भारतीय ज्ञान परंपरा को सरल और प्रामाणिक रूप में समझाने का एक प्रयास...

26 अक्टूबर 2026 ·

टालमटोल और तमस

टालमटोल और तमस

कभी जरूरी काम सामने होता है और मन कहता है कि अभी थोड़ा और रुक जाएँ। यदि ऐसा बार बार हो तो अपनी आदतों को देखना उपयोगी है। चौदहवें भाग की व्याख्या तमस को विवेक पर छाने वाले आवरण की तरह समझाती है। यह आत्मनिरीक्षण का धार्मिक रूपक है; इसे किसी व्यक्ति की बीमारी, थकान या परिस्थितियों का निर्णय करने का आधार नहीं बनाना चाहिए।

आदत के पीछे छिपी अस्पष्टता

इस श्लोक में वह तम गुण की पहचान और उसके बंधन को सबसे सीधे शब्दों में बता रहे हैं। श्रीमाधव कह रहे हैं कि हे अर्जुन! तम का मूल स्रोत अज्ञान है। अर्थात सत्य का न दिखना, विवेक का धुंधला होना। जब तम बढ़ता है, तब भक्त की चेतना पर जैसे पर्दा पड़ जाता है। सही-ग़लत का भेद कम दिखाई देता है, दूरगामी परिणामों की समझ घट जाती है, और भक्त आदतों के सहारे चलने लगता है। भगवान् रुक्मिणीप्रिय कृष्ण कह रहे हैं; ‘तम मोहनं सर्वदेहिनाम्’, यानी यह सभी देहधारियों को भ्रमित करने वाला है। इससे तुम तमोगुण के गहरे प्रभाव को स्पष्ट समझ सकते हो। जब तमस् बढ़ता है, तब सबसे पहले मन की स्पष्टता प्रभावित होती है। सही और ग़लत का भेद धुंधला पड़ने लगता है। भक्त यह नहीं समझ पाता कि कौन सा कार्य उसके लिए हितकारी है और कौन सा उसे नीचे ले जाएगा। निर्णय लेने की क्षमता कमज़ोर हो जाती है, क्योंकि विवेक पर एक प्रकार का आवरण छा जाता है। यही कारण है कि वह तत्काल सुख या सुविधा को चुन लेता है, बिना यह सोचे कि उसके दूरगामी परिणाम क्या होंगे।

दूरदर्शिता का अभाव तमस् का एक प्रमुख लक्षण है। भक्त केवल वर्तमान क्षण की सहजता या आदत के अनुसार चलता है। उसे यह समझने की शक्ति नहीं रहती कि आज का छोटा-सा ग़लत कदम आगे चलकर बड़े परिणाम दे सकता है। जैसे कोई भक्त आलस्य में आवश्यक कार्य टालता रहता है, और बाद में वही टालमटोल उसके लिए समस्या बन जाती है। पर तमस् के प्रभाव में वह इस संबंध को स्पष्ट रूप से देख नहीं पाता। वह परिणामों को संयोग मानता है, कारणों को नहीं समझता।

धीरे-धीरे जीवन आदतों के सहारे चलने लगता है। भक्त सजग होकर नहीं जीता, बल्कि वही करता है जो वह पहले करता आया है। यह यांत्रिकता उसे भीतर की चेतना से दूर कर देती है। वह यह अनुभव ही नहीं कर पाता कि उसके भीतर एक जागरूक साक्षी है, जो इन सबको देख सकता है और दिशा बदल सकता है। इसी स्थिति को मैंने ‘तम मोहनं सर्वदेहिनाम्’ कहा है। ‘मोहन’ का अर्थ केवल भ्रमित करना नहीं, बल्कि वास्तविकता को ढक देना है। भक्त अपनी स्थिति को सही रूप में देख ही नहीं पाता। उसे लगता है कि वह ठीक कर रहा है, जबकि वह धीरे-धीरे जड़ता और अज्ञान में फँसता जा रहा होता है। यही कारण है कि तमोगुण का बंधन सबसे गहरा मैंने कहा है क्योंकि इसमें बंधन का बोध ही नहीं होता।

