12 अक्टूबर 2026 · डॉ. राजेश तकयार
ईश्वर-द्वार किसके लिए खुला है?

अनन्य भक्ति से मोक्ष का मार्ग
भगवान् कृष्ण ने बताया है कि भले ही कोई दुराचारी हो, पर यदि वह अनन्य भक्ति करता है, तो वह शीघ्र ही धर्मात्मा बन जाता है और मोक्ष को प्राप्त करता है। जो भी कर्मयोगी सच्चे मन से परमात्मा की शरण ग्रहण करता है, वह चाहे किसी भी जाति, लिंग या जन्म से क्यों न हो, भक्ति के द्वारा परम गति अर्थात् मोक्ष को प्राप्त कर सकता है। यहाँ इस श्लोक में उन्होंने भक्ति की समानता और सभी मानवों को संदेश दिया है कि भगवान् के द्वार सबके लिए खुले हैं; कोई भी अपात्र नहीं होता। यह कृपा केवल ‘श्रेष्ठ’ लोगों के लिए नहीं, बल्कि समाज में उपेक्षित समझे जाने वाले लोगों के लिए भी समान रूप से उपलब्ध है।
गीता का संदेश: सबमें समानता
श्रीमद्भगवद्गीता में कहा हुआ सब कुछ केवल अर्जुन से सम्बोधन नहीं है बल्कि विश्व के सभी मानवों के लिए ईश्वर द्वारा बताया गया सत्य है। इस के अर्थ को किसी से जोड़ कर देखना-समझना पाप के अतिरिक्त कुछ नहीं होगा। जब उन्होंने ये बता दिया कि पूरा विश्व उनकी अपरा शक्ति से उत्पन्न हुआ है तो फिर भेद किस में रहा, किस लिए करना। कौन उनका अपना है और कौन दूर का है; ये तो उन्होंने कहीं बताया ही नहीं है। वह तो सबको अपना ही बता रहे हैं। तो मानव को भी चाहिए कि वह भेद करने वाली अपनी दृष्टि को बंद कर ले। ये पूरा संसार केवल इस कारण बचा रह सकता है कि सब कोई एक हैं, कोई भी अलग नहीं है। फिर भी अगर कोई दूरी की बात बताता है तो उसे समाज का दुश्मन समझना होगा तभी ये मानव-जाति बची रह सकती है। ध्यान देने योग्य यह भी है कि जब श्रीमद्भगवद्गीता में श्री कृष्ण जी ने ये सब बताया तो उस समय समाज में स्त्रियाँ, वैश्य और शूद्र अक्सर वैदिक कर्मों में सीमित अधिकार रखते थे। उस समय समाज में शिक्षा का अधिकार और आध्यात्मिक ग्रंथ पढ़ने की सुविधा सभी को समान रूप से नहीं दी जाती थी। वह यहाँ उस व्यवस्था को तोड़ते हैं। इसी कारण से उन्होंने यहाँ ये सब कहा है। जब उन्होंने कहा है तो उचित ही कहा होगा, ये मानना ही चाहिए।
ईश्वर की कृपा सबके लिए
जब उन्होंने कहा कि भगवान् के द्वार सबके लिए खुले हैं, तो इसका अर्थ केवल इतना नहीं है कि कोई भी मंदिर में प्रवेश कर सकता है। अर्थ इससे कहीं अधिक व्यापक, गहरा और अनन्त है। इसका अर्थ यह है कि ईश्वर का प्रेम, कृपा, दया, क्षमा और मार्गदर्शन समस्त सृष्टि के प्रत्येक जीव के लिए समान रूप से उपलब्ध है। कोई भी मानव, चाहे वह कहीं भी जन्मा हो; धनी हो निर्धन हो, ऊँच या नीच हो, शिक्षित या अशिक्षित हो, पुरुष हो या स्त्री हो, दिव्यांग हो या युवा-वृद्ध हो; किसी के लिए भी ईश्वर ने अपना द्वार बंद नहीं किया है। उनका प्रेम सूरज की रोशनी की तरह है। सूरज यह नहीं देखता कि कौन अमीर है और कौन गरीब; कौन अच्छे घर में है और कौन झोपड़ी में है। सूरज का प्रकाश हर स्थान पर समान रूप से पड़ता है। यह मानव की अपनी इच्छा है कि वह खिड़की खोले या बंद रखे। इसी प्रकार श्रीकृष्ण जी की कृपा सभी पर समान है; खुला मन इसे स्वीकार कर लेता है, बंद मन इसे महसूस नहीं कर पाता; वह अपनी खिड़की बंध रखना ज्यादा अच्छा समझता है। मानव का मूल्य उसके जन्म से नहीं, उसके कर्मों से नहीं, उसके