माधवशिव के ‘अग्नि और सोम’ अध्याय में अग्नि परिवर्तन और तेज का, जबकि सोम शीतलता और पोषण का प्रतीक है। दोनों का संतुलन संसार को धारण करता है। यह लेख पूछता है: परिवर्तन
लेख पढ़ें →9 अक्टूबर 2026 · डॉ. राजेश तकयार
गुणों से परे समत्व

जब भीतर का मौसम बदलता है
एक ही व्यक्ति कभी शांत और स्पष्ट अनुभव करता है, कभी किसी काम को पाने की बेचैनी में घिर जाता है, और कभी कुछ भी करने की इच्छा खो देता है। इन अवस्थाओं को हम अक्सर अपना पूरा स्वरूप मान लेते हैं: “मैं ही बहुत शांत हूँ”, “मैं ही ऐसा बेचैन व्यक्ति हूँ”, या “मुझसे कुछ नहीं होगा।” श्रीमद्भगवद्गीता का चौदहवाँ अध्याय इस अनुभव को प्रकृति के तीन गुणों—सत्त्व, रज और तम—के संदर्भ में देखता है। गुण मन और व्यवहार में अलग-अलग प्रकार की प्रवृत्तियाँ उत्पन्न करते हैं; वे बदलते रहते हैं, और एक समय में कोई एक अधिक प्रभावी हो सकता है।
भाग 14 का शीर्षक ‘त्रिकोण’ इसी पारस्परिक खिंचाव की ओर संकेत करता है। अध्याय गुणों की पहचान भर नहीं कराता; वह अर्जुन के प्रश्न के माध्यम से यह भी पूछता है कि उनसे ऊपर उठने वाले व्यक्ति को कैसे पहचाना जाए। अध्याय के श्लोक 21 में अर्जुन तीन बातें जानना चाहते हैं: गुणातीत के लक्षण क्या हैं, उसका आचरण कैसा होता है, और वह इन गुणों को किस प्रकार पार करता है। उत्तर क्रमशः भीतर की दृष्टि, व्यवहार की स्थिरता और भक्ति के आधार को सामने लाता है।
अवस्थाओं को देखना, उनसे लड़ना नहीं
श्रीकृष्ण के उत्तर में पहला संकेत यह है कि गुणातीत व्यक्ति सत्त्व से आने वाले प्रकाश, रज से आने वाली प्रवृत्ति और तम से आने वाले मोह के प्रकट होने पर उनसे द्वेष नहीं करता; और उनके हट जाने की लालसा भी नहीं करता। इस कथन का अर्थ यह नहीं कि विवेक, कर्म या जागरूकता का कोई मूल्य नहीं। अध्याय पहले ही गुणों के भिन्न प्रभाव समझाता है। यहाँ ध्यान इस बात पर है कि मनुष्य उन प्रभावों को देखकर उनसे अपनी स्थायी पहचान न बना ले।
कभी मन में स्पष्टता हो तो उसे साधना और शुभ कर्म में लगाना उपयोगी है। कभी बहुत सारी इच्छाएँ या सक्रियता उठे तो उनके पीछे का उद्देश्य जाँचना चाहिए। कभी आलस्य या भ्रम छा जाए तो उसे पहचानकर आवश्यक सावधानी अपनानी चाहिए। पर इन स्थितियों में से किसी एक को “मैं” का अंतिम प्रमाण मान लेना भीतर की स्वतंत्रता घटाता है। गुण आते-जाते हैं; उन्हें देखने वाला विवेक उनसे कुछ दूरी बना सकता है।
श्लोक 23 का आशय है कि ऐसा व्यक्ति गुणों से विचलित नहीं होता और समझता है कि गुण ही गुणों के क्षेत्र में प्रवृत्त हैं। यह दृष्टि अपने कर्मों की जिम्मेदारी से भागना नहीं है। इसका उपयोग कर्म के भीतर चल रही प्रेरणा को समझने के लिए है। यदि क्रोध उठे, तो “मैं ऐसा ही हूँ” कहकर उसे उचित ठहराने के बजाय देखा जा सकता है कि मन में कौन-सी प्रवृत्ति सक्रिय है और अब उचित कर्म क्या होगा। यदि सफलता से उत्साह आए तो उसे अहंकार का आधार बनाने के बजाय कृतज्ञता और सावधानी के साथ काम आगे बढ़ाया जा सकता है।
