भारतीय ज्ञान परंपरा को सरल और प्रामाणिक रूप में समझाने का एक प्रयास...

27 अक्टूबर 2026 ·

भटकते मन को सँभालें

भटकते मन को सँभालें

ध्यान के लिए बैठते ही कभी पुरानी बात याद आती है, कभी अधूरा काम और कभी भविष्य की चिंता। तब मनुष्य समझ लेता है कि वह ध्यान के योग्य ही नहीं है। गीता का यह श्लोक उस निराशा को नया अर्थ देता है। मन का भटकना दिखाई देना भी सजगता की शुरुआत हो सकता है; अगला कदम उसे धैर्य से वापस लाना है।

भटकते मन को समझें

श्रीमद्भगवद्गीता में भाग 6 में कहा गया यह श्लोक संख्या 26 है। यहाँ भगवान श्रीकृष्ण ध्यानयोग यानी आत्मसंयम की सबसे बड़ी चुनौती और उसका समाधान अर्जुन को बता रहे हैं कि चंचल मन को बार-बार आत्मा में कैसे लगाया जाए।

सर्वप्रथम कृष्ण कहते हैं ‘मनश्चञ्चलमस्थिरम्’ यानी हे भारत! मन का स्वभाव ही चंचल और अस्थिर है। वह कभी भूतकाल, कभी भविष्य, कभी विषय-वासनाओं और कभी कल्पनाओं में दौड़ता रहता है। ध्यान के समय यही सबसे बड़ी कठिनाई होती है। मानव का मन अद्भुत है। यह एक क्षण में यहाँ होता है और अगले ही क्षण कहीं और पहुँच जाता है। यही मन नियंत्रित हो जाए तो कर्मयोगी ईश्वर को पा सकता है, और यही मन यदि असंयमित हो तो वह बंधन और दुःख का कारण बना रहता है। वह कभी भूतकाल में दौड़ता है, कभी भविष्य की चिंताओं में उलझता है, कभी विषय-वासनाओं की ओर आकर्षित होता है और कभी कल्पनाओं के संसार में खो जाता है। यही कारण है कि जब कोई मानव ध्यान करने बैठता है तो सबसे बड़ी कठिनाई मन ही बनता है।

यह मन का पहला स्वभाव है कि वह ध्यान में बैठते ही भूतकाल में भटकना आरम्भ कर देता है। मन बार-बार पुरानी घटनाओं को याद करता है। कभी अच्छे अनुभवों में उलझ जाता है, कभी बुरे प्रसंगों से दुःखी हो जाता है। दूसरा मन भविष्य की चिंता में खो जाता है। आने वाले समय की कल्पनाएँ करता रहता है। कल क्या होगा? भविष्य सुरक्षित है या नहीं? इन चिंताओं से मन स्थिर नहीं हो पाता। और इस कारण कर्मयोगी का ध्यान भी नहीं लगता। कुछ और नहीं तो मन को विषय-वासनाओं का आकर्षण महसूस होने लगता है। कभी स्वादिष्ट भोजन, कभी धन, कभी यश और कभी कोई इन्द्रिय-सुख; ये सब मन को खींचते हैं। मन बार-बार इन्हीं में दौड़ता रहता है। कभी-कभी मन कल्पनाओं में खो जाता है। मन को यह आदत भी है कि वह कभी भी कोई काल्पनिक दुनिया रच लेता है। ध्यान में बैठा मानव सोचता है कि वह अमुक स्थान पर घूम रहा है या अमुक वस्तु उसके पास है।

बारंबार लौटना ही अभ्यास

ध्यान की सबसे बड़ी कठिनाई ही मन है। और ध्यान का अर्थ है कि मन को एक बिंदु पर स्थिर करना। लेकिन जब मन का स्वभाव ही अस्थिर हो तो यह सबसे बड़ी कठिनाई बन जाती है। मानव आँख बंद करता है और ईश्वर का ध्यान करना चाहता है, परंतु मन पुरानी बातों की ओर चला जाता है। इस प्रकार ध्यान गहरा नहीं हो पाता। कर्मयोगी को बार-बार निराशा होती है कि मन तो संभलता ही नहीं है।