कपड़ों से नहीं, उसके रूप से नहीं, उसके कुल से नहीं, बल्कि उसके हृदय की पवित्रता, उसकी भक्ति और उसकी सच्चाई से होता है। वह बता रहे हैं कि वह बाहरी आवरण नहीं देखते; वे केवल हृदय देखते हैं। संसार भले ही किसी को उसके धन, जाति, शिक्षा, रूप, भाषा या सामाजिक स्थिति से मापे, परंतु ईश्वर इन सब बातों को महत्व नहीं देते। भगवान् के लिए हर आत्मा समान है, क्योंकि हर आत्मा उन्हीं का अंश है। ‘मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्यु: पापयोनयः, स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्’ अर्थात् वे यही सत्य बता रहे हैं कि कोई भी मानव इतना गिरा हुआ नहीं होता कि मैं उसे उठा न सकूँ; कोई भी इतना पापी नहीं होता कि मैं उसे माफ़ न कर सकूँ; कोई भी इतना अपात्र नहीं होता कि मैं उसे स्वीकार न कर सकूँ। ‘व्यपाश्रित्य’ का अर्थ है; पूर्ण समर्पण; अहंकार, भय या संदेह के बिना पूरी श्रद्धा से परमात्मा की शरण ग्रहण लेना। भक्ति का मूल यही है; ईश्वर पर पूर्ण भरोसा।
भक्ति, पश्चाताप और ईश्वर की क्षमा
उन्होंने बताया कि उनके द्वार केवल अच्छे लोगों के लिए नहीं, बल्कि उन लोगों के लिए भी खुले हैं जो टूटे हुए हैं, भटके हुए हैं, थके हुए हैं, दुःखी हैं, निराश हैं, ग़लती कर चुके हैं, पाप में डूब चुके हैं, और जिन्हें लगता है कि अब ईश्वर भी उन्हें स्वीकार नहीं करेंगे; ऐसी सोच ग़लत है। ईश्वर ही वह पहला हाथ हैं जो मानव के गिरने पर उसे उठाने के लिए सर्वप्रथम आगे बढ़ता है। मानव समाज, परिवार और दुनिया से भाग सकता है, पर अपने ईश्वर से नहीं; ईश्वर उससे दूर कभी नहीं होते, वह अपने मन में बैठे ईश्वर से दूर हो सकता है, परन्तु वह नहीं होते। ईश्वर के द्वार पर जाने के लिए किसी विशेष भाषा, जाति, योग्यता या धन की आवश्यकता नहीं होती। ईश्वर को यह नहीं चाहिए कि तुम संस्कृत जानो, पूजा विधि जानो, भारी अनुष्ठान करो या बड़े दान दो। ईश्वर कृष्ण ने यही यहाँ कहा है कि पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति…; यानि एक पत्ता, एक फूल, एक फल, या थोड़ा पानी भी यदि भक्ति से दो, तो मुझे स्वीकार है। इस भक्ति में कोई धर्म, जाति, संप्रदाय या ऊँच-नीच नहीं है। भक्ति आत्मा की भाषा है, शरीर या समाज की बनाई हुई नहीं है। जो भी मानव सत्य हृदय से ईश्वर की ओर कदम बढ़ाता है, ईश्वर उसकी सौ कदम चलकर सहायता करते हैं। ईश्वर मानवों में भेदभाव नहीं करते, इसलिए धर्म, जाति या स्थिति के नाम पर किसी को छोटा या बड़ा मानना आध्यात्मिक दृष्टि से ग़लत है, इस सब का यही अर्थ है। केवल हृदय में पवित्रता होनी चाहिए।
ईश्वर का द्वार खुले होने का अर्थ यह भी है कि संसार किसी को माफ़ करे या न करे, पर ईश्वर अवश्य माफ़ करेंगे यदि कोई सच्चे हृदय से ग़लती स्वीकार कर, सुधार का प्रयास करें, और भक्ति की राह पर आगे बढ़े। ईश्वर कठोर नहीं, कोमल हैं; वे दंड देने से अधिक सुधारने में विश्वास रखते हैं। इस बताए श्लोक का यही भाव है। मानव चाहे कितनी बार गिर जाए, भगवान् उसे उठाने के लिए तैयार बैठे हैं। जो मानव सोचते हैं कि मैं इतना पापी हूँ कि भगवान् मुझे स्वीकार नहीं करेंगे; वे सबसे बड़ी भूल में हैं। श्रीकृष्ण पाप से घृणा करते हैं, पर पापी से प्रेम करते हैं, क्योंकि पापी भी उन्हीं का अंश