5 नवंबर 2026 · डॉ. राजेश तकयार
प्रशंसा से स्वतंत्र होना

हमारी छवि और हमारा आधार
हम अपनी प्रशंसा सुनकर प्रसन्न होते हैं। कठिनाई तब खुलती है जब किसी की राय हमारे मन के अनुकूल नहीं होती। क्या उसके बाद भी हम अपने काम को साफ दृष्टि से देख सकते हैं? माधवशिव में एक विचित्र प्रसंग है। भगवान शिव अपना रूप बदलकर हिमवान के घर जाते हैं और स्वयं अपने ही बाहरी स्वरूप की बुराई करते हैं। जिसे सुनकर साधारण मनुष्य अपनी छवि बचाने दौड़ पड़े, वही बात महादेव अपने मुख से कह रहे हैं। इस दृश्य को पढ़ते हुए मैं प्रशंसा से मिलने वाले सुख और अपने वास्तविक आधार के बीच का अंतर समझना चाहता हूँ।
प्रसंग का आरंभ पार्वती के विवाह की चर्चा से होता है। उनकी तपस्या स्वीकार हो चुकी है। हिमवान और मेना के मन में भी शिव के प्रति श्रद्धा बढ़ रही है। इसी समय देवताओं की चिंता एक अलग दिशा में जाती है। पुस्तक में वे सोचते हैं कि हिमवान पूर्ण निष्काम श्रद्धा से पार्वती को शिव को समर्पित कर देंगे तो उन्हें ऊँचा आध्यात्मिक फल प्राप्त हो सकता है। वे चाहते हैं कि हिमवान अभी पृथ्वी पर अपने पर्वत स्वरूप में बने रहें। इसी उद्देश्य से उनकी एकनिष्ठ श्रद्धा में संशय उत्पन्न करने का उपाय खोजा जाता है।
यह भूमिका सुनते हुए मैं देवताओं के उद्देश्य में मिले हुए स्वार्थ को भी देखता हूँ। लोक की व्यवस्था की चिंता के साथ अपनी आवश्यकता जुड़ सकती है। किसी अच्छे सुनाई देने वाले कारण के भीतर भी मनुष्य को अपना आग्रह पहचानना पड़ता है। मैं इस घटना को पृथ्वी या पर्वत का भौतिक विवरण नहीं बना रहा। यहाँ पुस्तक की दिव्य लीला के भीतर श्रद्धा, स्वार्थ और दृष्टि की उलझन सामने आती है। उसका चिंतन अपने मन को देखने में मदद कर सकता है। क्या मैं किसी की भलाई के नाम पर वास्तव में अपनी सुविधा की रक्षा चाहता हूँ?
देवता पहले बृहस्पति से सहायता माँगते हैं। वे शिव की निंदा करने से मना कर देते हैं। ब्रह्मा भी स्वयं यह कार्य स्वीकार नहीं करते। फिर उपाय आता है कि देवता शिव से ही प्रार्थना करें। यदि आवश्यक हुआ तो महादेव अपनी लीला में स्वयं अपने बाहरी दोष कह सकते हैं। देवता कैलास पहुँचते हैं और अपनी चिंता बताते हैं। शिव उनकी बात सुनकर हँसते हैं तथा प्रार्थना स्वीकार कर लेते हैं। यह सहज हँसी मेरे लिए आगे के पूरे प्रसंग का संकेत है। उन्हें अपना स्वरूप सिद्ध कराने की बेचैनी नहीं घेर रही।
बाहरी रूप की कसौटी
शिव अब एक धर्मनिष्ठ वैष्णव ब्राह्मण का रूप लेते हैं। उनके पास दंड है, छत्र है, स्फटिक की माला है। मस्तक पर तिलक, गले में शालग्राम और मुख पर हरि का नाम है। हिमवान उन्हें देखकर आदर करते हैं। यहाँ वेश से मिलने वाली विश्वसनीयता भी ध्यान खींचती है। सामने आने वाला अपने रूप से हमारे भीतर पहले ही एक धारणा बना देता है। आगे उसकी बात सुनते हुए हम उसी धारणा को साथ रखते हैं। पुस्तक इस दृश्य में हमारी आँख और हमारी समझ के बीच की छोटी दूरी को बहुत रोचक बना देती है।
