5 अक्टूबर 2026 · डॉ. राजेश तकयार

विविधता में एकता

विविधता में एकता

माला को देखते समय पहले मोती दिखाई देते हैं। उन्हें जोड़े रखने वाला धागा अक्सर नजर नहीं आता। सातवें भाग में कृष्ण इसी सरल उपमा से जगत और उसके आध्यात्मिक आधार का संबंध समझाते हैं। यह चिंतन हमें अपने स्वतंत्र दिखने वाले जीवन के पीछे मौजूद संबंधों, सहयोग और एक व्यापक अस्तित्व की अनुभूति पर रुककर विचार करने को कहता है।

दिखने वाले रूप और उनका आधार

पुस्तक की व्याख्या में प्रश्न उठता है कि यदि जगत ईश्वर की शक्तियों का रूप है, तो क्या मैं यानी ईश्वर इन शक्तियों से अलग हूँ या वही इनमें विद्यमान हूँ? मैं तुम्हें स्पष्ट कह रहा हूँ कि मैं इन सबके भीतर हूँ और इनसे परे भी हूँ। मैं सागर की तरह हूँ, और ये सभी तत्व मुझ-सागर में मेरी लहरें हैं। लहरें सागर से अलग नहीं, सागर में ही उत्पन्न होती हैं, परंतु सागर लहरों में सीमित नहीं होता। मैं भी इन आठ प्रकृतियों के रूप में इस संसार में प्रकट होता हूँ, पर मेरा वास्तविक स्वरूप इन सबसे ऊँचा और निरपेक्ष है। मैं इस संसार में व्याप्त होकर भी इनसे परे हूँ। यहाँ तुम ये समझो कि कोई भी वस्तु तुच्छ नहीं है, क्योंकि हर वस्तु में ईश्वर की छवि है। धरती पर चलती चींटी से लेकर ब्रह्मांड के सबसे बड़े तारे तक, सब मेरा ही अंश हैं। सत्य यही है कि ईश्वर एक है, पर उसकी अभिव्यक्ति अनंत रूपों में है। इसे तुम ऐसा जानो जैसे यह सम्पूर्ण जगत सूत्र में गुँथे मोतियों की माला की तरह जुड़ा हुआ है। जिस प्रकार से माला के मोती अलग-अलग दिखाई देते हैं, लेकिन सबको जोड़ने वाला धागा अदृश्य होता है, वैसे ही मेरी इस सृष्टि के सभी जीव और पदार्थ स्वतंत्र लगते हैं, पर उन्हें जोड़ने वाला अदृश्य धागा यानी मैं ईश्वर इनकी चेतना हूँ। मानव प्रायः केवल मोती देखता है; रूप, नाम, वस्तु, संबंध, सब कुछ; परंतु धागा नहीं देख पाता। जो कर्मयोगी उस धागे को पहचान लेता है, वही ईश्वर को जान पाता है। संसार में कुछ भी व्यर्थ या अकेला नहीं है; सब एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है। जब यह अनुभव किसी को होता है कि हर जीव में, हर तत्व में ईश्वर की उपस्थिति है, तब उस कर्मयोगी में करुणा, नम्रता और समानता का भाव स्वतः जाग जाता है। तब वह दूसरों में भेद नहीं करता, क्योंकि उसे अब मोती नहीं केवल हर जगह वही एक धागा दिखाई देने लगता है कि यह ईश्वर है, जो सबमें व्याप्त है।

