27 अक्टूबर 2026 · डॉ. राजेश तकयार
त्याग का सही अर्थ

त्याग का नाम सुनकर हमें अक्सर सब काम छोड़ देने का विचार आता है। अठारहवें भाग का यह प्रसंग त्याग की एक अधिक सूक्ष्म दिशा सामने रखता है। यज्ञ, दान और तप जैसे कर्म करते हुए भी उनसे जुड़ा अहंकार और फल का आग्रह छोड़ा जा सकता है। प्रश्न काम की उपस्थिति भर का नहीं, उस काम से मन के संबंध का भी है।
कर्म के भीतर छिपी आसक्ति
श्रीमद्भगवद्गीता के पिछले श्लोक में श्री कृष्ण जी ने कहा कि यज्ञ-दान-तप त्याज्य नहीं, कार्य हैं। अब वे एक बहुत जरूरी शर्त जोड़ रहे हैं कि इन कर्मों को भी आसक्ति छोड़कर और परिणाम-लाभ छोड़कर करना चाहिए। यहाँ संतुलन पूरा हो जाता है कि कर्म भी रहे, शुद्धि भी रहे, और बंधन भी न बने। यहाँ भगवान् परमानंद ने एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण शर्त जोड़ दी है, जो कर्मयोग के संपूर्ण दर्शन को संतुलित कर देती है। वे केवल यह नहीं कह रहे कि यज्ञ, दान और तप करो; वे यह भी कह रहे हैं कि इन्हें आसक्ति और फल-लाभ की इच्छा छोड़कर करो। यही वह बिंदु है जहाँ कर्म साधारण क्रिया न रहकर साधना बनता है।
आसक्ति कर्म को बंधन में बदलती है, क्योंकि तब भक्त कर्म से अधिक उसके परिणाम से जुड़ जाता है। फल की अपेक्षा मन को भविष्य में बाँध देती है और अहंकार कर्म को मैंने किया के भाव से भर देता है। ऐसी स्थिति में शुभ कर्म भी मन को मुक्त नहीं कर पाते। इसलिए भगवान् कर्म का त्याग नहीं, बल्कि कर्तापन और फलासक्ति का त्याग बता रहे हैं। ये अद्भुत संतुलन है। यदि कर्म छोड़ दिया जाए, तो जीवन निष्क्रिय हो सकता है; और यदि कर्म में आसक्ति रखी जाए, तो वही कर्म बंधन बन सकता है। इसलिए भगवान् करुणामूर्ति ऐसा मार्ग बता रहे हैं जिसमें कर्म भी बना रहे, अंतःकरण की शुद्धि भी होती रहे, और आत्मा किसी बंधन में भी न फँसे।
जब भक्त कर्तव्य को ईश्वरार्पण की भावना से करता है, तब कर्म पूजा बन जाता है; जब वह फल की चिंता छोड़ देता है, तब कर्म योग बन जाता है; और जब अहंकार का भार उतर जाता है, तब वही कर्म अंतःकरण को निर्मल करके मुक्ति का साधन बन जाता है। यही उनका संतुलित संदेश है कि कर्म करो, पर कर्म में बँधो मत; शुद्धि प्राप्त करो, पर अहंकार मत पालो; जीवन जीओ, पर स्वतंत्र रहो।
समस्या कर्म में नहीं, कर्म के साथ जुड़ी आसक्ति में होती है। कोई यज्ञ करता है पर उसके पीछे दिखावा हो; कोई दान करता है पर प्रचार और श्रेष्ठता-भाव हो; कोई तप करता है पर दंभ और कठोर अहं हो। ये सब बाहरी रूप से धर्म-कर्म हैं, पर अंदर से ये बंधन बने हैं। क्योंकि दिखावा, प्रचार, श्रेष्ठता-भाव, दंभ और कठोर अहं आसक्ति ही हैं। इसलिए श्री सत्यस्वरूप कृष्ण कह रहे हैं कि इन श्रेष्ठ कर्मों को भी ‘संग’ और ‘फल’ से मुक्त करके करना ही श्रेष्ठ है।
कर्तव्य की शुद्ध भावना