यह साक्षीभाव निष्क्रियता नहीं, बल्कि प्रतिक्रिया और उत्तर के बीच विवेक की जगह बनाता है। व्यक्ति परिस्थिति को देखता है, उसका प्रभाव समझता है और फिर भी अपने निर्णय को उसके हवाले नहीं कर देता। गुणों का ज्ञान तभी उपयोगी है जब वह मनुष्य को अपने व्यवहार के प्रति अधिक उत्तरदायी बनाए।
समत्व का अर्थ संवेदनहीनता नहीं
श्लोक 24–25 में श्रीकृष्ण सुख-दुःख, मिट्टी-पत्थर-सोना, प्रिय-अप्रिय, निंदा-प्रशंसा, मान-अपमान और मित्र-शत्रु के प्रसंगों में सम रहने वाले गुणातीत भक्त का वर्णन करते हैं। यह समानता बाहरी वस्तुओं की कीमत मिटा देने या अन्याय को अनदेखा करने का निर्देश नहीं है। सोने और मिट्टी का व्यावहारिक मूल्य अलग रहता है; मित्र और शत्रु के साथ व्यवहार में भी आवश्यक भेद हो सकता है। समत्व का केंद्र यह है कि मूल्य, प्रशंसा या विरोध मनुष्य के भीतर के धैर्य और विवेक पर अधिकार न कर लें।
यदि प्रशंसा ही आत्म-मूल्य का एकमात्र स्रोत बन जाए तो उसकी अनुपस्थिति व्यक्ति को तोड़ सकती है। यदि आलोचना को सुनना असंभव हो जाए तो सुधार का रास्ता बंद हो सकता है। इसी तरह मान मिलने पर विनम्रता और अपमान मिलने पर मर्यादित उत्तर—दोनों के लिए भीतर की स्थिरता चाहिए। समत्व का अभ्यास व्यक्ति को उचित बात स्वीकार करने, अनुचित बात का विवेकपूर्ण प्रतिकार करने और दोनों स्थितियों में अपने मूल उद्देश्य को न भूलने में मदद देता है।
‘मित्र’ और ‘शत्रु’ के प्रति सम होने का अर्थ हानि पहुँचाने वाले आचरण को अनुमति देना नहीं है। इसका अर्थ है कि द्वेष निर्णय का स्वामी न बने। उचित सीमा बनाना, सुरक्षा करना और सत्य बोलना संभव है, बिना इस आग्रह के कि प्रतिक्रिया में अपने भीतर भी वही कटुता बसाई जाए। गीता का यह वर्णन भावनाओं को मिटाने का दावा नहीं करता; यह उनके बीच धैर्यपूर्वक टिके रहने की दिशा देता है।
श्लोक 25 गुणातीत व्यक्ति को अनावश्यक आरंभों और अहंकारी उपक्रमों से मुक्त बताता है। इसे किसी काम को शुरू ही न करने की सलाह नहीं समझना चाहिए। जीवन के लिए आवश्यक कर्म, सेवा और कर्तव्य बने रहते हैं। संकेत उस बेचैन विस्तार की ओर है जिसमें व्यक्ति हर काम को अपनी प्रतिष्ठा, नियंत्रण या विजय का प्रमाण बनाना चाहता है। जब कर्तापन का आग्रह कम होता है, तो कर्म अधिक स्पष्ट उद्देश्य से किया जा सकता है और परिणाम की चिंता निर्णय को पूरी तरह जकड़ती नहीं।
भक्ति: गुणातीतता का आधार