साधु के रूप में शिव, हिमवान के सामने विवाह के विषय में प्रश्न रखते हैं। पार्वती राजकुमारी हैं, सुंदर हैं और राजपरिवार में पली हैं। फिर उस व्यक्ति का घर कहाँ है जिसे उनके लिए चुना जा रहा है? उसका सामान्य पारिवारिक परिचय क्या है? उसका रहना, पहनना और संसार के साथ व्यवहार कैसा है? एक के बाद एक प्रश्न शिव के बाहरी रूप को साधारण सामाजिक कसौटियों पर रख देते हैं। हिमवान और मेना के सामने अब दिव्य तत्त्व के स्थान पर भस्म, सर्प, श्मशान और वैराग्य के दृश्य अधिक उभरने लगते हैं।
जिस स्वरूप को थोड़ी देर पहले महान मान रहे थे, उसी के बारे में विपरीत वर्णन सुनकर माता-पिता चिंतित हो जाते हैं। साधु समाज की हँसी और पारिवारिक सम्मान की चिंता भी छूता है। यह बात उनके मन में हलचल बढ़ाती है। प्रसंग में परिवर्तन केवल तथ्यों के कारण नहीं आता। उन्हीं प्रतीकों को किस भाव से समझाया जा रहा है, वह भी प्रभाव डालता है। भस्म किसी को निर्धनता का चिह्न दिख सकती है, तो किसी को शरीर और वैभव की अस्थिरता का स्मरण। प्रतीक वही है; उसके अर्थ की दिशा बदल रही है।
यहाँ मुझे अपनी जल्दबाजी पर विचार करना उपयोगी लगता है। किसी मनुष्य का पहनावा, उसका साधारण घर या उसका सार्वजनिक परिचय दिखाई देता है। उसके पीछे का श्रम और उसकी निष्ठा तुरंत दिखाई नहीं देते। जो सामने नहीं है उसे अपनी कल्पना से भर देने पर निर्णय अधूरा रह सकता है। यह बात सावधानी छोड़ने का कारण नहीं है। पूरी स्थिति जानने की आवश्यकता बनी रहती है। पर केवल अपनी सुविधा की कसौटी से किसी जीवन का मूल्य तय कर देना भी उचित नहीं होगा। समझने का काम देखने के बाद शुरू होता है, उसी क्षण समाप्त नहीं हो जाता।
जिसे प्रशंसा की जरूरत नहीं
अपना उद्देश्य पूरा करके वह रहस्यमय साधु चला जाता है। हिमवान और मेना नहीं जानते कि जो उन्हें शिव के बारे में विपरीत बातें कहकर गया है, वह स्वयं शिव है। इस बिंदु पर प्रसंग की असाधारणता पूरी खुलती है। महादेव किसी दूसरे देवता को छोटा दिखाने नहीं आए। वे हरि का नाम लेते हुए अपने ही बाहरी स्वरूप की आलोचना कर रहे हैं। पुस्तक में शिव और विष्णु का संबंध विरोध की छोटी चौखट में नहीं आता। शिव की सहजता अपनी वास्तविकता के प्रति ऐसी निश्चिंतता दिखाती है जिसे दूसरों की अनुकूल राय की सहायता नहीं चाहिए।
यदि कोई महल के अभाव का उल्लेख करे, तो क्या उससे शिव की सत्ता बदल जाती है? यदि कोई भस्म या सर्प को दोष बनाकर गिने, तो क्या शिवत्व घट जाता है? पुस्तक ऐसे प्रश्नों से हमें भीतर के आधार की ओर ले जाती है। बाहर का वर्णन अपनी जगह है, वास्तविक तत्त्व अपनी जगह। मनुष्य के लिए इस दिव्यता को पूरी तरह अपने बराबर रख लेना संभव नहीं। फिर भी इससे इतना विचार अवश्य उठता है कि क्या अपने काम का आधार हम केवल मिली हुई प्रशंसा में खोजते हैं, या उसके वास्तविक गुण और उद्देश्य में भी देखते हैं।
