भारतीय ज्ञान परंपरा को सरल और प्रामाणिक रूप में समझाने का एक प्रयास...

11 अक्टूबर 2026 · डॉ. राजेश तकयार

भाग 5 — कर्म क्या है

भाग 5 — कर्म क्या है

अर्जुन के मन में एक प्रश्न अभी भी बना हुआ है। श्रीकृष्ण कभी कर्मों का त्याग करने की बात कहते हैं और कभी कर्मयोग की प्रशंसा करते हैं। अर्जुन उनसे पूछते हैं कि इन दोनों में उनके लिए कौन-सा मार्ग अधिक कल्याणकारी है। वे ऐसा स्पष्ट उत्तर चाहते हैं जिसे समझकर आगे बढ़ सकें। श्रीकृष्ण समझाते हैं कि संन्यास और कर्मयोग, दोनों मुक्ति तक पहुँचाते हैं। फिर भी कर्मों में रहते हुए आसक्ति छोड़ने का मार्ग अधिक सहज है। मनुष्य अपने कर्तव्य निभाते हुए भी भीतर से स्वतंत्र हो सकता है। सच्चे संन्यास की पहचान मन की अवस्था से होती है। जिसके भीतर किसी से द्वेष नहीं है और जो इच्छाओं के पीछे लगातार नहीं भागता, वह कर्म करते हुए भी संन्यासी है। जिसने संसार से दूरी बना ली, लेकिन मन में पाने और खोने की बेचैनी बनी हुई है, उसका बंधन अभी समाप्त नहीं हुआ। ज्ञान और कर्मयोग का अंतिम लक्ष्य एक ही है। ज्ञान मनुष्य को अपने वास्तविक स्वरूप की पहचान कराता है। निष्काम कर्म उसके अंतःकरण को निर्मल करते हैं। जब समझ और आचरण एक दिशा में चलने लगते हैं, तब कर्म मुक्ति की साधना बन जाते हैं। श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि संयमित और शुद्ध अंतःकरण वाला मनुष्य सभी प्राणियों में आत्मा को देखता है। वह अपने जीवन को दूसरों से पूरी तरह अलग करके नहीं समझता। इसी कारण उसका कर्म स्वार्थ की छोटी सीमा से बाहर निकलने लगता है। वह देखता, सुनता, चलता और बोलता है, लेकिन हर क्रिया के साथ अपने अहंकार को नहीं जोड़ता। उसे यह समझ रहती है कि इन्द्रियाँ अपने विषयों के साथ व्यवहार कर रही हैं। इस समझ से उसके भीतर सब कुछ अपने नियंत्रण में होने का भ्रम कम होता है। श्रीकृष्ण कमल के पत्ते का उदाहरण देते हैं। वह जल में रहता है, फिर भी जल उससे चिपकता नहीं। उसी प्रकार जो मनुष्य अपने कर्म परमात्मा को अर्पित करके करता है, वह कर्मों के बीच रहकर भी उनसे लिप्त नहीं होता। आसक्ति छोड़ने का अर्थ प्रयास में कमी करना नहीं है। योगी शरीर, मन, बुद्धि और इन्द्रियों का उपयोग आत्मशुद्धि के लिए करता है। वह कर्म को सावधानी से पूरा करता है, पर उसके परिणाम को अपनी शांति का एकमात्र आधार नहीं बनाता। फल की अनिवार्य माँग मन को बाँधती है। मनुष्य सोचता है कि इच्छित परिणाम मिला तो ही वह सुखी होगा। कर्मयोगी इस आग्रह को छोड़ता है। उसका ध्यान अपने कर्तव्य और उसके प्रति निष्ठा पर रहता है। इससे उसके भीतर स्थायी शांति का मार्ग खुलता है। अज्ञान आत्मज्ञान को ढक देता है। जब यह आवरण हटता है, तब सत्य सूर्य के प्रकाश की तरह स्पष्ट होने लगता है। मनुष्य शरीर, पद और बाहरी भिन्नताओं के पीछे उपस्थित एक ही आत्मतत्त्व को पहचानने लगता है। इसीलिए ज्ञानी की दृष्टि सम होती है। विद्वान मनुष्य हो या कोई उपेक्षित व्यक्ति, गाय हो, हाथी हो या कुत्ता—वह सभी में जीवन के उसी मूल आधार को देखता है। यह समदृष्टि उसके व्यवहार में अहंकार और तिरस्कार को कम करती है। प्रिय वस्तु मिलने पर उसका विवेक बह नहीं जाता और अप्रिय परिस्थिति आने पर उसकी स्थिरता पूरी तरह टूटती नहीं। वह जानता है कि इन्द्रियों से मिलने वाले सुखों का आरंभ और अंत है। इसलिए वह अपने भीतर ऐसे सुख को खोजता है जो बाहरी परिस्थिति पर निर्भर न हो। कामना और क्रोध का वेग उठने पर उसे सहना भी साधना है। जो इनके आते ही इनके अधीन नहीं हो जाता, वह अपने भीतर स्वतंत्रता का अनुभव करने लगता है। उसका संयम दूसरों के प्रति कठोरता नहीं बनता; वह सभी प्राणियों के हित में लगा रहता है। अंत में श्रीकृष्ण शांति का आधार बताते हैं। जो उन्हें समस्त लोकों का स्वामी, यज्ञ और तप का भोक्ता तथा सभी प्राणियों का हितैषी जानता है, वह शांति प्राप्त करता है। कर्मयोग का सार यही है—कर्तव्य करते रहना, मन को निर्मल रखना और अपने कर्मों को समर्पण के भाव से जीना। लेखक ने इसका विस्तार अपनी निम्न पुस्तक में 52,000 शब्दों में किया है। श्रीमद्भगवद्गीता — भाग 5 — कर्म क्या है

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