श्रीमद्भगवद्गीता पढ़ने से जुड़े 20 सरल प्रश्न: कर्म, निर्णय, चिंता, संबंध, जीवन का उद्देश्य और रोज़मर्रा में उसकी सीख का उपयोग।
लेख पढ़ें →4 अक्टूबर 2026 · डॉ. राजेश तकयार
व्रजभूमि की सेवा

पुस्तक-संदर्भ: यह लेख मेरी पुस्तक “कृष्ण की राधा” के “व्रजभूमि और श्रीराधा नाम महत्व” अध्याय पर आधारित है।
किसी पवित्र स्थान से प्रेम करना केवल वहाँ पहुँच जाना नहीं है। उसकी स्मृति, उसके लोगों और उसकी प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी भी उस प्रेम का हिस्सा बन सकती है। कृष्ण की राधा के इस अध्याय में व्रजभूमि का रहस्य पौराणिक कथा और भक्ति की दृष्टि से खुलता है। कथा का एक सुंदर संकेत भूमि की सेवा और जीवन के पोषण से जुड़ा हुआ है।
सूनी भूमि को देखकर उठता प्रश्न
स्कन्दपुराण के खण्ड दो के अध्याय एक में जब सभी ऋषि नैमिषारण्य में व्यासजी से वार्तालाप कर रहे थे तो ऋषियों के पूछने पर वह बताते हैं कि पृथवीपति परीक्षित व्रजनाभ से मिलने मथुरा आए। वज्रनाभ जी ने उनका बहुत आदर-सम्मान किया।
विश्राम करके और सुखपूर्वक आसन ग्रहण करने के बाद, परीक्षित ने वज्रनाभ से कहा – “हे तात, निस्संदेह तुम्हारे पितरों ने हमारे पिता और पितामहों को महान दुःखों से उबारा था, और मुझे भी सुरक्षित रखा। हे तात, मैं उनके उस उपकार का पूरा प्रतिदान नहीं कर सकता। इसलिए मैं तुमसे यही प्रार्थना करता हूँ कि तुम प्रसन्नतापूर्वक राज्य का संचालन करो। किसी प्रकार की व्याकुलता अपने ऊपर मत लेना।”
यह सुनकर वज्रनाभ अत्यंत प्रसन्न हुए और उत्तर दिया – “हे राजन्, आपका यह कहना आपके योग्य ही है। आपने हम पर जो कृपा की है, वह भी बहुत बड़ी है। मैं यद्यपि मथुरा में अभिषिक्त होकर बैठा हूँ, फिर भी ऐसा लगता है मानो किसी निर्जन वन में रह रहा हूँ। यहाँ की प्रजा कहाँ चली गई? प्रजा के बिना राज्य भला कैसे सुंदर रूप से सजा हुआ हो सकता है?”
परीक्षित ने उनके संदेह को दूर करने के लिए नन्द आदि के पुरोहित शाण्डिल्य मुनि को तुरंत बुलवाया।
तब शाण्डिल्य मुनि अपने आश्रम से शीघ्र वहाँ आए। वज्रनाभ ने उनका विधिपूर्वक सत्कार किया, और वे उत्तम आसन पर बैठ गए।
व्रज का आध्यात्मिक अर्थ
तब शाण्डिल्य मुनि अत्यंत प्रसन्न होकर, उन दोनों को सांत्वना देते हुए बोले – “तुम दोनों एकाग्र चित्त होकर मुझसे व्रजभूमि का रहस्य सुनो। ‘व्रज’ शब्द का अर्थ ‘व्याप्ति’ से है; क्योंकि जो सबमें व्याप्त हो, उसे व्रज कहा जाता है। जो गुणों से परे, परम ब्रह्म, सर्वव्यापक, सदानंद स्वरूप, परम ज्योति और मुक्त जनों का अविनाशी पद है; उसी को व्रज कहा जाता है।”
“उस व्रजधाम में नन्दनन्दन श्रीकृष्ण सदा आनन्दमय विग्रह के साथ विराजमान हैं। वे आत्माराम हैं, अर्थात् अपने आप में ही पूर्ण आनन्द स्वरूप हैं, और आप्तकाम हैं, यानी उनकी कोई अपूर्ण इच्छा नहीं रहती। फिर भी वे प्रेम से भीगे हुए भक्तों द्वारा अनुभव किए जाते हैं। उनकी आत्मा राधिका हैं। उन्हीं के साथ रमण करने के कारण वे आत्माराम कहे जाते हैं; ऐसा गूढ़ तत्त्व को जानने वाले ज्ञानी कहते हैं। उनकी कामनाएँ या प्रिय वस्तुएँ ही गायें, गोप और गोपिकाएँ हैं। ये सब नित्य हैं, और उनकी समस्त विहार-लीलाएँ भी नित्य हैं। इसलिए वे वास्तव में आप्तकाम हैं। यह उनका अत्यंत गुप्त रहस्य है, जो प्रकृति से परे है। जब वे अपनी ही शक्ति के साथ क्रीड़ा करते हैं, तब उस लीला का अनुभव दूसरे लोग भी कर पाते हैं। जहाँ रज, सत्त्व और तम; इन तीन गुणों के द्वारा सृष्टि, स्थिति और लय होती है, वहाँ उनकी लीला दो प्रकार की है; एक वास्तवी, अर्थात् वास्तविक और नित्य; दूसरी व्यावहारिकी, अर्थात् जगत में दिखाई देने वाली और व्यवहार के स्तर पर प्रकट होने वाली।”
