11 अक्टूबर 2026 · डॉ. राजेश तकयार
भाग 11 — ईश्वर कौन हैं

श्रीकृष्ण की महिमा और सृष्टि के आधार का वर्णन सुनकर अर्जुन के भीतर एक नई जिज्ञासा उठती है। वे कहते हैं कि कृपा से उनका मोह दूर हुआ है। अब वे उस दिव्य स्वरूप को प्रत्यक्ष देखना चाहते हैं जिसका वर्णन उन्होंने सुना है। अर्जुन अपना अनुरोध विनम्रता से रखते हैं। यदि श्रीकृष्ण उन्हें इस दर्शन के योग्य समझते हों, तो अपना अविनाशी स्वरूप दिखाएँ। यहाँ जानने की इच्छा प्रत्यक्ष अनुभव की आकांक्षा बन जाती है। श्रीकृष्ण बताते हैं कि साधारण नेत्रों से उनके इस स्वरूप को देखना संभव नहीं है। वे अर्जुन को दिव्य दृष्टि देते हैं। उसके द्वारा अर्जुन ऐसा विस्तार देखते हैं जिसमें अनेक रूप, अनेक दिशाएँ और पूरा जगत एक साथ समाहित हैं। उस स्वरूप में असंख्य मुख, नेत्र और भुजाएँ हैं। उसका तेज अपरिमित है। उसका कोई स्पष्ट आरंभ, मध्य या अंत दिखाई नहीं देता। जो संसार अलग-अलग वस्तुओं और प्राणियों में बँटा हुआ प्रतीत होता था, वह एक ही विराट आधार में दिखाई देता है। अर्जुन विस्मय से भर जाते हैं। वे हाथ जोड़कर प्रणाम करते हैं। अब उनके सामने ईश्वर के विषय में सुनी हुई कोई धारणा नहीं, ऐसा अनुभव है जो उनकी सीमित समझ से बहुत बड़ा है। वे श्रीकृष्ण को अविनाशी सत्य, जगत का परम आश्रय और सनातन धर्म का रक्षक कहते हैं। सभी दिशाएँ उसी स्वरूप से व्याप्त हैं। कोई ऐसा स्थान नहीं दिखाई देता जो उससे बाहर हो। पर यह दर्शन केवल सौम्यता और सुंदरता का अनुभव नहीं है। अर्जुन उसमें प्रचंडता और संहार का रूप भी देखते हैं। उनकी स्थिरता डगमगाने लगती है। जो कुछ उत्पन्न हुआ है, उसे अंत की ओर जाते हुए देखकर वे व्याकुल हो उठते हैं। वे पूछते हैं कि इस उग्र रूप में श्रीकृष्ण कौन हैं। वे उनकी प्रवृत्ति समझना चाहते हैं। अर्जुन के लिए अब ईश्वर का प्रश्न सृष्टि के साथ विनाश के रहस्य से भी जुड़ गया है। श्रीकृष्ण अपने को लोकों का क्षय करने वाला काल बताते हैं। समय की व्यवस्था किसी एक व्यक्ति की इच्छा पर निर्भर नहीं है। मनुष्य अपने को घटनाओं का एकमात्र निर्माता समझता है, जबकि उसके सामने अस्तित्व का कहीं अधिक व्यापक क्रम चल रहा होता है। अर्जुन को निमित्त बनने का उपदेश मिलता है। उन्हें अपने कर्तव्य का पालन करना है, लेकिन उस अहंकार के बिना जो सब कुछ केवल अपने द्वारा संपन्न मानता है। विराट दर्शन उनके कर्म की जिम्मेदारी के साथ उनकी सीमित कर्तृत्व-दृष्टि को भी स्पष्ट करता है। अर्जुन का मन गहरी विनम्रता से भर जाता है। वे स्मरण करते हैं कि परिचय और स्नेह में उन्होंने श्रीकृष्ण को केवल अपना मित्र समझकर कई बार सहज संबोधन किए थे। अब वे उस अपरिमित महिमा को पहचानकर क्षमा माँगते हैं। वे प्रार्थना करते हैं कि जैसे पिता पुत्र की भूल सहता है, मित्र मित्र की और प्रिय अपने प्रिय की, वैसे ही श्रीकृष्ण उनकी भूलों को क्षमा करें। इस प्रार्थना में श्रद्धा और आत्मीयता दोनों हैं। अर्जुन विराट रूप को देखकर आनंदित भी हैं और भयभीत भी। वे श्रीकृष्ण से पुनः सौम्य रूप दिखाने की विनती करते हैं। श्रीकृष्ण उन्हें आश्वस्त करते हैं और परिचित शांत स्वरूप में दर्शन देते हैं। अर्जुन का मन फिर स्थिर होने लगता है। इसके बाद श्रीकृष्ण बताते हैं कि उनके वास्तविक स्वरूप को अनन्य भक्ति से जाना और प्राप्त किया जा सकता है। बाहरी साधनों की पूर्णता के साथ अंतःकरण का प्रेमपूर्ण समर्पण आवश्यक है। अंतिम शिक्षा जीवन के आचरण में उतरती है। जो उनके लिए कर्म करता है, उन्हें अपना परम लक्ष्य मानता है, आसक्ति से मुक्त रहता है और किसी प्राणी से वैर नहीं रखता, वह उन्हें प्राप्त होता है। विराट दर्शन का फल ऐसी भक्ति है जिसमें विनम्रता, कर्तव्य और सर्वभूतों के प्रति अवैर एक साथ उपस्थित हों। लेखक ने इसका विस्तार अपनी निम्न पुस्तक में 92,496 शब्दों में किया है। श्रीमद्भगवद्गीता — भाग 11 — ईश्वर कौन हैं