संग का अर्थ केवल वस्तुओं से लगाव नहीं; यह है कि ‘मैं कर्ता हूँ’, ‘यह मेरा काम है’, ‘मेरा नाम होना चाहिए’, ‘मेरे अनुसार ही होना चाहिए’; ये सब संग है। फल का अर्थ केवल धन नहीं; फल में मान, प्रतिष्ठा, प्रशंसा, प्रभाव, और मन की तृप्ति भी आती है। सत्य का पालन करने वाले श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि इन सबकी मांग छोड़ो, पर कर्म मत छोड़ो। यही निष्काम कर्म का हृदय है।
वे निर्णय देते हुए कह रहे हैं कि ‘यह मेरा निश्चित और उत्तम मत है।’ यानी यह कोई वैकल्पिक सलाह नहीं, सर्वोच्च निष्कर्ष है कि कर्तव्य कर्म, आसक्ति-त्याग से और फल-त्याग से होता है। सर्वेश्वर अपना निश्चित और परिपक्व निर्णय सुना रहे हैं। एतन्मे निश्चितं मतम्, अर्थात् यह कोई वैकल्पिक सुझाव, व्यक्तिगत मत या परिस्थितिजन्य सलाह नहीं है। यह एक समग्र आध्यात्मिक दर्शन का सदैव रहने वाला निष्कर्ष है। अनेक मतों, तर्कों और शंकाओं के बीच उन्होंने अपना अंतिम सिद्धांत स्थापित कर दिया है कि कर्तव्य कर्म का वास्तविक स्वरूप आसक्ति और फल-त्याग के साथ ही पूर्ण होता है।
वह कह रहे हैं कि यह निर्णय कर्म और संन्यास के बीच का सेतु है। बंधन कर्म से नहीं, बल्कि कर्म से जुड़ी आसक्ति और फल की इच्छा से उत्पन्न होता है। इसलिए कर्तव्य का त्याग समाधान नहीं; कर्तव्य करते हुए अहंकार, ममता और फल-लालसा का त्याग ही मुक्ति का मार्ग है। मेरा यह मत मतमुत्तमम् यानी ‘उत्तम’ है, क्योंकि इसमें जीवन से पलायन नहीं है और न ही कर्म में डूबकर बंधन स्वीकार करना है। यहाँ कर्म भी सुरक्षित रहता है, धर्म भी सुरक्षित रहता है और आत्मा की स्वतंत्रता भी सुरक्षित रहती है। यही परम संतुलन है कि कर्तव्य का पालन करो, पर स्वामित्व का नहीं; कर्म करो, पर फल के दास मत बनो। तभी कर्म योग बनता है और योग अंततः मुक्ति का द्वार खोल देता है।
अर्जुन के संदर्भ में छिपा अर्थ है कि तुम युद्ध जैसे कर्तव्य कर्म से भागो नहीं; लेकिन उसे अहं, क्रोध, प्रतिशोध, या व्यक्तिगत लाभ के लिए भी मत करो। उसे धर्म-बुद्धि से करो और फल को ईश्वर पर छोड़ दो। भगवान् श्रीकृष्ण उनसे यह नहीं कह रहे कि युद्ध छोड़ दो, और न ही यह कह रहे हैं कि किसी भी प्रकार युद्ध करो। वे उन्हें एक तीसरा और सर्वोच्च मार्ग दिखा रहे हैं कि कर्तव्य का पालन करो, पर उसे अहंकार, क्रोध, प्रतिशोध और स्वार्थ से मुक्त रखो। यही धर्मयुक्त कर्म है।
साधना और जीवन का मेल
अर्जुन का युद्ध व्यक्तिगत वैर का युद्ध नहीं है; वह धर्म की रक्षा का कर्तव्य है। यदि वह मोह-वश युद्ध से भागते हैं, तो यह कर्तव्य का त्याग होगा। और यदि वे क्रोध, बदले की भावना या राज्य-लाभ की इच्छा से युद्ध करते हैं, तो वह कर्तव्य बंधन बन जाएगा। इसलिए भगवान् वासुदेव उन्हें सिखा रहे हैं कि कर्म की पवित्रता केवल उसके स्वरूप से नहीं, बल्कि उसके भाव से निर्धारित होती है। बाहरी कर्म वही रहता है, परंतु उसके पीछे की चेतना बदलते ही उसका आध्यात्मिक मूल्य भी बदल जाता है। धर्म केवल यह नहीं पूछता कि तुमने क्या किया? वह यह भी पूछता है कि तुमने किस भाव से किया? यदि कर्म अहंकार से प्रेरित है, तो वह मानव को स्वयं का बंदी बना देगा। यदि