प्रमाद और कर्तव्य का संबंध

यह अवस्था चेतना के विस्मरण की है। भक्त अपने वास्तविक स्वरूप को भूलकर केवल शरीर, मन और आदतों के स्तर पर जीने लगता है। इससे उसका जीवन सीमित और असंतुलित हो जाता है। वह न तो अपने भीतर की क्षमता को पहचान पाता है, न ही अपने कर्मों की दिशा को समझ पाता है। अतः तमोगुण का प्रभाव केवल आलस्य तक सीमित नहीं है; यह विवेक को ढक लेता है, दूरदृष्टि को कम करता है और जीवन को यांत्रिक बना देता है। इस समझ से भक्त सजग हो सकता है और धीरे-धीरे उस मोह से बाहर आने का प्रयास कर सकता है। यही इस कहे का उद्देश्य है; भ्रम को पहचानकर उससे ऊपर उठना।

तम का काम है भ्रम पैदा करना, जो हानिकारक है, वह ठीक लगने लगे। जो ज़रूरी है, वह टलने लगे। जो सत्य है, वह झंझट लगे। जो भ्रम है, वह आरामदेह लगे। इसीलिए तम को मैं ‘मोह’ कह रहा हूँ; यह भक्त को वास्तविकता से हटा देता है। तम तीन मुख्य रास्तों से बाँधता है; प्रमाद, आलस्य और निद्रा।

प्रमाद का अर्थ है लापरवाही, असावधानी, और ग़लतियों की जड़। प्रमाद में भक्त जानता भी हो कि यह ठीक नहीं, फिर भी ध्यान नहीं देता। वह छोटे-छोटे संकेतों को अनदेखा करता है और धीरे-धीरे समस्या बड़ी हो जाती है। आलस्य वह जड़ता है जो भक्त को कर्तव्य से हटाती है। आलस्य के कारण काम टलता है, अनुशासन टूटता है, और आत्मविश्वास घटता है। सबसे बड़ा नुकसान यह होता है कि भक्त अपनी क्षमता जानते हुए भी उसका उपयोग नहीं करता। निद्रा यहाँ सामान्य आवश्यक नींद नहीं, बल्कि ऐसी नींद-सुस्ती है जो जागृति को दबा देती है; असमय सोना, अधिक सोना, या मन की सुस्ती। जब निद्रा-प्रधानता बढ़ती है, तब भक्ति, अध्ययन, और कर्म; सब शिथिल हो जाते हैं।

छोटे कदमों से सजगता

तम का बंधन इसलिए भी भारी है कि इसमें भक्त को अपनी गिरावट साफ दिखाई नहीं देती। रज में कम से कम बेचैनी तो होती है, सत्त्व में स्पष्टता तो होती है; तम में न बेचैनी रहती है, न स्पष्टता; बस एक ढलान रहती है। मैं ये सब कह कर भक्त को चेतावनी दे रहा हूँ कि तम की पहचान करो। जब मन टालमटोल करे, जब बहाने बढ़ें, जब सुस्ती भारी लगे, जब ‘कल देखेंगे’ का भाव बढ़े; तब भक्त समझ जाए कि तम सक्रिय है। इसका उपाय है जागृति। नियमितता, सत्संग, स्वाध्याय, शरीर की सक्रियता, और सरल अनुशासन; यही इसका उपाय है। तम अज्ञान से पैदा होकर भ्रम बढ़ाता है और प्रमाद-आलस्य-निद्रा के द्वारा बाँध देता है। इसे पहचानना ही आधी जीत है, क्योंकि पहचान के बिना सुधार शुरू नहीं होता।