इस ज्ञान को जानकर तुम जान सकते हो कि ईश्वर से बड़ी कोई वस्तु नहीं है। क्योंकि जो कुछ है, वह उसी से है, और जो नहीं है, वह भी उसी में समाया हुआ है। ईश्वर न केवल सृष्टि का कारण हैं, बल्कि उनका सार भी हैं। ईश्वर कारण भी हैं, परिणाम भी; बीज भी हैं, वृक्ष भी; आरंभ भी हैं, अंत भी है। इस सत्य को जान लेने वाला मानव कभी अभिमान नहीं करता, क्योंकि उसे पता है कि जो भी शक्ति या सफलता उसे मिली है, वह ईश्वर की कृपा से ही मिली है। वह यह भी समझ जाता है कि संसार की कोई वस्तु स्थायी नहीं, क्योंकि जो दिखता है वह ईश्वर की लीला है, और लीला का स्वभाव है बदलते रहना। इस ज्ञान को पाने के बाद मानव संसार में रहकर भी उसमें नहीं उलझता। वह कर्म करता है, पर परिणाम में आसक्त नहीं होता, क्योंकि उसे पता है कि सब ईश्वर की इच्छा से हो रहा है। मेरी इन परा और अपरा शक्तियों के सत्य को तुम दो स्तरों पर समझो। अपरा शक्ति वह है जो भौतिक रूप से जगत में कार्यरत है। परा शक्ति वह है जो चेतना, आत्मा और जीवन का स्रोत है। एक दृश्य है और दूसरा अदृश्य है। अपरा प्रकृति वह शक्ति है जो दिखती है, और परा प्रकृति वह है जो इनको जीवन देती है। यह दोनों अलग दिखती हैं, पर वास्तव में एक ही हैं, जैसे जल और उसकी तरंग। जल बिना तरंगों के भी है, पर तरंगें बिना जल के नहीं हैं। ईश्वर भी ऐसे ही हैं; वे चेतना के स्वरूप में परा हैं और प्रकृति के रूप में अपरा हैं। जब मानव केवल अपरा को देखता है, तो उसे संसार अलग-अलग दिखता है; लेकिन जब वह परा को जान लेता है, तो उसे सबमें एक ही ईश्वर दिखने लगता है। यही दृष्टि अध्यात्म की चरम स्थिति है, जब देखने वाला और देखा जाने वाला एक हो जाए।

एकता का अनुभव व्यवहार में

यह ज्ञान जो मैंने तुम्हें बताया है, केवल दर्शन नहीं है, जीवन की दिशा है। यह पूरा ब्रह्मांड मेरी एक माला है, इसे जानने के पश्चात तुम्हें भी विनम्रता और शांति का अहसास होगा। अब तुम्हारे मन से भी शत्रुता का भाव बह गया होगा, क्योंकि मैंने तुम्हें कहा है कि हर जगह केवल परमात्मा है। अपने मन से ईर्ष्या, भय और द्वेष से अब तुम मुक्त हो जाओ। तुम ये जान लो कि जैसे मोती की चमक धागे के कारण है, वैसे ही तुम्हारा अस्तित्व भी मुझ ईश्वर के कारण है। इस समझ से तुम्हारे जीवन में कृतज्ञता आएगी। इसे जान लेने के बाद किसी भी मानव के कर्म पूजा बन जाते हैं। अब तुम्हें भी किसी बाहरी चमत्कार की खोज नहीं रहनी चाहिए, क्योंकि मैंने बताया ही है कि सब मानवों की हर सांस, हर दृश्य, हर कार्य में ईश्वर उसे देखता रहता है। यही सबसे ऊँचा सत्य है कि ईश्वर ही सब कुछ है, और सब कुछ ईश्वर में है। अंततः यह कहना कि ब्रह्मांड की सारी प्रकृतियाँ, सारी शक्तियाँ और सारा जीवन मेरा ही स्वरूप हैं, इस अध्याय में प्रस्तुत आध्यात्मिक अनुभव की दृष्टि है। जो मानव ध्यानपूर्वक देखता है, उसे यह अनुभव होने लगता है कि ईश्वर कहीं बाहर नहीं, बल्कि भीतर और बाहर दोनों जगह एक साथ है। वही हमारे शरीर की मिट्टी में है, वही हमारी आत्मा की ज्योति में है, वही सूर्य की किरण में है और वही फूल की खुशबू में है। यही कारण है कि मैंने कहा था कि तुम्हें मैं अनुभव कराऊँगा। मुझसे बड़ी कोई वस्तु नहीं है, क्योंकि जो कुछ भी है, वह मुझमें ही स्थित है।

