11 अक्टूबर 2026 · डॉ. राजेश तकयार
भाग 14 — त्रिकोण

श्रीकृष्ण अर्जुन को ऐसा ज्ञान बताते हैं जिसके द्वारा साधक प्रकृति के बंधनों को समझकर उनसे आगे बढ़ सकता है। वे कहते हैं कि सत्त्व, रज और तम—ये तीन गुण प्रकृति से उत्पन्न होते हैं और देह में स्थित जीव को बाँधते हैं। ये गुण मनुष्य के अनुभव और आचरण में काम करते हैं। कभी मन स्पष्ट और शांत होता है, कभी इच्छा और कर्म की बेचैनी बढ़ती है, और कभी आलस्य तथा भ्रम घेर लेते हैं। श्रीकृष्ण इन अवस्थाओं को पहचानने का विवेक देते हैं। सत्त्व निर्मलता और प्रकाश से जुड़ा है। उसके बढ़ने पर ज्ञान स्पष्ट होता है और मन में प्रसन्नता आती है। फिर भी सुख और ज्ञान के प्रति आसक्ति जीव को बाँध सकती है। साधक अपनी शांत अवस्था पर भी अहंकार कर सकता है। रज इच्छा, तृष्णा और आसक्ति से जुड़ा है। यह मनुष्य को कर्मों में लगाए रखता है। वह कुछ पाने, बढ़ाने और स्थापित करने के लिए निरंतर प्रयत्न करता है। उपलब्धि के बाद भी अगली इच्छा उठ खड़ी होती है। तम ज्ञान को ढक देता है। उससे प्रमाद, आलस्य, मोह और असावधानी बढ़ते हैं। मनुष्य आवश्यक कार्य को टालता है और अपने निर्णयों के परिणाम को स्पष्ट रूप से नहीं देख पाता। ये तीनों गुण एक ही प्रकार से स्थिर नहीं रहते। कभी एक प्रबल होता है, कभी दूसरा। इसलिए अपनी एक अवस्था को अपनी स्थायी पहचान मान लेना उचित समझ नहीं है। साधक को देखना होता है कि इस समय उसके भीतर कौन-सी प्रवृत्ति काम कर रही है। जब इन्द्रियों और बुद्धि में स्पष्टता, प्रकाश और विवेक बढ़े, तब सत्त्व की वृद्धि पहचानी जा सकती है। जब लोभ, अशांति और नए-नए कर्मों की उतावली बढ़े, तब रज प्रबल होता है। जब भ्रम और कर्तव्य के प्रति उदासीनता बढ़े, तब तम का प्रभाव होता है। इन गुणों के फल भी भिन्न होते हैं। सत्त्व ज्ञान और निर्मलता की ओर ले जाता है। रज के साथ लोभ और दुःख बढ़ते हैं। तम अज्ञान और प्रमाद को गहरा करता है। मनुष्य की दिशा उसके भीतर पोषित होने वाली प्रवृत्तियों से जुड़ती है। लेकिन श्रीकृष्ण का उपदेश केवल गुणों की पहचान तक नहीं रुकता। वे उस स्थिति की बात कहते हैं जिसमें साधक समझता है कि प्रकृति के गुण ही अपने-अपने कार्य कर रहे हैं। वह गुणों से परे आत्मतत्त्व को पहचानता है। अर्जुन पूछते हैं कि तीनों गुणों से ऊपर उठे हुए व्यक्ति को कैसे पहचाना जाए। उसका आचरण कैसा होता है और वह इस अवस्था तक कैसे पहुँचता है? श्रीकृष्ण बताते हैं कि ऐसा व्यक्ति प्रकाश, प्रवृत्ति और मोह के उत्पन्न होने पर उनसे द्वेष नहीं करता और उनके शांत होने पर उन्हें पाने की लालसा में नहीं पड़ता। वह अपने भीतर उठती अवस्थाओं को पहचानता है, लेकिन उनमें पूरी तरह बह नहीं जाता। उसकी स्थिति साक्षी जैसी होती है। उसे यह विवेक रहता है कि गुण अपना कार्य कर रहे हैं। इस कारण मन की प्रत्येक हलचल उसकी संपूर्ण पहचान नहीं बन जाती। वह सुख-दुःख, प्रिय-अप्रिय और निंदा-प्रशंसा में समता रखता है। मान-अपमान और मित्र-विरोधी के व्यवहार से उसका आंतरिक आधार बार-बार नहीं टूटता। वह अहंकार से प्रेरित उपक्रमों की पकड़ छोड़ देता है। यह समता अनासक्ति और आत्मज्ञान से आती है। उसमें स्थिरता होती है, इसलिए वह अपने कर्म को अधिक स्पष्टता से देख सकता है। उसकी शांति परिस्थितियों को हर समय अपने अनुकूल बनाने की माँग पर निर्भर नहीं रहती। श्रीकृष्ण कहते हैं कि अविचल भक्ति से उनकी सेवा करने वाला साधक इन गुणों से ऊपर उठने योग्य होता है। इस त्रिकोण को समझने का उद्देश्य अपने मन की दशाओं को पहचानना और उनसे आगे बढ़ना है, ताकि जीवन का आधार बदलती प्रवृत्तियों से हटकर अविनाशी सत्य में स्थिर हो सके। लेखक ने इसका विस्तार अपनी निम्न पुस्तक में 60,108 शब्दों में किया है। श्रीमद्भगवद्गीता — भाग 14 — त्रिकोण