क्रोध से प्रेरित है, तो वह विवेक को नष्ट कर देगा। यदि प्रतिशोध से प्रेरित है, तो वह न्याय को भी विकृत कर देगा। और यदि व्यक्तिगत लाभ के लिए किया, तो धर्म स्वार्थ का साधन बन जाएगा। इसीलिए श्री अविनाशी अर्जुन से कह रहे हैं कि युद्ध करो, पर धर्म-बुद्धि से करो; स्वयं को केवल धर्म का निमित्त समझो, कर्ता नहीं। अपने पुरुषार्थ में कोई कमी मत रखो, पर उसके परिणाम का स्वामित्व अपने हाथ में मत लो। विजय हो या पराजय, सम्मान मिले या अपमान; इन सबका अंतिम निर्णय ईश्वर पर छोड़ दो। यही निष्काम कर्म है, यही कर्मयोग है, और यही वह मार्ग है जिसमें कर्तव्य भी पूर्ण होता है, अंतःकरण भी शुद्ध होता है और आत्मा भी बंधन से मुक्त रहती है।
त्याग कर्म छोड़ना नहीं, बल्कि बंधन-कारक तत्व छोड़ना है। यज्ञ-दान-तप को बनाए रखना चाहिए, पर उन्हें शुद्ध बनाकर। यही ‘उत्तम’ है, क्योंकि यह मन को पवित्र भी करता है और मुक्त भी करता है। त्याग का वास्तविक अर्थ कर्मों का परित्याग नहीं, बल्कि उन तत्वों का परित्याग है जो कर्म को बंधन में बदल देते हैं। इसी कारण भगवान् श्रीकृष्ण जी बार-बार स्पष्ट कर रहे हैं कि यज्ञ, दान और तप जैसे पवित्र कर्म जीवन से हटाने योग्य नहीं हैं। त्याग का विषय कर्म नहीं, बल्कि आसक्ति, अहंकार, कर्तापन और फल-लालसा है। जब ये बंधन-कारक तत्व छूटते हैं, तब वही कर्म आत्मशुद्धि और आत्मोन्नति का साधन बन जाता है। ज़रूरी करने वाले कर्मों में यदि स्वार्थ, प्रदर्शन या प्रतिफल की अपेक्षा जुड़ जाए, तो उनका आध्यात्मिक प्रभाव क्षीण हो जाता है। परंतु जब इन्हें निष्काम भाव, ईश्वरार्पण बुद्धि और लोक-कल्याण की भावना से किया जाए, तो वही कर्म मन के विकारों को धोने लगते हैं। इस प्रकार कर्म बाहर से वही रहते हैं, पर उनका आध्यात्मिक स्वरूप पूर्णतः बदल जाता है।
इसीलिए श्री चक्रधर भगवान् ने इस मार्ग को उत्तम कहा। यह न तो जीवन से पलायन है और न कर्मों में अंधी आसक्ति है। यह ऐसा संतुलित मार्ग है जिसमें कर्तव्य भी सुरक्षित है, अंतःकरण भी निर्मल होता है और आत्मा भी बंधन से मुक्त रहता है। त्याग निष्क्रियता नहीं, बल्कि अंतःकरण की शुद्धि है। जब कर्म शुद्ध हो जाता है, तब वे बंधन का कारण नहीं रहता, बल्कि मुक्ति की सीढ़ी बन जाता है। यही श्रेष्ठ त्याग है, यही उत्तम साधना है और यही मानव जीवन का वास्तविक आध्यात्मिक परिष्कार है।
कर्म को छोड़ना नहीं है, कर्म को प्रभु को समर्पित करना है; संग और फल का त्याग वास्तव में ‘मेरा’ का त्याग है; भक्त कर्म करता है, पर ‘मैं’ कर्ता नहीं बनता; वह ईश्वर के लिए करता है।
त्याग का दैनिक अभ्यास
काम के बाद मन में उठती अपेक्षा देखें। क्या तुरंत प्रशंसा चाहिए? क्या श्रेय साझा करना कठिन लगता है? काम की गुणवत्ता बनाए रखते हुए इस आग्रह को पहचानें। उचित प्रतिफल और जिम्मेदारी की बात स्पष्ट रखना संभव है; भीतर अहंकार बढ़ाना आवश्यक नहीं। समर्पण का अभ्यास यहीं से शुरू होता है, जहाँ कर्तव्य बना रहता है और मन अधिक खुला होता है।