है और उसके भीतर सबके समान वाली दिव्यता सोई हुई है। भगवान् का द्वार इसलिए भी सबके लिए खुला है क्योंकि हर आत्मा उनके लिए समान रूप से प्रिय है। जैसे माता अपने सभी बच्चों को एक जैसा प्रेम करती है; चाहे कोई सुंदर हो या साधारण, बुद्धिमान हो या सामान्य, संस्कारी हो या नटखट; मां का स्नेह कभी कम नहीं होता। उसी तरह, ईश्वर का प्रेम केवल श्रेष्ठ लोगों के लिए नहीं, बल्कि उन लोगों के लिए भी है जिनकी तुलना समाज कभी-कभी अपात्र, अयोग्य या असफल कहकर करता है। ईश्वर ने कहा ही है कि वह मानव की माता भी हैं और पिता भी हैं।
विनम्रता से ईश्वर के निकट
ईश्वर के लिए अयोग्यता केवल एक ही है; दंभ। जो अहंकारी हो, स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझे, अपने कर्मों की ग़लतियाँ न अनुभव करे, दूसरों को तुच्छ समझे; उसका हृदय ईश्वर के प्रकाश से दूर ही रहता है। लेकिन जो विनम्र है, पश्चाताप करता है, सीखता है, बदलता है, प्रेम करता है, दूसरों की सहायता करता है; वह स्वतः ही भगवान् के समीप पहुँच जाता है, क्योंकि ईश्वर स्वयं उसके हृदय में जाग्रत हो उठते हैं। ईश्वर के द्वार उनके लिए भी खुले हैं जो दुःख से टूटे हुए हैं, उनके लिए भी खुले हैं जिनके पास कोई सहारा नहीं बचा, उनके लिए भी खुले हैं जिनकी इच्छा उनसे दूर हो गई थी पर अब लौटना चाहते हैं, उनके लिए भी खुले हैं जो कभी पूजा-पाठ नहीं कर पाए, उनके लिए भी खुले हैं जिन्हें लगता है कि वे भगवान् के योग्य नहीं हैं; भगवान् यह नहीं देखते कि मानव कहाँ से आया है; वे केवल देखते हैं कि वह कहाँ जाना चाहता है। यदि कोई पापी भी मन से कह दे कि हे भगवान्, मैं ग़लत था, मुझे अपनी ओर खींच लो, तो श्रीकृष्ण बिना शर्त उसके हृदय को शुद्ध कर देते हैं। यह कृपा ही उनका वास्तविक स्वरूप है। प्रकृति भी यही सिखाती है। जब बारिश होती है, तो वह छतों पर भी गिरती है और झोंपड़ियों पर भी। जब हवा चलती है, तो वह महलों में भी बहती है और खेतों में भी; जब नदी बहती है, तो वह सभी के लिए पानी लेकर चलती है, किसी को कम, किसी को अधिक नहीं देती; ईश्वर का द्वार होना इसी व्यापकता का प्रतीक है, वहाँ कोई ताला नहीं है; केवल जाना है; ईश्वर की कृपा केवल मंदिरों में नहीं रहती; वह खेतों में, घरों में, जंगलों में, पहाड़ों में, समुद्र में; हर स्थान पर बहती है; बस मन में पवित्र भाव होना चाहिए। जब किसी का मन भगवान् को बुलाता है, तो भगवान् उसी क्षण उत्तर देते हैं; जिसमें समय, दूरी या भाषा का कोई अंतर नहीं पड़ता। किसी भी मानव को यह नहीं सोचना चाहिए कि मैं भगवान् के लायक नहीं हूँ। श्री वासुदेव कृष्ण कह रहे हैं कि मैं सबका हूँ, क्योंकि सब मेरे हैं। मानव चाहे कितना भी दूर चला जाए, वह पैदा करने वाले का ही है; भगवान् हमेशा उसकी राह देख रहे होते हैं। इसी कारण उन्होंने कहा कि भगवान् के द्वार सबके लिए खुले हैं; कोई भी अपात्र नहीं है। यही मानव-जीवन का सबसे बड़ा सत्य है; जो इसे समझ लेता है, उसकी आत्मा स्वतंत्र हो जाती है। जो इसे जीवन में उतार लेता है, उसके लिए भगवान् का मार्ग सरल और सहज बन जाता है। और जो इसे स्वीकार कर लेता है, वह कभी अकेला नहीं रहता; भगवान् सदा उसके साथ होते हैं। विस्तार सेे जानने के लिए श्रीमद्भगवद्गीता — रहस्यमय ज्ञान भाग 9 पढ़ें।