प्रशंसा का अपना स्थान हो सकता है। वह किसी परिश्रम को पहचानती है और साथ देने वाले का स्नेह प्रकट करती है। कठिनाई तब होती है जब काम शुरू करने, उसे पूरा करने और उसके मूल्य को समझने के लिए हर बार बाहरी स्वीकृति अनिवार्य लगने लगे। तब अपनी दृष्टि का भार धीरे-धीरे दूसरों के हाथ चला जाता है। किसी की एक प्रतिक्रिया दिन के पूरे काम को ढक सकती है। शिव की इस लीला से मैं यह प्रश्न लेता हूँ कि क्या मैं मिली हुई सराहना का मान रखते हुए अपने कार्य के प्रति स्वतंत्र जिम्मेदारी भी बचा सकता हूँ।
इस स्वतंत्रता में आलोचना के लिए जगह बंद नहीं होती। कोई हमारे काम की वास्तविक कमी दिखाए, तो उसे सुनना सीख का हिस्सा है। यदि हर असहमति को अपनी महानता न समझ पाने की भूल कह दें, तो हम प्रसंग से उलटा अर्थ ले रहे होंगे। महादेव की दिव्यता मनुष्य के हर दावे की ढाल नहीं बन सकती। अपने भीतर की स्थिरता का एक उपयोग यही है कि बिना टूटे अपनी कमी देख सकें। प्रशंसा पर निर्भरता घटने के साथ अपने काम को अधिक ईमानदारी से जाँचने की क्षमता भी बढ़नी चाहिए।
दृष्टि को अपना काम करने दें
हिमवान और मेना के मन में उठा संशय प्रसंग की अंतिम अवस्था नहीं है। पुस्तक बताती है कि आगे परिस्थितियाँ उचित दिशा पाती हैं और शिव-पार्वती का विवाह विधिपूर्वक होता है। इसलिए यहाँ क्षणिक हलचल को पूरी यात्रा का निष्कर्ष मान लेना ठीक नहीं। श्रद्धा भी कभी अपने आधार को अधिक गहराई से समझने की प्रक्रिया से गुजरती है। जो पहले आनंद के रूप में स्वीकार हुआ था, उसे प्रश्नों के सामने फिर देखना पड़ता है। इस देखने में धैर्य हो तो सुनाई देने वाली हर नई बात हमें पूरी तरह उखाड़ नहीं ले जाती।
हमारे साधारण संबंधों में भी किसी परिचित के विषय में कई प्रकार की बातें सुनाई दे सकती हैं। उनका मूल्यांकन उनके आधार पर करना होगा। किसने क्या देखा, क्या केवल सुना और क्या अपनी व्याख्या जोड़ दी, ये अंतर महत्वपूर्ण हैं। किसी की पोशाक या सामाजिक प्रतिष्ठा को सुनने का अंतिम आधार बना लेना पर्याप्त नहीं। इस दिव्य लीला को मैं व्यवहार में छल करने का अधिकार नहीं मानता। उससे अपने निर्णय की जिम्मेदारी समझना चाहता हूँ। अपनी ओर से जल्द निष्कर्ष न देना और किसी की पूरी बात सुनना इसी जिम्मेदारी के छोटे रूप हैं।
युवा पाठक जब अपना अध्ययन या कोई नया काम शुरू करता है, तब हर कदम पर प्रशंसा मिलना आवश्यक नहीं होता। अभ्यास का कुछ हिस्सा शांत रहता है। किसी विषय को दोबारा पढ़ना, भाषा सुधारना या अधूरा काम ठीक करना अक्सर सार्वजनिक प्रदर्शन का विषय नहीं बनता। फिर भी वही समय अपने आधार को मजबूत करने में लग सकता है। यदि केवल दिखाई देने वाले परिणाम के लिए उत्साह बचे, तो तैयारी का जरूरी हिस्सा उपेक्षित होने लगता है। अपने प्रयास को उसका उचित समय देना भी प्रशंसा से कुछ स्वतंत्र होने का अभ्यास बन सकता है।