सबसे पहले तो कर्मयोगी को ये समझना होगा कि मन का चंचल होना स्वाभाविक है। जैसे हवा का प्रवाह रुक नहीं सकता, वैसे ही मन भी बिना अभ्यास के स्थिर नहीं हो सकता। यदि कोई मानव यह सोच ले कि ध्यान में बैठते ही मन तुरंत शांत हो जाएगा, तो यह भ्रम है। ध्यान एक अभ्यास है। धीरे-धीरे, क्रमशः ही मन नियंत्रित होता है। मन को स्थिर करने के अभ्यास पर भी ध्यान देना चाहिए। पहला तो श्वास पर ध्यान देना होगा। जब कोई अपनी श्वास को देखता है, उसकी गति को अनुभव करता है, तो उसका मन धीरे-धीरे एकाग्र होने लगता है। अगर ऐसा करने में नियमितता है तो आसान हो जाता है। हर दिन एक ही समय पर ध्यान करना मन को आदत में डालता है। सत्संग और अच्छे विचार; जैसे संगति वैसी मन की दिशा बना देते हैं। अच्छे विचारों और संतों के साथ मन का नियंत्रण आसान हो जाता है। अगर कर्मयोगी का जीवन संयमित हो तो भी ये आसान हो जाता है। इसके लिए कर्मयोगी को अपने भोजन, नींद और कर्म संतुलित करने होंगे; तो अभ्यास के लिए अनुकूल परिस्थिति बन सकती है।

एक उपमा है कि मन बंदर की तरह है। जैसे बंदर कभी एक डाल से दूसरी डाल पर कूदता है, वैसे ही मन भी एक विचार से दूसरे विचार पर जाता है। बंदर को धीरे-धीरे प्रशिक्षित किया जा सकता है, वैसे ही मन को भी अभ्यास से संयमित किया जा सकता है। जब तक लहरें उठती रहती हैं, सागर स्थिर नहीं दिखता। जब लहरें शांत हो जाती हैं तो सागर का गहरापन दिखाई देता है। ध्यान वही स्थिति है जब मन की लहरें शांत हो जाती हैं। यदि हवा चल रही हो तो दीपक की लौ काँपती रहती है। मन भी यदि विषयों और कल्पनाओं में डोलता रहे तो ध्यान स्थिर नहीं होता। जब हवा बंद हो जाए तो लौ सीधी हो जाती है। उसी तरह जब इच्छाएँ और चिंताएँ रुकती हैं तो मन ध्यान में स्थिर हो जाता है।

मन को नियंत्रित करने का एक ही उपाय आसान है कि अभ्यास और धैर्य कर्मयोगी बनाए रखे। अभ्यास का अर्थ है बार-बार मन को वापस ध्यान में लाए। चाहे वह हज़ार बार भटके, कर्मयोगी उसे धैर्य से वापस लाए। धैर्य का अर्थ ही है निराश न होना। धीरे-धीरे मन समझता है कि बाहर भागने से कुछ नहीं मिलेगा। तभी वह भीतर ठहरना सीखता है।

दैनिक जीवन में सजगता

जब मन संयमित हो जाता है तो ध्यान गहरा होने लगता है। अब कर्मयोगी अनुभव करता है कि उसके भीतर शांति है। आत्मा का प्रकाश प्रकट हो रहा है। सुख-दुःख, भूत-भविष्य से मन मुक्त हो रहा है। यह अवस्था केवल निरंतर अभ्यास से ही आती है। मन का स्वभाव तो चंचल और अस्थिर है। लेकिन निराश होने की आवश्यकता नहीं है। अभ्यास, संयम और धैर्य से मन को धीरे-धीरे नियंत्रित किया जा सकता है। जब मन स्थिर होता है तो ध्यान गहरा होता है और कर्मयोगी आत्मा का अनुभव करता है। यही स्थिति जीवन का वास्तविक सुख और शांति देती है; यह इस आध्यात्मिक चिंतन की दिशा है।

