मेहनत करने के बाद भी कभी लगता है कि हम वहीं खड़े हैं। दिन व्यस्त बीतता है, थकान भी होती है, लेकिन इच्छित काम आगे नहीं बढ़ता। ऐसे समय केवल प्रयास बढ़ान
लेख पढ़ें →5 अक्टूबर 2026 · डॉ. राजेश तकयार
कर्म और परिणाम की चिंता

हम काम शुरू करते ही उसके परिणाम की कल्पना करने लगते हैं। प्रशंसा मिलेगी या आलोचना, सफलता मिलेगी या असफलता, यह चिंता कई बार काम से अधिक जगह घेर लेती है। गीता का प्रसिद्ध कर्मयोग हमें अपने प्रयत्न की जिम्मेदारी समझाता है। लक्ष्य सामने रहे, पर मन परिणाम की बेचैनी में इतना न उलझे कि आज का जरूरी काम ही अधूरा रह जाए।
कर्म और अधिकार का संबंध
वे कहते हैं कि प्रत्येक मानव को केवल अपना कर्तव्य अपने कर्म द्वारा पूर्ण करना चाहिए। उसे किसी भी प्रकार के फल की इच्छा नहीं रखनी चाहिए। परंतु हम मानव ही तो है जो बेटा होते ही बुढ़ापे का सहारा आ गया, सोचने लगते हैं। किसी की उस की मुश्किल में मदद करके सोचते हैं कि कभी यह भी मेरे काम आयेगा। घर में स्वयं के बेटी के जन्म पर यही विचार आता है कि इसका कन्यादान करके जीवन के सबसे बड़े पुण्य के भागीदार हम भी बन जाएंगे। खूब धन-दौलत आने पर सोचने लगते हैं कि अब हम भी पैसे वाले हो गये, अब हमारा भी नाम होगा, अब मैं अपनी सारी इच्छाएं पूरी कर सकूँगा इत्यादि-इत्यादि। फल की इच्छा का उठना ये मानव का स्वभाव है। परंतु श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि ऐसा नहीं होना चाहिए।
श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि प्रत्येक मानव इस धरती पर केवल कर्म करने के लिए ही आता है। उसका अधिकार केवल कार्य करने पर ही है। फल पर कोई अधिकार नहीं है। कोई कर्म करने का कारण केवल फल नहीं होता, उसे कर्तव्य समझ कर ही करना चाहिए। सूर्य को कोई जल अर्पण करेगा, कोई उनकी आरती करेगा, कोई उनकी पूजा-अर्चना करेगा, ये सोच कर वे जीवन देने नहीं आता। संसार को जीवन और रोशनी देना उनका कार्य है, यही सोच कर वे आते हैं। कोई स्वार्थ भावना नहीं है उनके कार्य में। ऐसी ही भावना प्रत्येक मानव में भी कार्य करते समय रहनी चाहिए।
चिंता के बीच कर्तव्य
एक दूसरे उदाहरण में समझे, जब किसी को मालूम है कि मेरे इस कार्य के करने से ये हानि हो सकती है या ये लाभ हो सकता है, हर कोई कार्य करेगा ही नहीं और या फिर केवल एक ही प्रकार के कार्य सभी करने लगेंगे। अर्जुन एक योद्धा है, अन्याय के विरुद्ध खड़ा होना या उसे समाप्त करना उसका कर्तव्य है परंतु वे मर सकता है इस भय से अगर वे युद्ध से विमुख हो जाए या फिर युद्ध में उसे अपनों को मारना होगा, ये सोच कर युद्ध ना करें तो उसे फल का तो पता चल ही गया है। परंतु जो दूसरों के संग अन्याय हो रहा है उस के बारे में वह कुछ नहीं सोच रहा, इसी को भगवान उसे समझा रहे हैं। अगर मानव कर्म को केवल उसके फल के लिए करता है, तो वह अपने कार्य को सही उद्देश्य से नहीं कर रहा है। कर्मफल के प्रति लगाव या आसक्ति भी नहीं होनी चाहिए, क्योंकि जब किसी कार्य के फल की अपेक्षा होती है, तो मानव का मन और बुद्धि अस्थिर हो जाते हैं और वह कार्य में पूरी तरह से समर्पित नहीं हो पाता।
