप में जानने के लिए कहते हैं। जो इस सत्य को भ्रम से मुक्त होकर जानता है, उसकी भक्ति पूरे भाव से होती है। उसका ज्ञान जीवन की दिशा बदल देता है। एक ब्रह्म की पहचान विविधता के पीछे उपस्थित मूल को देखने में है। जब मनुष्य शाखाओं के विस्तार में खोने के साथ अपने आधार को भी स्मरण रखता है, तब संसार के साथ उसका संबंध बदलता है। उसके कर्मों में आसक्ति कम और उसकी साधना में समर्पण अधिक होने लगता है। लेखक ने इसका विस्तार अपनी निम्न पुस्तक में 58,776 शब्दों में किया है। श्रीमद्भगवद्गीता — भाग 15 — एक ब्रह्म