भगवान् भक्तवत्सल ने तम का आधार ‘अज्ञान’ अभी बताया है, क्योंकि तम में विवेक का प्रकाश कम हो जाता है। यह उसी धारा का विस्तार है कि अज्ञान ही बंधन का मूल है, और ज्ञान ही मुक्ति का मूल है। अन्य भागों में भी उन्होंने तम से जुड़े संकेत दिए हैं; जैसे ग़लत श्रद्धा, ग़लत तप, और ग़लत आहार के सेवन से जड़ता, प्रमाद, और अंधता आना; तम के लक्षण कहा है। उपनिषदिक परम्परा में भी ‘अविद्या’ को बंधन कहा गया है और ‘विद्या’ को मुक्ति। प्रमाद यानी लापरवाही, आलस्य यानी जड़ता, निद्रा यानी सुस्ती; यही तमगुण के अवगुण हैं। भक्त को अपने भीतर तम को पहचानने की ठोस कसौटियाँ इन्हें पहचान कर समझ आती हैं। भक्ति में तम सबसे बड़ा शत्रु अक्सर ‘उदासीनता’ और ‘प्रमाद’ के रूप में आता है। मन कहता है कि आज नहीं, कल करेंगे; अभी आराम कर लेते हैं; थोड़ी देर बाद जप करेंगे। यही तम का खेल है; भ्रम पैदा करके भक्ति को भी टाल देना। तम अज्ञान से उत्पन्न है और मोह पैदा करता है। इसलिए उपाय ‘जागृति’ और ‘स्मरण’ है। भक्त जब नियमित रूप से नाम-स्मरण करता है, सत्संग करता है, और शास्त्र का स्वाध्याय करता है, तब तम का पर्दा पतला होता है। प्रमाद का भक्ति-उपाय है सावधानी; वाणी में भी, संगति में भी, और दिनचर्या में भी। आलस्य का उपाय है सेवा; कर्म के द्वारा मन को प्रभु के मार्ग पर लगाना। निद्रा की अधिकता का उपाय है संयम और नियमितता। भक्त के लिए एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि तम में गिरकर भक्त अपराध-बोध में फँस सकता है। गिरने के बाद निराश मत हो; प्रभु-स्मरण से उठो; यही इस व्याख्या का व्यावहारिक संकेत है। तम का बंधन इसलिए टूटता है क्योंकि प्रभु-स्मरण मन में प्रकाश लाता है। प्रमाद, आलस्य, और निद्रा को अपने जीवन पर हावी मत होने दो, और प्रभु-स्मरण तथा सेवा से जागृति बढ़ाओ; यही माखनचोर कह रहे हैं। तब तम का मोह घटेगा और भक्ति स्थिर होगी।

तम गुण अज्ञान से उत्पन्न होता है और सभी देहधारियों को मोह में डालने वाला है। यह देही को मुख्यतः तीन माध्यमों से बाँधता है। तम का सार है ‘धुंध’। जहाँ धुंध होती है, वहाँ सही दिशा नहीं दिखती, और भक्त आदतों के सहारे बहता रहता है। प्रमाद से वह सावधानी खो देता है; आलस्य से वह कर्तव्य टाल देता है; और निद्रा-सुस्ती से वह जागृति कम कर देता है। यह मिलकर ऐसा बंधन बनाते हैं जिसमें भक्त स्वयं को भी ठीक से नहीं समझ पाता। जैसे ही भक्त अपने भीतर टालमटोल, भारी सुस्ती, या असावधानी बढ़ती देखे, वह समझ सकता है कि तम सक्रिय है। पहचान होते ही अनुशासन, जागृति, अध्ययन, सत्संग, और सक्रिय कर्म से सुधार संभव होता है। भक्ति में यह प्रभु-स्मरण और सेवा द्वारा टूटता है। तम अज्ञानजन्य मोह है, जो प्रमाद-आलस्य-निद्रा से बाँधता है। इसे पहचानकर जागृति बढ़ाना ही मुक्ति की दिशा है।

अगला छोटा कदम चुनें

बहुत दिनों से टल रहे किसी काम को सामने रखें। उसे पूरा करने का सबसे छोटा स्पष्ट कदम क्या है? शायद किसी व्यक्ति से समय लेना, पहला पन्ना पढ़ना या आवश्यक जानकारी जुटाना। आज वही कदम उठाएँ और उसका समय तय करें। काम शुरू होने पर आगे की कठिनाई अधिक स्पष्ट दिखाई दे सकती है।

अपने प्रति कठोर निर्णय सुनाने से अधिक उपयोगी है परिस्थिति समझना। यदि थकान, बीमारी या कोई वास्तविक बाधा है तो उसे भी ध्यान में लें। अध्याय की सीख सजगता बढ़ाने की है। अपनी क्षमता के अनुसार नियमित प्रयास, आवश्यक सहयोग और ईमानदार समीक्षा से टालमटोल की आदत को समझने तथा बदलने का रास्ता खुल सकता है। सुधार की संभावना बनी है।

संदर्भ: श्रीमद्भगवद्गीता — त्रिकोण
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