करने योग्य कोई भी कार्य करना ही चाहिए, चाहे उस के करने में कितना भी भावनात्मक कारण क्यों ना जुड़ा हो, यही श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं। भगवान श्रीकृष्ण यह भी कहते हैं कि कर्म न करने में भी आसक्ति नहीं होनी चाहिए। कार्य न करना भी कर्म के समान ही होता है। इसलिए मानव को कर्म करने से भागना नहीं चाहिए। कर्म से भागना, या कार्यों को टालना, भी एक प्रकार की आसक्ति ही है। इसलिए कर्म का होना अत्यंत आवश्यक है, लेकिन वह कर्म जो निष्कलंक और निःस्वार्थ भाव से किया जाए। हमें अपने कर्मों का उत्तरदायित्व निभाना चाहिए, लेकिन बिना किसी अपेक्षा या फल की चिंता किए। यदि तुम कर्मफल के कारण काम करते हो, तो तुम्हारी बुद्धि विचलित होगी और तुम सांसारिक बंधनों में फंस जाओगे। कर्म के प्रति आकर्षण नहीं होना चाहिए, क्योंकि इसका अर्थ है कि तुम सांसारिक बंधनों में फंसे हुए हो। ऐसा करने से तुम कर्म से अकर्म के तत्व से जुड़ जाओगे।
कर्मयोग का यह सिद्धांत श्रीमद्भगवद्गीता के सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपदेशों में से एक है। भगवान श्री कृष्ण के अनुसार, जो मानव कर्म करता है, वह कर्मफल के बिना, स्वयं के कर्तव्य को समझते हुए, अपने कार्य को निष्कलंक और शुद्ध भावना से करता है, वही योगी होता है। वह न केवल बाह्य रूप से कर्म करता है, बल्कि उसका मन भी उस कार्य से आध्यात्मिक उन्नति की दिशा में स्थिर होता है। हमें सिर्फ क्रम करने का ही अधिकार है, न कि उसके परिणाम को नियंत्रित करने का। हम जो भी कार्य करते हैं, उसका परिणाम हमारे कर्मों के अनुसार होता है, लेकिन उसका नियंत्रण केवल भगवान के हाथ में होता है। अगर हम कर्म के फल के बारे में ज्यादा सोचते हैं, तो वह हमें मानसिक तनाव और अशांति की ओर ले जाता है। कर्म का सही रूप यही है कि हम उसे निःस्वार्थ भाव से, भगवान के प्रति समर्पण के साथ करें, बिना किसी फल की कामना किया करें। हमें कर्म को कर्तव्य और धर्म के रूप में देखना चाहिए, न कि फल के दृष्टिकोण से।
समर्पण से काम की शुद्धि
यहाँ पर सबके लिए ये समझना बहुत ज़रूरी है कि श्रीकृष्ण के कहने का भाव क्या है। किसी कार्य को बिना फल की चिन्ता के करना क्या होता है, इसे ज़रूर जानना चाहिए। कोई भी मानव जब किसी कार्य को करने लगता है तो उसी समय से उसके मन में लालसाएं उठने लगतीं हैं। भगवान कृष्ण उन्हीं की बात कर रहे हैं। उनका कहना है कि जब भी कोई कार्य करे तो उसे करते हुए यह न सोचे कि वह अपने लिए कर रहा है। उसे निस्वार्थ भाव से कार्य करना चाहिए। उसे ये सोचना चाहिए कि मुझे पूरे मन से ये कार्य करना है। सफलता या असफलता तो प्रभु के हाथ में है। मेरा धर्म तो यह है कि मैं इस कार्य को अपनी पूरी लग्न और मेहनत से पूर्ण करूँ। उसमें कोई कमी नहीं रहनी