यह बात अपने परिश्रम का प्रचार न करने की कोई कठोर शर्त नहीं है। मनुष्य अपना काम सामने रख सकता है, दूसरों से सीख सकता है और उचित सहयोग माँग सकता है। मुझे बस उस क्रम को बचाना महत्वपूर्ण लगता है जिसमें काम का अर्थ पहले स्पष्ट हो। मैं किस उद्देश्य से सीख रहा हूँ, किस जिम्मेदारी को निभा रहा हूँ और कहाँ सुधार चाहिए, यह अपने भीतर मालूम रहे। तब बाहरी प्रतिक्रिया बातचीत का हिस्सा बनती है। वह अपने पूरे अस्तित्व का एकमात्र निर्णय सुनाने वाली आवाज नहीं रह जाती।
अपने काम के पास लौटना
मुझे शिव की सहजता का सबसे उपयोगी स्पर्श अपने काम के पास लौटने में मिलता है। प्रशंसा हुई तो उसे विनम्रता से स्वीकार करके अगला उचित काम करूँ। प्रश्न उठा तो उसके आधार को देखूँ। सुधार मिला तो उसे समझने का प्रयास करूँ। किसी के शब्दों ने केवल चोट पहुँचाई है, तो उस चोट को अपना पूरा परिचय न बना लूँ। इस तरह अपनी जिम्मेदारी के पास लौटना संभव हो सकता है। प्रसंग में शिव अपनी ही आलोचना के बीच शिव रहते हैं। मनुष्य के लिए उससे उठने वाला प्रश्न अपने उद्देश्य के साथ बने रहने का है।
इस लौटने के लिए अपने भीतर देखने का थोड़ा अवकाश चाहिए। प्रतिक्रिया के तुरंत बाद जो भाव उठता है, उसे अंतिम निर्णय मान लेना जरूरी नहीं। हम देख सकते हैं कि उसमें आहत अभिमान कितना है, वास्तविक प्रश्न कितना है और काम की उपयोगी सूचना कितनी है। इन हिस्सों को अलग समझने से उत्तर का स्वर भी बदल सकता है। पुस्तक का प्रसंग हमें कोई यांत्रिक विधि नहीं देता। वह एक दृश्य देता है जिसमें बाहरी आलोचना के बीच भीतर का स्वरूप निश्चिंत है। उसी दृश्य से मैं अपने प्रश्न पूछ रहा हूँ।
हिमवान के भवन में बैठा वह साधु बाहर से एक आलोचक दिखाई देता है और भीतर स्वयं शिव है। इस दोहरी स्थिति को भूलने पर प्रसंग का अर्थ बहुत छोटा हो जाएगा। लीला का आश्चर्य अपनी जगह बना रहे; व्यवहार का विचार अपनी जिम्मेदारी के साथ आगे बढ़े। किसी दूसरे का तिरस्कार कर देना स्वतंत्रता नहीं है। अपनी कमी से आँख बंद कर लेना भी स्थिरता नहीं। मुझे वह परिपक्वता अधिक अर्थपूर्ण लगती है जिसमें मनुष्य सम्मान से सुन सके, विवेक से परख सके और फिर अपने उचित श्रम में लग सके।
प्रशंसा से स्वतंत्र होना मेरे लिए संबंधों से दूर हो जाना नहीं है। वह संबंधों में रहते हुए अपने काम का आधार सँभालना है। मित्रों का स्नेह, पाठक का प्रश्न और मार्गदर्शक का सुधार, सबका मान बना रहे। साथ ही भीतर यह स्पष्टता रहे कि हमारा श्रम किस दिशा में है। माधवशिव का यह प्रसंग अंत में मुझे अपनी छवि से थोड़ा हटकर अपने आचरण की ओर देखने देता है। वहाँ जो सुधार संभव है, उस पर काम करना अधिक उपयोगी है। अपनी वास्तविकता का उत्तर धीरे-धीरे उसी काम में दिखाई पड़ सकता है। श्रीमद्भगवद्गीता के चौदहवें भाग के चौबीसवें श्लोक में निंदा और अपनी प्रशंसा के प्रति समता का विचार भी आता है। उसकी व्याख्या में मैंने आलोचना के भीतर उपयोगी संकेत देखने और सत्य का अंश मिले तो सुधार करने पर ध्यान दिया है। माधवशिव का प्रसंग उस विचार की दूसरी झलक देता है। अपनी छवि की चिंता से थोड़ा स्वतंत्र होकर सीख के लिए उपलब्ध रहना इन दोनों स्रोतों को पढ़ने का मेरा साझा प्रश्न है।