“वास्तविक लीला केवल स्वयं भगवान् के द्वारा पूर्ण रूप से जानी जाती है; जीवों के लिए जो लीला अनुभव में आती है, वह व्यावहारिकी रूप की होती है। पहली के बिना दूसरी का अस्तित्व नहीं है, और दूसरी कभी भी पहली से अलग नहीं होती।”
“यहीं वह व्रजभूमि है, जहाँ परम तत्त्व अत्यंत गुप्त रूप में स्थित है। वह तत्त्व केवल प्रेम से पूर्ण हृदय वालों को कभी-कभी, और विशेष कृपा से, प्रकट होता है। विशेषतः द्वापर के अंत में, जब वे लोग यहाँ एकत्र होते हैं जो भगवान् की रहस्य-लीला के अधिकारी हैं, तब हरि भी अपनी प्रिय इच्छानुसार अपने जनों के साथ अवतरित होते हैं। उसी समय अन्य देवता आदि भी चारों ओर अवतार लेकर आते हैं, ताकि वे भी उस दिव्य लीला में अपने-अपने रूप से सम्मिलित हो सकें।”
“सभी की इच्छाएँ पूर्ण करके श्रीहरि अंतर्धान हो गए। इसी कारण यहाँ पहले से ही तीन प्रकार के लोग स्थित थे; यह निश्चय पूर्वक समझो। एक वे जो नित्य हैं, दूसरे वे जो उस नित्य लीला की प्राप्ति की इच्छा रखते हैं, और तीसरे देवता आदि। इनमें से देवता आदि को श्रीकृष्ण ने पहले द्वारका पहुँचा दिया था। फिर मौसल-लीला के माध्यम से उन्हें उनके-उनके अधिकार-क्षेत्रों में स्थापित कर दिया। और जो लोग उस नित्य लीला को पाना चाहते थे, उन्हें भी श्रीकृष्ण, जो प्रेम और आनंद के एकमात्र स्वरूप हैं, अपनी नित्य लीला में सम्मिलित कर चुके थे।”
पवित्रता की पहचान सेवा से
“जो नित्यजन थे, वे सब भी अब अयोग्य लोगों की दृष्टि से ओझल हो गए। इसलिए जो लोग यहाँ व्यावहारिक लीला के अधिकारी नहीं हैं, वे यहाँ आकर भी उस लीला को नहीं देख पाते; इसी कारण उन्हें चारों ओर यह स्थान मानो निर्जन दिखाई देता है। इसलिए, हे वज्रनाभ, तुम्हें चिंता नहीं करनी चाहिए। मेरी आज्ञा से यहाँ बहुत-से ग्राम बसाओ। ऐसा करने से तुम्हारी सिद्धि होगी।”
“यह भूमि अत्यंत पवित्र है, इसलिए इसकी सेवा करनी चाहिए। गोवर्धन, दीर्घपुर, मथुरा, महावन, नन्दिग्राम और बृहत्सानु; इन स्थानों में तुम्हें राज्य-व्यवस्था स्थापित करनी चाहिए। नदियाँ, पर्वत, द्रोणियाँ, कुण्ड और कुंज; इन सबकी सेवा और संरक्षण करते हुए यदि तुम राज्य चलाओगे, तो तुम्हारी प्रजा समृद्ध होगी और तुम स्वयं भी प्रसन्न रहोगे। यह भूमि सच्चिदानन्दमयी है, इसलिए तुम्हें प्रयत्नपूर्वक इसकी सेवा करनी चाहिए। मेरी कृपा से यहाँ श्रीकृष्ण के पावन स्थल तुम्हारे लिए प्रकट होते रहेंगे। हे वज्र, इस व्रजभूमि की सेवा करने से तुम्हारी भेंट उद्धव से होगी। तब तुम अपनी माता सहित इस रहस्य को और अधिक प्राप्त कर सकोगे।”
ऐसा कहकर शाण्डिल्य मुनि श्रीकृष्ण का स्मरण करते हुए चले गए। फिर विष्णुरात परीक्षित और वज्र; दोनों ने अत्यंत आनंद प्राप्त किया।