चाहिए। अगर मैं इसके फल के बारे में चिन्ता करूँगा तो फिर मेरी सफलता में त्रुटि रहने की सम्भावना बड़ जाएगी। क्योंकि मन एकाग्र नहीं रह पाएगा। एकाग्र मन का रहना, यही कार्य के सफल होने की गारंटी बनेगा, अगर कार्य को बिना किसी फल की चिन्ता के समाप्त कर लिया तो। किसी भी कार्य के सफल होने के पीछे, करने वाले की मेहनत से ज्यादा, उसका एकाग्र होना आवश्यक है। अगर उसका मन एकाग्र रहे तो प्रयत्न अधिक सजग हो सकता है; परिणाम कई परिस्थितियों से बनता है।
कर्मयोग का उद्देश्य यही है कि मानव अपने कार्यों को भगवान के प्रति समर्पित कर दे, बिना किसी अपेक्षा के। जब हम इस प्रकार कर्म करते हैं, तो न केवल हम अपने जीवन को संतुलित रखते हैं, बल्कि हम मानसिक शांति, आत्म-साक्षात्कार और भगवान के साथ एकात्मता की ओर बढ़ते हैं। हमें रात को सोते समय ईश्वर से रोजाना कहना चाहिए कि हे प्रभु! आज मैंने सारे दिन में जो कुछ भी किया है, वे आप के श्री चरणों में अर्पित है, जो मैंने शरीर से किया, तन से किया, मन से किया, या फिर हृदय से किया और या फिर मैं कर नहीं पाया, सब आप के श्री चरणों में अर्पण है। आप देखिए गा आप को बहुत गहरी और लम्बी नींद आयेगी। सुबह आप ताजगी महसूस करते हुए उठेंगे और नये कार्यों में लग जाएंगे। इससे आप को कभी भी किसी कार्य के करने का ना तो दुःख होगा और ना ही किसी कार्य के, ना करने का दुःख होगा। आपको कभी घमंड भी नहीं होगा क्योंकि आप की आत्मा आपसे यही कहेगा कि आपने कुछ भी नहीं किया जो किया या हुआ वे सब तो ईश्वर ने किया या फिर उसी की इच्छा से हुआ। फल की इच्छा से मुक्त होने का सबसे कारगर और आसान तरीका यही है। इसका सबसे बड़ा लाभ ये होता है कि अगर आप ने बीते दिन में कोई ग़लत कार्य किया या फिर हो गया है तो आप दुबारा से उस कार्य को नहीं करेंगे। क्योंकि दुबारा उस ग़लत कार्य को भगवान को अर्पण करते हुए आपका हृदय कांपेगा। इसके पश्चात आपके सभी कार्य धर्म अनुसार होने लगेंगे। धर्म अनुसार कार्य करना, यही कर्मयोग है।
आज अपने प्रयत्न को स्पष्ट करें
किसी एक काम को चुनकर कागज पर दो बातें लिखें। पहली, आज उसके लिए मैं क्या कर सकता हूँ। दूसरी, परिणाम की कौन सी बात मेरे नियंत्रण से बाहर है। पहली सूची के अनुसार अपना समय लगाएँ और दूसरी को सोचकर स्वयं को थकाने की आदत पहचानें। इसका अर्थ तैयारी छोड़ना नहीं है। तैयारी, सीखना और भूल सुधारना भी कर्म हैं।
काम पूरा होने पर केवल प्रशंसा या लाभ की गिनती न करें। यह भी देखें कि क्या आपने ईमानदारी बरती, अपनी क्षमता का उपयोग किया और किसी की उचित बात सुनी। यदि परिणाम आशा के अनुसार नहीं आया, तो अनुभव से सीखकर अगला प्रयास सुधारें। इस तरह कर्मयोग दैनिक जीवन में अभ्यास बनता है। हम लक्ष्य रखते हैं, पर अपना पूरा मूल्य एक परिणाम से तय नहीं करते। अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठा भीतर का अधिक स्थिर सहारा बन सकती है।






































