भारतीय ज्ञान परंपरा को सरल और प्रामाणिक रूप में समझाने का एक प्रयास...

11 अक्टूबर 2026 · डॉ. राजेश तकयार

भाग 10 — शक्ति के रूप

भाग 10 — शक्ति के रूप

श्रीकृष्ण अर्जुन का हित चाहते हुए अपने स्वरूप को और स्पष्ट करते हैं। वे बताते हैं कि वे अजन्मा, अनादि और समस्त लोकों के परम आधार हैं। जो इस सत्य को जानता है, उसकी दृष्टि भ्रम से मुक्त होने लगती है। बुद्धि, ज्ञान, क्षमा, सत्य, संयम और संतोष जैसे गुणों का मूल भी उन्हीं में है। जीवन की अनेक अवस्थाएँ एक व्यापक व्यवस्था में उत्पन्न होती हैं। मनुष्य जब इस आधार को पहचानता है, तब उसके भीतर प्रत्येक उपलब्धि को केवल अपनी निजी शक्ति मानने का आग्रह कम होता है। जो भक्त प्रेमपूर्वक उनसे जुड़े रहते हैं, उन्हें वे ऐसी बुद्धि देते हैं जिससे उनकी ओर बढ़ना संभव होता है। श्रीकृष्ण ज्ञान को प्रकाशित दीपक की तरह बताते हैं, जो अंतःकरण में उपस्थित अज्ञान के अंधकार को दूर करता है। अर्जुन अब अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं। वे श्रीकृष्ण को परम ब्रह्म, परम धाम और शाश्वत पुरुष के रूप में स्वीकार करते हैं। फिर भी उनकी जिज्ञासा समाप्त नहीं होती। वे इस सत्य को अपने निरंतर चिंतन का आधार बनाना चाहते हैं। वे पूछते हैं कि किन-किन भावों और रूपों में श्रीकृष्ण का स्मरण किया जाए। संसार में रहते हुए उनकी उपस्थिति कैसे पहचानी जाए? अर्जुन उनकी विभूतियों को विस्तार से सुनना चाहते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि उनकी विभूतियों का अंत नहीं है। इसलिए वे कुछ प्रमुख रूप बताएँगे। सबसे पहले वे अर्जुन को भीतर की ओर ले जाते हैं—वे सभी प्राणियों के हृदय में स्थित आत्मा हैं और उनके आरंभ, मध्य तथा अंत का आधार हैं। फिर वे प्रकृति की ओर संकेत करते हैं। प्रकाश देने वालों में सूर्य, स्थिर पर्वतों में हिमालय, जलाशयों में समुद्र और नदियों में गंगा के रूप में उनकी विभूति पहचानी जा सकती है। महानता, विस्तार और जीवनदायी शक्ति मन को उनके स्मरण की ओर ले जा सकती है। इन्द्रियों में मन और प्राणियों में चेतना भी उनकी विभूति है। इससे अर्जुन समझते हैं कि परमात्मा की महिमा केवल दूर दिखाई देने वाले विराट रूपों में नहीं, अपने अनुभव की मूल शक्तियों में भी उपस्थित है। श्रीकृष्ण वाणी में प्रणव और यज्ञों में जपयज्ञ का उल्लेख करते हैं। विद्याओं में अध्यात्मविद्या और तर्क में सत्य तक पहुँचाने वाला विचार भी उनका रूप है। ज्ञान जब आत्मा और सत्य की ओर ले जाए, तब वह साधना का माध्यम बनता है। वे कीर्ति, वाणी, स्मृति, मेधा, धैर्य और क्षमा जैसे गुणों में भी अपनी विभूति बताते हैं। शक्ति का स्वरूप केवल बाहरी प्रभाव से पूरा नहीं होता। धारण करने की क्षमता, विवेक और क्षमा में भी उसका प्रकाश है। समय भी उन्हीं की विभूति है। उत्पत्ति और अंत, दोनों अस्तित्व की व्यवस्था में हैं। जो कुछ जन्म लेता है, वह परिवर्तन से गुजरता है। इस सत्य को समझने से मनुष्य की दृष्टि केवल तत्काल लाभ और हानि तक सीमित नहीं रहती। अनुशासन में न्यायपूर्ण दंड, विजय की इच्छा में उचित नीति और रहस्यों में मौन का भी महत्व है। जिस शक्ति के साथ विवेक और मर्यादा हों, वही जीवन को स्थिर आधार देती है। इन विभूतियों को सुनते हुए अर्जुन की दृष्टि अनेक दिशाओं में फैलती है। अब कोई सुंदरता, तेज, धैर्य या विशेष क्षमता सामने आए, तो वह उन्हें परमात्मा के स्मरण की ओर ले जा सकती है। श्रीकृष्ण बताते हैं कि संसार में जहाँ भी असाधारण तेज, शक्ति, ऐश्वर्य या प्रभाव दिखाई दे, उसे उनके तेज के अंश से उत्पन्न समझना चाहिए। प्रत्येक विभूति पूरे सत्य को समाप्त नहीं कर देती; वह उसकी ओर एक संकेत है। अंत में वे कहते हैं कि इन असंख्य रूपों का कितना विस्तार किया जाए। वे अपने एक अंश से ही पूरे जगत को धारण किए हुए हैं। अर्जुन के लिए शिक्षा यह है कि संसार की विविधता के भीतर उस एक आधार को पहचाना जाए और शक्ति के प्रत्येक उज्ज्वल रूप में अहंकार के स्थान पर श्रद्धा जागे। लेखक ने इसका विस्तार अपनी निम्न पुस्तक में 93,171 शब्दों में किया है। श्रीमद्भगवद्गीता — भाग 10 — शक्ति के रूप

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