भगवान वासुदेव का कहा यह वाक्य, केवल दार्शनिक नहीं, बल्कि अत्यंत सजीव है। इसका अर्थ है कि जब कोई किसी भी रूप में सुंदरता, सच्चाई, प्रेम या प्रकाश अनुभव करता है, तो वास्तव में वह उसी ईश्वर को छू रहा होता है। इसलिए भगवान सर्वप्रिय कह रहे हैं कि संसार से भागना नहीं है, ईश्वर के स्वरूप को समझना है; अपने कर्म से विरक्त नहीं होना, हर कर्म को ईश्वर की सेवा बनाना है; और अपने जीवन को अहंकार से मुक्त रखना है, ताकि उसमें वही दिव्यता झलक सके जो सम्पूर्ण सृष्टि में फैली हुई है। ब्रह्मांड की हर शक्ति, हर कण, हर आत्मा उसी एक परमात्मा की माला में पिरोई हुई है, और उस धागे से बड़ा, उस ईश्वर से ऊँचा कुछ भी नहीं है।

अहंकार से कृतज्ञता की ओर

कर्मयोगी को यह जानना चाहिए कि सब भगवान से ही जुड़ा है। इसलिए अहंकार छोड़कर ईश्वर को अपना आधार बनाना चाहिए। ईश्वर ही सर्वोच्च सत्ता हैं। जगत अलग-अलग दिखता है, परंतु वास्तव में सब भगवान से जुड़ा है। यहाँ जगत को ईश्वर की शक्ति से जुड़ा देखना एक आध्यात्मिक दृष्टि है। जैसे मोती धागे से जुड़े हैं, वैसे ही हम ईश्वर और एक-दूसरे से जुड़े हैं। जब अगर ये समझ लें कि सब भगवान से जुड़ा है, तो भगवान-भक्ति भी सहज हो जाती है। हमें दूसरों में भी ईश्वर का अंश देखना चाहिए। भगवान से बढ़कर कोई सत्ता नहीं है। जगत की विविधता के पीछे एक ही एकता है। सब कुछ भगवान में ही स्थित और उनसे जुड़ा है।

जिस प्रकार से धागा माला में दिखाई नहीं देता, उसी प्रकार सब सृष्टि को स्वयं में समेटे हुए ईश्वर भी दिखाई नहीं देते; मानव केवल बाहरी आवरण ही देख पाता है।

एकता की दृष्टि का व्यवहार

माला की उपमा पर विचार करते समय अपने दिन के किसी साधारण काम को देखें। भोजन की थाली तक पहुँचने में किसान, श्रमिक, परिवहन और घर के सहयोग का कितना योगदान है। पुस्तक हमारे हाथ में आती है तो लेखन के साथ संपादन, मुद्रण और पाठकों की रुचि भी जुड़ी होती है। इन संबंधों को देखना अपने योगदान को छोटा करना नहीं है। इससे हम दूसरों के श्रम के प्रति सजग होते हैं।

आध्यात्मिक एकता का भाव व्यवहार में विनम्रता और कृतज्ञता के रूप में प्रकट हो सकता है। सफलता मिलने पर सहयोगियों को याद रखना, प्रकृति का उपयोग करते हुए उसकी देखभाल करना और किसी छोटे समझे जाने वाले कार्य का सम्मान करना इसी दिशा के कदम हैं।

मतभेद फिर भी रहेंगे। सबको एक आधार से जुड़ा देखने का अर्थ यह नहीं कि हर विचार सही है या हर आचरण स्वीकार्य है। उचित और अनुचित का विवेक अपनी जगह रहेगा। अंतर इतना होगा कि असहमति में भी दूसरे की गरिमा नहीं भूली जाएगी। अदृश्य धागे का चिंतन हमें यही संवेदनशीलता दे सकता है: मेरा जीवन संबंधों के बीच है और मेरे व्यवहार का प्रभाव केवल मुझ तक सीमित नहीं रहता। इसलिए अपने कर्म में सावधानी और अपने हृदय में विस्तार रखना सार्थक है। एकता का स्मरण तभी सार्थक है जब वह हमारे व्यवहार में सम्मान बनकर दिखाई दे।

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डॉ. राजेश तकयार

डॉ. राजेश तकयार

लेखक · स्वतंत्र शोधकर्ता

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