अंत में कहा कि श्रीकृष्ण के दो रूप हैं; एक चतुर्भुज रूप (वैकुण्ठ में) और एक द्विभुज रूप (गोलोक में)। चतुर्भुज रूप की पत्नियाँ लक्ष्मी, सरस्वती आदि हैं, जबकि कृष्ण के परम प्रिय रूप में श्रीराधा उनकी अर्धांगिनी हैं। श्रीराधा और कृष्ण में कोई भेद नहीं है; जो इनके बीच भेद करता है, वह पतन को प्राप्त होता है।
इस का सार यह है कि श्रीराधा और कृष्ण का संबंध केवल सांसारिक नहीं, बल्कि परम दिव्य और शाश्वत है। उनके प्रेम, लीला और मिलन-वियोग का उद्देश्य केवल आध्यात्मिक सत्य को प्रकट करना है।
अपने आसपास की भूमि से संबंध
इस प्रसंग में एक बात ध्यान देने योग्य है। वज्रनाभ के सामने प्रश्न केवल किसी दिव्य रहस्य को जानने का नहीं है। उनके सामने सूनी प्रतीत होती भूमि और वहाँ जीवन बसाने की जिम्मेदारी भी है। शाण्डिल्य मुनि का उत्तर आध्यात्मिक दृष्टि के साथ सेवा की दिशा देता है। जिस स्थान को पवित्र मानते हैं, उसकी देखभाल करना उसी श्रद्धा का स्वाभाविक विस्तार हो सकता है।
आज तीर्थयात्रा करते समय हम इस प्रश्न को अपने साथ ले जा सकते हैं। क्या यात्रा के बाद वह स्थान हमारे व्यवहार से अधिक स्वच्छ, अधिक सम्मानित और अधिक सुरक्षित रहता है? क्या हम वहाँ रहने वाले लोगों से विनम्रता से मिलते हैं? क्या नदी, कुंड, वृक्ष और मार्ग को केवल उपयोग की वस्तु मानते हैं, या उनकी देखभाल की जिम्मेदारी भी समझते हैं? छोटे व्यवहार से हमारी भावना का परिचय मिलता है।
राधाकृष्ण के अभिन्न प्रेम की व्याख्या भी संबंधों में अधिकार से आगे देखने का अवसर देती है। प्रेम में दूसरे की गरिमा, स्वतंत्रता और सुख के लिए स्थान चाहिए। अपनी सुविधा को ही केंद्र बना लेना प्रेम की व्यापकता को छोटा कर सकता है। अध्याय का दिव्य प्रेम सांसारिक व्यवहार की नकल नहीं है, लेकिन उससे संवेदनशीलता, समर्पण और सेवा की प्रेरणा ली जा सकती है।
यह यात्रा घर से भी शुरू हो सकती है। अपने आसपास की किसी उपेक्षित जगह की सफाई में सहयोग देना, पौधे की नियमित देखभाल करना या किसी जरूरतमंद की बात सुनना सेवा के साधारण रूप हैं। इनके लिए बड़े प्रदर्शन की आवश्यकता नहीं। आवश्यक है निरंतरता और सच्चा लगाव। व्रजभूमि का चिंतन तब केवल दूर स्थित तीर्थ की स्मृति नहीं रहता; वह हमारे अपने आचरण से जुड़ता है। जब श्रद्धा देखभाल में बदलती है, तब पवित्रता का अर्थ अधिक जीवंत हो उठता है।
कथा की दृष्टि और हमारा अभ्यास
अध्याय में दृश्य और अदृश्य लीला का जो अंतर बताया गया है, वह भक्ति परंपरा की भाषा है। पाठक उससे यह प्रेरणा ले सकता है कि किसी स्थान का अर्थ केवल उसकी दिखाई देने वाली इमारतों में नहीं होता। स्मृतियाँ, संबंध, सेवा और सामूहिक भावना भी उसे जीवन देते हैं। इसलिए यात्रा में केवल तस्वीर लेकर लौट आना पूरी अनुभूति नहीं बन जाता। कुछ देर शांत होकर देखना और वहाँ की गरिमा का सम्मान करना भी आवश्यक है।
यदि किसी सेवा में सहयोग करें तो स्थानीय जरूरत को पहले ध्यानपूर्वक समझें। अपनी इच्छा के अनुसार कुछ कर देने से बेहतर है जिम्मेदार लोगों की बात सुनना। श्रद्धा के साथ समझ जुड़ती है तो सहायता अधिक उपयोगी होती है। राधाकृष्ण प्रेम का यह स्मरण हमें भावना और जिम्मेदारी, दोनों को साथ रखने की ओर ले जा सकता है।

