‘यतो यतो निश्चरति’, मन जहाँ-जहाँ भी भागता है, इन्द्रिय विषयों में, इच्छाओं में, भय में या स्मृतियों में; कर्मयोगी को सदैव सजग रहना चाहिए। ‘ततो ततो नियम्य’ अर्थात कर्मयोगी का कर्तव्य है कि मन को बार-बार संयमित करे। यदि मन दस बार भटके, तो दस बार उसे वापस लाना है। साधना का अर्थ है निरंतर अभ्यास और धैर्य।

‘आत्मन्येव वशं नयेत्’, मन को अंततः आत्मा में ही स्थिर करना है। जब मन आत्मा में ठहर जाता है, तभी समाधि और शांति प्राप्त होती है। यह केवल अभ्यास और निरंतर प्रयास से ही संभव है। साधना का सार ही यह है कि मन को बार-बार आत्मा में लाना है। मन का चंचल होना दोष नहीं है, बल्कि उसका स्वभाव है। और स्वभाव धीरे-धीरे बदला जा सकता है। परंतु सच्चे कर्मयोगी की दृढ़ता यह है कि वह मन को बार-बार वापस लाता है। यही निरंतर अभ्यास और वैराग्य का भेद है। बार-बार मन को लौटाने का अभ्यास ही ध्यानयोग की सफलता की कुंजी है।

छोटा अभ्यास, लगातार वापसी

इस विचार को अपनाने के लिए शुरुआत बहुत बड़ी रखने की आवश्यकता नहीं है। कुछ शांत मिनट चुनें। आराम से बैठकर अपने ध्यान को किसी सरल आधार पर रखें, जैसे सहज आती जाती श्वास या अपने प्रिय नाम का स्मरण। विचार आने लगें तो तुरंत स्वयं पर नाराज न हों। पहले पहचानें कि ध्यान कहाँ चला गया है, फिर धीरे से चुने हुए आधार पर लौट आएँ। विचारों को बलपूर्वक रोकने की कोशिश के बजाय लौटने की इस प्रक्रिया को महत्व दें।

मान लें कि बैठने के थोड़ी देर बाद किसी पुराने विवाद की याद आती है। मन संवाद बनाने लगता है और आप कल्पना में किसी को उत्तर देने लगते हैं। जैसे ही इसका बोध हो, मन ही मन स्वीकार करें कि अभी स्मृति आई है। फिर वर्तमान अभ्यास पर लौटें। इसमें हार जीत की गिनती जरूरी नहीं है। आपने भटकाव पहचाना और वापसी की, यही उस क्षण का अभ्यास है।

यही सजगता बातचीत और काम में भी उपयोगी है। किसी की बात सुनते हुए यदि मन अपना उत्तर बनाने लगे, तो वापस उसकी बात पर ध्यान दें। पुस्तक पढ़ते हुए आँखें आगे बढ़ जाएँ और अर्थ छूट जाए, तो रुककर वही अनुच्छेद फिर पढ़ें। काम के बीच बिना कारण बार बार फोन उठे, तो अपनी आदत पहचानकर उसे अलग रख दें। इन साधारण अवसरों में भी मन को लौटाने की क्षमता विकसित होती है।

अभ्यास को अपनी तुलना का नया विषय मत बनाएँ। किसी दूसरे का अनुभव सुनकर अपनी साधना को छोटा समझना भी एक भटकाव हो सकता है। नियमितता का अर्थ कठोरता नहीं; अपनी परिस्थिति के अनुसार फिर जुड़ना है। एक दिन छूट जाए तो अगले अवसर पर सरलता से शुरू करें। इस श्लोक का आश्वासन यही है कि चंचल मन साधना के बाहर नहीं है। उसी को साथ लेकर, धैर्य से और बार बार लौटते हुए आगे बढ़ना है।

ध्यान में कठोर मूल्यांकन करने के बजाय धैर्यवान साथी की तरह मन को लौटने में सहायता दें। नियमित अभ्यास की यह कोमलता निराशा में फिर शुरुआत करने और अपने अनुभव को स्वीकार करने का अवसर दे सकती है।

संदर्भ: श्रीमद्भगवद्गीता — आत्मसंयम
बाकी लेख लोड हो रहे हैं…