श्लोक 26 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो अव्यभिचारी—अर्थात् स्थिर और एकनिष्ठ—भक्ति-योग से उनकी सेवा करता है, वह इन गुणों को पार करके ब्रह्मभाव के योग्य होता है। इस प्रकार अध्याय का उत्तर केवल मनोवैज्ञानिक निरीक्षण पर नहीं रुकता। भाग 14 भक्ति को चेतना का स्थिर आधार बताता है: मनुष्य का अंतिम भरोसा बदलती मनःस्थितियों, बाहरी प्रशंसा या इच्छित उपलब्धियों पर नहीं, परमात्मा में हो।
एकनिष्ठ भक्ति का आशय केवल किसी विशेष क्षण का भावोच्छ्वास नहीं है। यह स्मरण, सेवा, सत्यनिष्ठा और जीवन के कर्मों में ईश्वर-उन्मुखता से जुड़ती है। जब मन बार-बार अपने उच्चतम आश्रय की ओर लौटता है, तब गुणों का प्रभाव दिखता तो है, पर वही पूरी दिशा निर्धारित नहीं करता। भक्त अपनी अवस्था को छिपाता नहीं; वह उसे पहचानकर अपने केंद्र की ओर लौटता है।
श्लोक 27 में श्रीकृष्ण स्वयं को उस अमृत, अविनाशी ब्रह्म, शाश्वत धर्म और परम सुख का आधार बताते हैं। इससे पिछले श्लोकों की दिशा स्पष्ट होती है: गुणों से ऊपर उठना किसी रिक्तता में पहुँच जाना नहीं, बल्कि परम आधार में स्थिर होना है। अध्याय की दृष्टि में मुक्ति का रास्ता प्रकृति के बदलते गुणों की पहचान, उनसे असंगता और अखंड भक्ति के साथ जुड़ा है।
दैनिक जीवन में अभ्यास
इन श्लोकों को जीवन में उतारने के लिए किसी विशेष परिस्थिति की प्रतीक्षा आवश्यक नहीं। दिन में एक बार ठहरकर पूछा जा सकता है: अभी मन में स्पष्टता है, बेचैनी है या जड़ता? इस प्रश्न का उद्देश्य स्वयं को दोष देना नहीं, बल्कि परिस्थिति को साफ देखना है। फिर यह देखा जा सकता है कि कौन-सा कर्म आवश्यक है और कौन-सी प्रतिक्रिया केवल आवेग से उठ रही है।
प्रशंसा मिलने पर कृतज्ञता रखकर काम जारी रखना और आलोचना मिलने पर उपयोगी अंश ग्रहण करना—दोनों समत्व के छोटे अभ्यास हैं। किसी कठिन व्यक्ति के साथ सीमा तय करते हुए भी मन में प्रतिशोध को न पालना, गुणों के प्रभाव को पहचानने का एक दूसरा अवसर है। शांत समय में स्मरण या प्रार्थना मन को उस आधार की ओर लौटा सकती है जिसे अध्याय भक्ति कहता है।
इन अभ्यासों से कोई एक दिन में गुणातीत नहीं हो जाता। गीता का उत्तर एक स्थिर पहचान और साधना-पथ दिखाता है, त्वरित परिणाम का दावा नहीं। गुण बार-बार उभरेंगे; हर बार उन्हें पहचानना, विवेकपूर्ण कर्म चुनना और परमात्मा की ओर लौटना ही अभ्यास है।
भाग 14 का समत्व जीवन को नीरस या भावशून्य बनाने की शिक्षा नहीं देता। वह हमें सुख-दुःख और मान-अपमान के बीच भी उत्तरदायी, स्थिर और प्रेमपूर्ण बने रहने की चुनौती देता है। जब मन गुणों की चाल को पहचानता है और भक्ति को अपना आधार बनाता है, तब परिस्थितियाँ आती-जाती रहती हैं, पर मनुष्य का केंद्र हर परिवर्तन के साथ नहीं बहता। यही गुणों से परे समत्व की दिशा है।














































